भारत में हर नागरिक के कानूनी मदद पर खर्च होते हैं 75 पैसे: रिपोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एस पी शाह ने यह रिपोर्ट जारी की. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि राज्य विधिक सेवा प्राधिकारों को आवंटित धनराशि में 14 फीसदी राशि खर्च ही नहीं की जाती है.

News18Hindi
Updated: September 9, 2018, 11:26 PM IST
भारत में हर नागरिक के कानूनी मदद पर खर्च होते हैं 75 पैसे: रिपोर्ट
सांकेतिक तस्वीर
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Updated: September 9, 2018, 11:26 PM IST
दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस. मुरलीधर ने रविवार को कहा कि कानूनी मदद मुहैया कराने वाले वकील मानवाधिकार के रक्षक हैं. जरूरत है कि उन्हें भी पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (लोक अभियोजकों) के स्तर का पेमेंट किया जाए. राष्ट्रमंडल मानवाधिकार पहल (सीएचआरआई) की रिपोर्ट ‘सलाखों के पीछे उम्मीद?’ से पता चला है कि भारत में कानूनी मदद पर प्रति व्यक्ति खर्च महज 75 पैसे है.

दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एस पी शाह ने यह रिपोर्ट जारी की. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि राज्य विधिक सेवा प्राधिकारों को आवंटित धनराशि में 14 फीसदी राशि खर्च ही नहीं की जाती है. बिहार, सिक्किम और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने आवंटित धनराशि में 50 फीसदी में से भी कम खर्च किया, जबकि 520 जिला विधिक सेवा प्राधिकारों (डीएलएसए) में से महज 339 में पूर्णकालिक सचिव हैं, ताकि कानूनी मदद सेवाओं की आपूर्ति का प्रबंधन किया जा सके.

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एक बयान में मुरलीधर के हवाले से कहा गया, ‘दिल्ली हाईकोर्ट के जज एस मुरलीधर ने कानूनी मदद मुहैया कराने वाले वकीलों को मानवाधिकार के रक्षक के तौर पर परिभाषित किया. ऐसे वकीलों को पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के स्तर का भुगतान किए जाने की जरूरत पर जोर दिया.’

‘कानूनी प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता सुधारने’ पर आयोजित एक चर्चा में जस्टिस मुरलीधर ने आपराधिक कानून और प्रक्रियाओं पर आधारित रुख की बजाय कानूनी मदद को लेकर मानवाधिकार आधारित रुख की जरूरत बताई.

बयान में जस्टिस शाह के हवाले से कहा कि कई कैदियों को अपने मुकदमों की मौजूदा स्थिति और अपने बुनियादी मानवाधिकारों के बारे में पता नहीं होता है. उन्होंने कहा, ‘न्याय तक पहुंच सबसे बुनियादी मानवाधिकार है.’ (एजेंसी इनपुट)
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