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शरद पवार और दुष्‍यंत चौटाला ने साबित किया, अभी क्षेत्रीय पार्टियों में बाकी है दमखम

News18Hindi
Updated: October 25, 2019, 12:28 PM IST
शरद पवार और दुष्‍यंत चौटाला ने साबित किया, अभी क्षेत्रीय पार्टियों में बाकी है दमखम
महाराष्‍ट्र में एनसीपी नेता शरद पवार तो हरियाणा में जेजेपी नेता दुष्‍यंत चौटाला ने बदल दिए सियासी समीकरण.

महाराष्‍ट्र (Maharashtra) और हरियाणा (Haryana) विधानसभा चुनावों (Assembly Elections) के नतीजों (Results) से साफ हुआ कि राजनीतिक सोच को लेकर भारतीय मतदाता (Indian Voters) समय के साथ अब ज्‍यादा परिपक्‍व (Mature) हो गया है. भारतीय मतदाता ने साबित किया है कि अब वो कहीं ज्‍यादा समझदारी से राष्‍ट्रीय (National) और प्रांतीय (Provincial) चुनावों में जनप्रतिनिधियों का चयन कर सकता है.

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सुमित पांडे

नई दिल्‍ली. महाराष्‍ट्र (Maharashtra) और हरियाणा (Haryana) विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) को सबसे उदासीन चुनाव माना जा रहा था. लेकिन जिंदगी की तरह राजनीति भी (Politics) अनिश्‍चिततओं से भरी हुई है. जैसे जिंदगी लोगों को समय-समय पर चौंकाती रहती है, वैसे ही सियासत का ऊंट भी कब, किस करवट बैठेगा कोई बता नहीं सकता. जब राजनीतिक पंडित हर तरफ बीजेपी (BJP) का परचम लहराता हुआ देख रहे थे और तमाम विपक्षी दलों (Opposition Parties) को हर तरफ से मात खाता हुआ बता रहे थे, तभी जनता जनार्दन ने सारे कयासों को पलट कर रख दिया. राजनीतिक दल जिस समाज को सियासत की बिसात पर उलझा रहे थे, उसी ने ऐसा तानाबना बुना कि पार्टियां ही उसमें उलझ कर रह गईं.

किसी पार्टी के पास नजर नहीं आ रही थी बीजेपी की काट
लोकसभा चुनाव 2014 (Lok Sabha Elections 2014) की जीत के बाद बीजेपी देश की राजनीति (National Polity) पर हावी होती हुई नजर आई. ऐसा लगा कि अब कोई दल उसके सामने टिक नहीं पाएगा. सियासी बिसात पर ऐसी कोई चाल नहीं है, जिससे उसे मात दी जा सके. बड़ी तादाद में लोग मानने लगे कि राष्‍ट्र की सियासत में अब जल्‍दी बदलाव नहीं हो पाएगा. इसके बाद 2017 में बीजेपी ने उत्‍तर प्रदेश (UP Assembly Election 2017) का किला फतह किया और लोकसभा चुनाव 2019 (Lok Sabha Elections 2019) में सभी प्रतिद्वंद्वियों को पहले ही दांव में चित कर दिया. उत्‍तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (SP), बहुजन समाज पार्टी (BSP) और राष्‍ट्रीय लोकदल (RLD) महागठबंधन के बावजूद बीजेपी के विजय अभियान को रोकने में सफल नहीं हो सकीं.

दुष्‍यंत चौटाला और बीएस हुड्डा ने हरियाणा में बदले समीकरण
हरियाणा में इसी बीच ताऊ देवीलाल के परिवार में एक युवा नेता ने नई पार्टी बनाई और शानदार रणनीति के दम पर आज दुष्‍यंत चौटाला (Dushyant Chautala) के नेतृत्‍व में यही जननायक जनता पार्टी (JJP) सूबे में किंगमेकर (King Maker) की भूमिका में नजर आ रही है. जेजेपी ने अंदरूनी कलह के बावजूद राज्‍य की जाट राजनीति (Jat Politics) में सेंध लगाई. दुष्‍यंत चौटाला ने अपने पारंपरिक क्षेत्र ओल्‍ड हिसार (Old Hissar) में मतदाताओं की भावनाओं को अपने पक्ष में मोड़ने में सफलता हासिल की. ठीक इसी तरह ओल्‍ड रोहतक (Old Rohtak) में कांग्रेस (Congress) के भूपिंदर सिंह हुड्डा (BS Hooda) ने वापसी की. उन्‍हें इस क्षेत्र के जाट मतदाताओं का एकजुट समर्थन मिला.

हरियाणा में कांग्रेस के भूपिंदर सिंह हुड्डा और जेजेपी के दुष्‍यंत चौटाला ने बीजेपी के खिलाफ अभियान की कमान संभाली.

