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सांप्रदायिक उन्‍माद में उलझी और बंटी 'पत्रकारिता'

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

बाबरी मस्जिद विध्वंस आजादी के बाद की पहली ऐसी घटना है जिसके कवरेज में मीडिया के पसीने छूटे और जिसने मीडिया को दो तबकों ...अधिक पढ़ें

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    बाबरी मस्जिद विध्वंस आजादी के बाद की पहली ऐसी घटना है जिसके कवरेज में मीडिया के पसीने छूटे और जिसने मीडिया को दो तबकों में बांट दिया. पत्रकारिता दो स्तरों पर उलझ रही थी. आयोध्या में चल रही घटनाओं के साथ-साथ देश में जो मुसलमानों के विरुद्ध माहौल बना वह हिंसक रूप ले रहा था. इन घटनाओं को कवर करने वाले पत्रकारों की जान जोखिम में थी क्योंकि इस दंगें में उन्हें दोनो पक्षों को कवर करना था.

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    फरवरी में जब बाबरी मस्जिद ताला खोला गया तो लोगों को लगा कि देश की राजनीति में बदलाव की बयार साफ दिख रही है. हालांकि न्यायालय का फैसला आने के बाद ही देश भर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. 6 दिसंबर 1992 में जब बाबरी मस्जिद को तोड़ा गया तो देश की राजनीति ने एक नया घिनौना दौर देखा. इस घटना के बाद उपजे दंगों में हजारों लोग मारे जा चुके हैं.

    मीडिया जिस तरह से इन घटनाओं का कवरेज कर रही थी उस पर भी कई कहानियां लिखी जा सकती हैं. बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से ही ऐसी घटनाओं की छानबीन की गई जो अब तक जारी है. बाबरी मस्जिद विध्वंस को आज 25 बरस हो गए. पत्रकारिता को भी इस घटना से सबक लेनी चाहिए.

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    कुछ लोगों का मानना था कि मीडिया भी सांप्रदायिक दंगों को फैलाने में बराबर की दोषी है. प्रेस काउंसिल और कई वरिष्ठ पत्रकार मीडिया के रुख की आलोचना कर रहे थे तो कुछ लोग ऐसे भी थे जो उन पत्रकारों के सम्मान में कसीदे पढ़ रहे थे जिन्होंने बाबरी विध्वंस के बाद जान जोखिम में डालकर आयोध्या में डंटे रहे.

    अखबारों और पत्रिकाओं में छपी तस्वीरें और कहानियां बता रही थीं कि उस दौर की परिस्थितियां क्या थीं और भारत में हो क्या रहा था. गांधी के सपनों का भारत उनके सामने भी जला और उनके जाने के बाद भी जलता रहा.

    बाबरी मस्जिद गेट के ताले जनता के लिए खोलने का आदेश जब स्थानीय कोर्ट ने दिया तो उस घटना को कवर करते हुए एक अखबार ने लिखा कि- '14 वर्षों के झूठे निर्वासन के बाद अयोध्या में राम फिर से लौट आए हैं.'

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    एक और अखबार ने अपने संपादकीय में लिखा कि अतीत के काले साए आजतक पवित्र राम जन्मभूमि, अयोध्या पर छाए हैं. इन्हें अब और सहन नहीं किया जाएगा.

    एक अखबार ने लिखा कि बाबरी मस्जिद के दरवाजे को खुला रखने वाला आदेश काफी राहत भरा है. बनारस और मथुरा में भी हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच मंदिरों को लेकर विवाद है. हिंदुओं के लिए ये स्थान धार्मिक महत्व वाले हैं पर मुस्लिमों के लिए इन स्थानों की उतनी महत्ता नहीं है इसलिए उन्हें इनका त्याग कर देना चाहिए.

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    एक हिंदी अखबार ने जामा मस्जिद के शाही इमाम का इंटरव्यू लिया. इमाम ने कहा कि अगर बाबरी मस्जिद के गेट पर ताले फिर से नहीं जड़े गए तो खुदा कसम इस देश में कुछ भी हो सकता है.
    21 मार्च 1987 में प्रकाशित एक खबर के अनुसार पंजाब में हिंदू धर्म गुरुओं का एक समूह हिंदु धर्म के रक्षार्थ हथियार इकट्ठा करवाने के लिए मिशन चला रहा था लेकिन पंजाब के हिंदुओं ने उनकी बातों पर अमल नहीं किया.

