प्रशांत भूषण के खिलाफ 11 साल पुराने अवमानना के मामले में एमिकस क्यूरी हो सकते हैं अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल

प्रशांत भूषण के खिलाफ 11 साल पुराने अवमानना के मामले में एमिकस क्यूरी हो सकते हैं अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल
न्यूज़ 18 क्रिएटिव

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) के खिलाफ 11 साल पुराने अदालत की अवमानना के मामले (Contempt of Court) में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से राय मांगी है.

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  • Last Updated: September 11, 2020, 1:12 PM IST
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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) और पत्रकार तरुण तेजपाल (Tarun Tejpal) के खिलाफ लंबित 2009 के अवमानना मामले (Contempt Of Court Case) में गुरुवार को अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल (KK Vengugopal) से मदद करने का अनुरोध किया. शीर्ष अदालत ने तहलका पत्रिका में प्रकाशित साक्षात्कार में सुप्रीम कोर्ट के कुछ तत्कालीन पीठासीन और पूर्व न्यायाधीशों पर कथित रूप से लांछन लगाने को लेकर भूषण और तेजपाल को नवंबर 2009 में अवमानना के नोटिस जारी किये थे. तेजपाल उस वक्त इस पत्रिका के संपादक थे.

जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ के समक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सुनवाई के लिए यह मामला आया. भूषण की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि इस मामले में कानून के बड़े सवालों पर विचार होना है और ऐसी स्थिति में इसमें अटॉर्नी जनरल की मदद की जरूरत होगी.





धवन ने कहा, ‘हम चाहते हैं कि हमारे द्वारा दिये गये सवालों पर अटॉर्नी जनरल इस अदालत की मदद करें. अदालत ने भी कुछ सवाल तैयार किये हैं.’ इस मामले में विचार के लिए उन्होंने कुछ सवाल दिये थे. पीठ ने निर्देश दिया कि इसका सारा रिकार्ड अटॉर्नी जनरल के कार्यालय को दिया जाए और इसके साथ ही अवमानना के इस मामले को 12 अक्टूबर के लिए सूचबद्ध कर दिया.
भूषण ने संवैधानिक महत्व के 10 सवाल उठाए - वकील
शीर्ष अदालत ने अवमानना के एक अन्य मामले में दोषी ठहराये गए अधिवक्ता प्रशांत भूषण पर 31 अगस्त को एक रुपये का सांकेतिक जुर्माना लगाया था. यह मामला प्रशांत भूषण के न्यायपालिका के प्रति अपमानजनक दो ट्वीट का था, जिसमें अदालत ने कहा था कि उन्होंने न्याय प्रशासन की संस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाने का प्रयास किया था. अदालत ने 2009 का अवमानना मामला 25 अगस्त को किसी दूसरी पीठ को भेजने का निश्चय किया था जिसे अभिव्यक्ति की आजादी और न्यायपालिका के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों से संबंधित व्यापक सवालों पर विचार करना है.

धवन ने अदालत से कहा था कि उन्होंने संवैधानिक महत्व के 10 सवाल उठाए हैं जिन पर संविधान पीठ द्वारा विचार करने की आवश्यकता है. इस मामले की अदालत ने समय के अभाव की वजह से 25 अगस्त को सुनवाई नहीं की थी क्योंकि पीठ की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस अरुण मिश्रा दो सितंबर को सेवानिवृत्त हो रहे थे. इस मामले में उठाये गए सवालों पर अटॉर्नी जनरल की मदद लेने के धवन के आग्रह से पीठ सहमत नहीं थी और उसने कहा था कि बेहतर होगा कि इसे प्रधान न्यायाधीश द्वारा गठित की जाने वाली नई पीठ पर छोड़ दिया जाए.

कोर्ट ने 17 अगस्त को इस मामले में कुछ सवाल तय किये 
शीर्ष अदालत ने 17 अगस्त को इस मामले में कुछ सवाल तय किये थे और संबंधित पक्षों से इन तीन सवालों पर विचार के लिए कहा था. ये सवाल थे - क्या न्यायाधीशों और न्यायपालिका के खिलाफ भ्रष्टाचार संबंधी बयान दिये जा सकते हैं और किन परिस्थितियों में ये दिये जा सकते हैं और पीठासीन तथा सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के मामले में क्या प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए.

भूषण ने भी अपने 10 सवाल दाखिल किये थे और इन पर संविधान पीठ द्वारा विचार करने का अनुरोध किया था. भूषण के सवालों में शामिल था, ‘क्या न्यायपालिका के किसी भी क्षेत्र में भ्रष्टाचार के बारे में वास्तविक राय व्यक्त करना अदालत की अवमानना माना जाएगा? क्या इस तरह की राय व्यक्त करने वाले व्यक्ति को इसे सही साबित करना होगा या अपनी राय को वास्तविक बताना ही पर्याप्त होगा.’ (भाषा इनपुट के साथ)
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