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बीजेपी को हरियाणा में जीतनी चाहिए थीं 90 में 79 सीटें
छह महीने पहले लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने इसी हरियाणा में 10 की 10 संसदीय सीटों पर कब्‍जा कर लिया था. अगर लोकसभा चुनाव के नतीजों का विधानसभा के मुताबिक आकलन किया जाए तो बीजेपी को 90 में से 79 सीटें मिलनी चाहिए थीं. हरियाणा के हर दूसरे घर से एक सदस्‍य सेना (Army) और अर्द्धसैनिक बलों (Para-military Forces) में सेवाएं दे रहा है. इसलिए चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी बार-बार जम्‍मू-कश्‍मीर (Jammu-Kashmir) से अनुच्‍छेद-370 (Article-370) को हटाने की बात करती रही. वहीं महाराष्‍ट्र में एनसीपी (NCP) के कद्दावर नेता शरद पवार (Sharad Pawar) ने बीजेपी-शिवसेना गठबंधन (BJP-Shiv Sena Alliance) के खिलाफ मोर्चे की कमान संभाली. हालांकि, यूपीए (UPA) मैदान में उतरने से पहले ही हथियार डाल चुका था.

महाराष्‍ट्र में नेता विपक्ष का पद मांग सकती है एनसीपी
मराठा क्षत्रप शरद पवार इकलौते ऐसे नेता थे जिन्‍होंने एनसीपी-कांग्रेस (NCP-Congress) की ओर से मतदाताओं के सामने पेश किए जाने लायक कोई बड़ा चेहरा नहीं होने के बाद भी उम्‍मीद नहीं छोड़ी थी. कुछ महीने पहले पार्टी की संपत्तियों के हस्‍तांतरण को लेकर पैदा हुए विवाद के कारण यूपीए (UPA) के इन दोनों दलों ने अलग-अलग रास्‍ता पकड़ने का फैसला कर लिया था. कांग्रेस छोड़ने के 20 साल बाद अब आखिरकार एनसीपी देश की सबसे पुरानी पार्टी की छत्रछाया (Shadow) से अलग होकर राज्‍य में बड़े भाई के तौर पर उभरी है. एनसीपी अब इतनी मजबूत स्थिति में है कि वह महाराष्‍ट्र विधानसभा (Maharashtra Assembly) में विपक्ष के नेता के पद पर दावा भी ठोक सकती है.

महाराष्‍ट्र में मराठा क्षत्रप शरद पवार इकलौते ऐसे नेता थे जिन्‍होंने एनसीपी-कांग्रेस की ओर से मतदाताओं के सामने पेश किए जाने लायक कोई बड़ा चेहरा नहीं होने के बाद भी उम्‍मीद नहीं छोड़ी थी.


राष्‍ट्रीय राजनीति में बची है क्षेत्रीय दलों के लिए गुंजाइश
दोनों राज्‍यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों से चौटाला और पवार ने साबित कर दिया है कि राष्‍ट्रीय राजनीति में अभी भी क्षेत्रीय दलों (Regional Parties) के लिए खासी गुंजाइश बची है. हालांकि, इसके लिए उन्‍हें अपने-अपने क्षेत्रों में लोगों की भावनाओं और संवेदनाओं का पूरा ख्‍याल रखना पड़ेगा. साथ ही सियासी रण में उतरने ही नहीं लड़ने का माद्दा और हिम्‍मत भी जिंदा रखनी होगी. इन चुनावों ने ये भी साबित किया है कि राजनीतिक तौर पर अब मतदाता भी पहले से कहीं ज्‍यादा परिपक्‍व (Mature) हो गया है और वो समझदारी के साथ अपने प्रतिनिधियों (Representatives) का चुनाव कर सकता है.

अब बीजेपी के लिए मुश्‍किल खड़ी कर सकते हैं क्षेत्रीय दल
महाराष्‍ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों का हासिल यही है कि क्षेत्रीय दलों में फिर उम्‍मीद जगी है. इसी उम्‍मीद के दम पर वे आने वाले कई चुनावों में बीजेपी के विजय अभियान को चुनौती पेश कर सकते हैं. इन चुनावों ने अलग-अलग राज्‍यों में निराश क्षेत्रीय दलों को राह दिखाने का काम किया है. अब झारखंड में हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) विश्‍वसनीय गैर-बीजेपी पार्टी के साथ गठबंधन की कोशिश कर सकती है. आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल भी अगले साल होने वाले दिल्‍ली विधानसभा चुनाव के लिए ऐसे ही विकल्‍प की तलाश में जुट सकते हैं. आखिरकार सियासत संभावनाओं की जमीन तलाशने का ही तो नाम है.



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First published: October 25, 2019, 11:29 AM IST
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