    5 सितंबर 1986 को एक हिंदी अखबार ने बजरंग दल और शिवसेना को दंगा भड़काने के लिए जिम्मेदार मानते हुए एक संपादकीय लिखा. लेख का शीर्षक था हिंदुत्व को समझना जरूरी है. लेख में कहा गया था कि दंगाइयों ने हिंदुत्व को समझा है न इस्लाम को और न ही मानवता जैसे किसी विचारधारा को.

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    एक आलेख में भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष और संसदीय मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि मुस्लिमों को राम मंदिर के विषय में खुले मस्तिष्क के साथ सोचना चाहिए और हिंदुओ के लिए राम जन्मभूमि को छोड़ देना चाहिए.

    अप्रैल 1986 में अंधेरे में लौटते कदम नाम से प्रकाशित एक आलेख में लिखा गया कि बाबरी मस्जिद के दरवाजे खोलने का आदेश देना, देश को अंधेरे में झोंकने जैसा है. देश को जिस रोग ने जकड़ा है उसे जड़ सहित उखाड़ना होगा. केवल आर्थिक प्रगति ही मायने नहीं रखती. राजनीतिक पार्टियां ध्रुवीकरण का विरोध करने की जगह रोग की जड़ों में पानी डाल रहीं हैं जिसकी वजह से केवल संप्रदायिक दंगे ही जन्म लेंगे.

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    अक्टूबर 1990 में जब लाल कृष्ण आडवाणी की बिहार में गिरफ्तारी के बाद हिंसा की खबरें आई. हिंसक झड़पों से उत्तर प्रदेश भी नहीं बचा. मीडिया को अंदाजा हुआ कि वी.पी सिंह के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से भाजपा समर्थन वापस ले रही है.

    एक अखबार ने लिखा कि आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद परिस्थितियां और खराब हो गईं. भारतीय सेना ने उत्तर प्रदेश के 26 जिलों में फ्लैग मार्च किया. पूरे उत्तर प्रदेश में रेड अलर्ट घोषित कर दिया गया.
    बहुत से अखबारों ने अपने संपादकीय लिखा कि विश्व हिंदु परिषद की अगुवाई में ही हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं. 31 अक्टूबर 1990 में टाइम्स ऑफ इंडिया में एक आलेख छपा, ‘जब पहली बार कार सेवकों का जत्था मस्जिद की ओर बढ़ा.’

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    सरकार ने दावा किया कि किसी भी तरह की कारसेवा मंगलवार को नहीं की गई थी. विवादित जगह पर किसी भी तरह का निर्माण देश के हित में नहीं था. सरकार की सारी इकाइयां मूक दर्शक बन गईं थीं.
    हां ये सच था कि हजारों क्रोधित कार सेवकों के जत्थे को रोकने के लिए सरकार की कोई भी मशीनरी तैयार नहीं थी. उन्हें रोकना असंभव था.

    हज़ारों की संख्या में विश्व हिंदू संगठन के कार्यकर्ता विवादित इलाके में पहुंच गए और मस्जिद के हिस्सों को तोड़ने लगे. यह हिंसात्मक रवैया अगर उसी वक्त दबा दिया जाता तो उग्र हिंदुत्व का यह अध्याय तभी समाप्त हो जाता. इस घटना को न रोक पाना ही देश की नाकामयाबी नहीं थी बल्कि जिम्मेदार लोगों की चुप्पी से परिस्थितियां खराब हुईं.

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    भाजपा और विश्व हिंदू परिषद ने कभी नहीं स्वीकार किया कि उनकी राजनीतिक मंशा की वजह से देश में सांप्रदायिकता बढ़ती गई और हिंदू और मुस्लिम एक-दूसरे को शक की नजरों से देखने लगे. कहने के लिए इसका त्वरित लाभ उन्हें जरूर मिला लेकिन उनके इस लाभ ने हिंदू धर्म के मूल सिद्धांत को ही ताक पर रख दिया. हिंदुओं की बड़ी आबादी हिंदू धर्म का सही अर्थ जानने से वंचित रह गई.

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    Tags: Ayodhya Mandir

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