OPINION: सेमीफाइनल नहीं, 2019 के रण का वॉर्मअप मैच है विधानसभा चुनाव

सेमीफाइनल के मैच के बाद चार में दो टीमें मुकाबले से बाहर हो जाती हैं, जबकि यहां ऐसा नहीं होगा. कोई हारे या जीते सभी टीमें फिर से फाइनल मैच यानी लोकसभा चुनाव लड़ेंगी ही.

News18Hindi
Updated: December 8, 2018, 8:57 AM IST
OPINION: सेमीफाइनल नहीं, 2019 के रण का वॉर्मअप मैच है विधानसभा चुनाव
न्यूज 18 क्रिएटिव
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Updated: December 8, 2018, 8:57 AM IST
(स्मिता मिश्रा)

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना विधानसभा के चुनाव खत्म होने के बाद अब 11 दिसंबर को आने वाले नतीजों का इंतजार है. इससे पहले एग्जिट पोल्स ने राजनीतिक दलों और नेताओं की धड़कनें बढ़ा दी हैं. एग्जिट पोल्‍स चुनाव परिणामों को लेकर बंटे हुए नज़र आए और कांटे की टक्‍कर की बात कही जा रही है. देश का मीडिया मौजूदा विधानसभा चुनावों को लोकसभा चुनाव 2019 के सेमीफाइनल के रूप में प्रोजेक्ट कर रहा है. कई विशेषज्ञों ने भी इससे सहमति जताई है. मगर अतीत के विधानसभा चुनावों के रिकॉर्ड पर नज़र डालें, तो यह थ्योरी साबित नहीं होती.

चाहे इन्हीं राज्यों में 2003-2013 के चुनाव नतीजे उठा लें या अन्य छोटे बड़े चुनाव, इन नतीजों का लोकसभा के चुनाव पर एक जैसा असर नहीं पड़ा है. न ही ये नतीजे लोकसभा में प्रतिबिंबित हुए हैं. उस लिहाज से सेमीफाइनल की बात तर्कसंगत नहीं लगती. वैसे भी सेमीफाइनल के मैच के बाद चार में दो टीमें मुकाबले से बाहर हो जाती हैं, जबकि यहां ऐसा नहीं होगा. कोई हारे या जीते सभी टीमें फिर से फाइनल मैच लड़ेंगी ही.

छत्तीसगढ़ में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने किया जीत का दावा

फिर भी 2019 के रणक्षेत्र में उतरी राजनीतिक पार्टियों के लिए इन विधानसभा चुनावों की काफी अहमियत है. वास्तव में बीजेपी के दृष्टिकोण से देखें, तो जिन राज्यों में मतदान हुआ, उनमें जीत व हार की अहमियत एक जैसी नहीं होने वाली. हर राज्य के हालात और समीकरण विशिष्ट हैं. लिहाजा इन सबका राजनीतिक आंकलन भी एक ही तराजू पर करना ठीक नहीं होगा.

मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़
बीजेपी इन दोनों राज्यों में पिछले 15 साल से सत्ता पर काबिज है. इसके प्रमुख कारण हैं कद्दावर नेतृत्व, प्रशासन पर मजबूत पकड़, सरकारी योजनाओं की कुशल डिलीवरी और विपक्ष में बिखराव. शिवराज सिंह चौहान और डॉ. रमन सिंह भारत के सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले मुख्यमंत्रियों में माने जाते हैं. उनके शासन ने दोनों राज्यों में विपक्ष की कोई कोशिश कामयाब नहीं होने दी है. लेकिन, जनता में बदलाव की इच्छा एक स्वाभाविक प्रवृत्ति भी है. यह तभी रोकी जा सकती है, जब सत्ताधारी दल को चुनौती देने वाला बिल्कुल भरोसे के लायक न हो. बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व ने संगठन के स्तर पर हर संभव कोशिश की है कि कोई भी नाराजगी समय रहते दूर कर ली जाए और बूथ तक न पहुंचे.
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इसलिए चुनाव प्रचार में मुख्यमंत्रियों को ही आगे रखा गया. प्रधानमंत्री ने भी अपने भाषणों में दोनों सीएम को ही श्रेय दिया. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दोनों मुख्यमंत्री अपने राज्यों की जनता के चहेते नेता हैं और केंद्र अपनी ओर से उन्हें हर संभव मदद कर रहा है. उन्होंने यह संदेश दिया कि बीजेपी लौट कर आई, तो प्रदेश और केंद्र दोनों सरकारों से जनता को भरपूर लाभ मिलेगा.


