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पांच सदी पुराना है अयोध्या विवाद, मुगल साम्राज्य और ब्रितानी हुकूमत में भी रहा था अनसुलझा

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Updated: November 10, 2019, 1:23 PM IST
पांच सदी पुराना है अयोध्या विवाद, मुगल साम्राज्य और ब्रितानी हुकूमत में भी रहा था अनसुलझा
पांच सदी पुराना है अयोध्या विवाद (प्रतीकात्मक तस्वीर)

दशकों से अयोध्या विवाद (Ayodhya case) संघर्ष का एक केंद्र रहा है. 1856-57 में भी मस्जिद (Babri Masjid) के आसपास के इलाकों में हिंदू और मुसलमानों के बीच कई बार दंगे भड़क उठे थे.

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  • Last Updated: November 10, 2019, 1:23 PM IST
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नई दिल्ली. मुगल साम्राज्य (Mughal Empire), ब्रितानी हुकूमत (British Raj) और फिर स्वतंत्रता के बाद भी दशकों तक अनसुलझा रहा अयोध्या विवाद (Ayodhya case) आखिरिकार 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के ऐतिहासिक फैसले के बाद समाप्त हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को कहा कि 1989 में ‘भगवान श्रीराम लला विराजमान’ की ओर से दायर याचिका बेवक्त नहीं थी, क्योंकि अयोध्या में विवादित मस्जिद की मौजूदगी के बावजूद उनकी ‘पूजा-सेवा’ जारी रही.

चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति रंजन गोगोई (CJI Ranjan Gogoi) की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने मुस्लिम पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि रामलला विराजमान (Ram Lalla Virajman) की ओर से दायर याचिका बेवक्त है, क्योंकि घटना 1949 की है और याचिका 1989 में दायर की गई है.

मस्जिद को दी जाए 5 एकड़ जमीन
योध्या में विवादित स्थल राम जन्मभूमि पर मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि ‘सुन्नी वक्फ बोर्ड’ को मस्जिद के निर्माण के लिए पांच एकड़ भूमि आबंटित की जाए.

1856-57 में भी हुआ था दंगा
भारतीय इतिहास की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इस व्यवस्था के साथ ही करीब पांच सदी से चले आ रहे इस संवेदनशील विवाद पर परदा गिर गया. देश का सामाजिक ताना बाना इस विवाद के चलते बिखरा हुआ था. मुगल बादशाह बाबर के कमांडर मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद का निर्माण 1528 में कराया था.

मीर बाकी ने कराया था मस्जिद का निर्माण

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यह पाया गया कि यह स्थल दशकों से निरंतर संघर्ष का एक केंद्र रहा और 1856-57 में मस्जिद के आसपास के इलाकों में हिंदू और मुसलमानों के बीच कई बार दंगे भड़क उठे थे.

ब्रिटिश सरकार ने खड़ी की थी 7 फीट की दीवार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो धार्मिक समुदायों के बीच कानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने परिसर को भीतरी और बाहरी बरामदे में विभाजित करते हुए छह से सात फुट ऊंची ग्रिल-ईंट की दीवार खड़ी की. भीतरी बरामदे का इस्तेमाल मुसलमान नमाज पढ़ने के लिए और बाहरी बरामदे का इस्तेमाल हिंदू पूजा के लिए करने लगे .

इस विवाद में पहला मुकदमा ‘राम लला’ के भक्त गोपाल सिंह विशारद ने 16 जनवरी, 1950 को दायर किया था. इसमें उन्होंने विवादित स्थल पर हिन्दुओं के पूजा अर्चना का अधिकार लागू करने का अनुरोध किया था. उसी साल, पांच दिसंबर, 1950 को परमहंस रामचन्द्र दास ने भी पूजा अर्चना जारी रखने और विवादित ढांचे के मध्य गुंबद के नीचे ही मूर्तियां रखी रहने के लिए मुकदमा दायर किया था. लेकिन उन्होंने 18 सितंबर, 1990 को यह मुकदमा वापस ले लिया था.

मस्जिद के सामने छह से सात फुट ऊंची ग्रिल-ईंट की दीवार खड़ी की थी.


1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दायर किया था मुकदमा
बाद में, निर्मोही अखाड़े ने 1959 में 2.77 एकड़ विवादित स्थल के प्रबंधन और शेबैती अधिकार के लिए निचली अदालत में वाद दायर किया. इसके दो साल बाद 18 दिसंबर 1961 को उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड भी अदालत में पहुंचा गया और उसने बाबरी मस्जिद की विवादित संपत्ति पर अपना मालिकाना हक होने का दावा करते हुए इसे बोर्ड को सौंपने और वहां रखी मूर्तियां हटाने का अनुरोध किया.

1992 में गिराया गया मस्जिद का ढांचा
अयोध्या में छह दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा गिराए जाने की घटना और इसे लेकर देश में हुये सांप्रदायिक दंगों के बाद सारे मुकदमे इलाहाबाद उच्च न्यायालय को निर्णय के लिये सौंप दिये गये थे.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 30 सितंबर, 2010 के फैसले में 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला- के बीच बांटने के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गयी थी.

(इनपुट भाषा)

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First published: November 10, 2019, 1:20 PM IST
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