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अयोध्या सुनवाई: मुस्लिम पक्ष का आरोप- हिंदुओं की वजह से नहीं सुलझ सका मसला

भाषा
Updated: October 4, 2019, 11:54 PM IST
अयोध्या सुनवाई: मुस्लिम पक्ष का आरोप- हिंदुओं की वजह से नहीं सुलझ सका मसला
अयोध्‍या विवाद: सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष ने कहा कि अगर हिंदुओं ने ये दावा नहीं किया होता तो पहले ही सुलझ जाता यह विवाद.

अयोध्‍या विवाद (Ayodhya Dispute) में मुस्लिम पक्षकार का कहना है कि यह विवाद पहले ही सुलझ जाता, अगर हिंदू पक्ष ने यह दावा नहीं किया होता कि ध्‍वस्‍त मस्जिद का मध्‍य गुंबद ही भगवान राम (Lord Ram) का जन्‍म है.

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नई दिल्‍ली. मुस्लिम पक्षकारों ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में कहा कि वे इस बात से इनकार नहीं कर रहे हैं कि अयोध्या (Ayodhya) भगवान राम की जन्मभूमि है. लेकिन, स्थल से जुड़े विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से नहीं सुलझाया जा सका क्योंकि हिंदू पक्ष ने दावा किया कि ध्वस्त मस्जिद का मध्य गुंबद ही वह स्थान था जहां उनका जन्म हुआ था.

उन्होंने कहा कि छह दिसंबर 1992 को विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल पर मस्जिद गिराए जाने के साथ ही भारत की धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता के बारे में विदेशी धारणा बदल गई. मुस्लिम पक्ष ने कहा कि एक विद्वान ने कहा था कि भारत कई सभ्यताओं की धरती है लेकिन अब इसके सिर्फ हिंदू सभ्यता बन जाने का खतरा है.

अयोध्‍या में हिंदू और मुस्लिम साथ-साथ रहते हैं
मुस्लिम निकायों ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि मुसलमानों के खिलाफ दुश्मनी बढ़ायी जा रही है लेकिन, अयोध्या ऐसी भूमि है जहां हिंदू और मुसलमान सदियों से साथ-साथ रहते आए हैं. प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष मुस्लिम पक्षकारों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि उन्हें इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि है लेकिन हिंदुओं ने जोर दिया कि गिराए गए मस्जिद का मध्य गुंबद ही उनका वास्तविक जन्म स्थान है.

इस जगह पर पैदा हुए थे भगवान राम
धवन ने कहा, 'हम लोग सहित कोई भी अयोध्या के भगवान राम का जन्म स्थान होने के बारे में मना नहीं कर रहा है. लंबे समय से चला आ रहा यह विवाद काफी पहले ही सुलझ गया होता, अगर इसे दूसरे पक्ष ने स्वीकार कर लिया होता कि वह मध्य गुंबद के नीचे नहीं पैदा हुए थे. हिंदुओं ने जोर दिया कि उनका जन्म मस्जिद के मध्य गुंबद के नीचे हुआ. वास्तविक स्थल विवाद का मूल है.'

इस पीठ में न्यायमूर्ति एसए बोबडे, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर भी शामिल हैं. उन्होंने पीठ के समक्ष कहा कि कोर्ट द्वारा 1949 में एक रिसीवर नियुक्त किए जाने के बाद भी मस्जिद का 'विध्नकारी विरूपण' हुआ.
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विवादित ढांचे के खंभों को सिंदूर से नहीं रंग सकते
उन्होंने कहा कि 1950 से 1990 की अवधि के दौरान मस्जिद का विध्नकारी विरूपण हुआ था जब अदालत ने कोर्ट रिसीवर नियुक्त किया था. फैजाबाद के पूर्व डिप्टी कमिश्नर केके नैय्यर और फैजाबाद के सिटी मजिस्ट्रेट गुरु दत्त सिंह की तस्वीरें दीवार पर लगी थीं. उस समय विवादित ढांचे के अंदर सिर्फ हिंदुओं को प्रवेश की अनुमति थी. यह अवैध था और अदालत के आदेशों का उल्लंघन था.

धवन ने कहा, 'आप विवादित ढांचे के खंभों को सिंदूर से नहीं रंग सकते जहां मैग्नीफाइंग ग्लास से भी शिलालेख को पढ़ना मुश्किल हो जाता है. अदालत के आदेशों के बावजूद गैरकानूनी काम किए गए.' वरिष्ठ वकील ने कहा कि धार्मिक बंदोबस्ती किसी के पक्ष में मालिकाना हक नहीं देती और जब मुगल बादशाह बाबर आया था तो यह एक बेकार भूमि थी और संपत्ति का कोई मालिक नहीं था.

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First published: October 4, 2019, 11:42 PM IST
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