तेलंगाना
तेलंगाना देश का सबसे नया राज्य है. यहां कोई भी जीते, बीजेपी के लिए अच्छी वाली खबर होगी. अगर के. चंद्रशेखर राव दोबारा सत्ता में लौट आते हैं, तो यह कांग्रेस और चंद्रबाबू नायडू की पहल पर बने प्रजाकुटामी के प्रयोग को मिट्टी में मिला देगा, जिसका देश की राजनीति पर अहम प्रभाव पड़ना तय है. अगर प्रजाकुटामी टीआरएस को हरा दे, तो भी बीजेपी को तेलंगाना में अपने पांव जमाने और संगठन के विस्तार में कोई अड़चन नहीं आएगी. पार्टी की कोशिशें पूरे जोर-शोर से चलती रहेंगी.

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मिजोरम
मिजोरम में बीजेपी की कोई हवा नहीं है. लेकिन, वहां कांग्रेस का हारना पार्टी के कांग्रेस मुक्त नॉर्थ ईस्ट के एजेंडे को पूरा कर देगा. दिलचस्प बात यह है कि चर्च के प्रभाव के बावजूद बीजेपी के सहयोगी और नेडा में शामिल कॉनरैड सांगमा ने मेघालय में सरकार बना ली. मिजोरम में भी मिजो नेशनल फ्रंट यानी एमएनएफ कांग्रेस को हराकर सत्ता में आ जाए, तो बीजेपी अमित शाह, राम माधव और हिमंत बिस्व शर्मा के राजनीतिक कौशल की जीत और चर्च की दखलअंदाजी की हार होगी, जिसने मिजोरम में भी बीजेपी के खिलाफ संदेश जारी किया था.

राजस्थान
इन चुनावों में सबसे ज्यादा मीडिया की निगाह राजस्थान पर रही है. इसके कारण भी साफ हैं. चुनाव की शुरुआत से मतदान का दिन आते-आते जमीन-आसमान का फर्क आ गया. इसके अलावा प्रचार के अंतिम दौर में प्रधानमंत्री की बाजी पलटने की जबरदस्त ताकत, अमित शाह की सघन संगठनात्मक रणनीति, इस सब के चलते मीडिया का सर्वाधिक फोकस राजस्थान पर ही रहा. पार्टी ने तमाम शिकायतों के बावजूद वसुंधरा राजे को अपना चेहरा बनाकर उतारा, लेकिन आखिर में राजस्थान की लड़ाई नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी जैसी होने लगी.

बीजेपी को इसका फायदा ही मिलेगा, क्योंकि वोटर्स ने कई बार साफ किया है कि उनकी वसुंधरा राजे से भले ही नाराजगी हो, लेकिन पीएम मोदी से कोई बैर नहीं है. राजस्थान में टक्कर में आ जाना ही बीजेपी की बड़ी उपलब्धि है. अगर कांग्रेस सरकार न बना पाए, तो यह राहुल गांधी के लिए बहुत बुरी खबर होगी.


याद रहे कि इससे पहले गुजरात में भी कांग्रेस की सीटें बढ़ने के बावजूद सरकार बनाने में राहुल गांधी कामयाब नहीं हो पाए थे. अगर कांग्रेस ने राजस्थान का दिल जीत लिया, तो बीजेपी को लोकसभा चुनाव के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी होगी.

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राष्ट्रीय संदेश
राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में देखें तो पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीजेपी का बेहतर प्रदर्शन यानी तीन बीजेपी शासित राज्यों में कम से कम दो राज्यों में वापसी करना बहुत जरूरी है. ये साबित करेगा कि केंद्र सरकार के अंतिम साल में भी मोदी मैजिक बरकरार है और अमित शाह के संगठन कौशल का कोई सानी नहीं है. अगर कहीं सत्ता चली भी जाए, तो बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को यह भूलना नहीं चाहिए कि जगह-जगह लोगों ने प्रदेश प्रशासन से नाराजगी होने पर भी मोदी के प्रति भरोसा जताया है. इसी को आधार मानते हुए पार्टी को पूरी ताकत से मई में होने वाले आम चुनाव की तैयारी में जुट जाना होगा.

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यह पार्टी के लिए निराशा नहीं, बल्कि बड़ी रेस की तैयारी के लिए गाड़ी के कल पुर्जे चुस्त करने जैसा होगा. हां, विपक्ष को अगर मन मुताबिक नतीजे नहीं आए, तो विपक्षी एकता को एकजुट करना और भी मुश्किल हो जाएगा. क्योंकि, फिलहाल तमाम विपक्षी 'वेट एंड वॉच' की मुद्रा में हैं. यूं भी इन चुनावों में तेलंगाना के अलावा विपक्षी एकता का राग अलापने वाले दल एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे थे. कांग्रेस के लिए विपक्ष को राहुल गांधी के नेतृत्व में एकजुट करना नामुमकिन हो जाएगा. कहने की जरूरत नहीं कि यह नरेंद्र मोदी के लिए फायदे की बात होगी.

(लेखिका प्रसार भारती में सलाहकार हैं. ये उनके निजी विचार हैं)
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