पश्चिम बंगाल चुनाव विश्लेषण : वामदल ‘मरणासन्न’ , तृणमूल का कोलकाता किला अक्षुण्ण

कोलकाता की सभी 14 सीटों पर TMC की जीत हुई.

कोलकाता की सभी 14 सीटों पर TMC की जीत हुई.

पश्चिम बंगाल चुनाव में इस बार मुकाबला बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच रहा. वहीं राजधानी कोलकाता में कुल 14 सीटों पर टीएमसी की जीत हुई और वाम दलों को यहां से कुछ भी हाथ नहीं लगा.

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कोलकाता. पश्चिम बंगाल में चुनाव खत्म होने के बाद भी सियासी गहमागहमी खत्म नहीं हुई है. आज राजधानी कोलकाता में वामपंथियों से चुटकी लेने के लहजे में किसी ने दीवार पर लिखे उनके नारे से छेड़छाड़ की. दरअसल दीवार पर वामपंथ का नारा 'मार्क्सवाद अमर रहे' लिखा हुआ था. जिससे छेड़छाड़ करते हुए किसी ने अमर रहे की जगह 'मृत रहे' लिख दिया. पश्चिम बंगाल के चुनावों में लेफ्टिस्ट पार्टियों को मिली हार के बाद ये हरकत सामने आई है.

बंगाल में लेफ्ट ने किया 30 साल तक राज

पश्चिम बंगाल में वाम दलों ने तीन दशक से अधिक समय तक राज किया था. लेकिन फिलहाल की राजनीति में ये दल हाशिये पर जा चुके हैं. एक बार फिर राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की वापसी हुई है और कोलकाता में भी पार्टी अपने प्रभुत्व को अक्षुण्ण रखने में कामयाब हुई है. इस चुनाव में पार्टी ने विरोधी बीजेपी को सभी 14 सीटों पर मात दी है.
वहीं राज्य में वाम दलों का वोट परसेंट भी काफी गिरा है.  जहां 2011 में 34 साल के राज के बाद भी वाम दल 30.1 प्रतिशत हासिल करने में कामयाब हुए थे, वहीं हालिया चुनाव में उन्हें मात्र 5.47 फीसदी वोटों से संतोष करना पड़ा है. यहां तक कि 2016 के विधान सभा चुनाव में भी वाम दल 25.69 प्रतिशत वोट हासिल करने में कामयाब हुए थे, लेकिन इस बार उनका प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा है. इस चुनाव में अधिकतर सीटों पर तृणमूल और भाजपा का सीधा मुकाबला हुआ जबकि कभी यहां सबसे ताकतवर रहे वाम दल हाशिये पर जाते नजर आए. जादवपुर, जिसे ‘पूर्व का लेनिनग्राद’ कहा जाता है और एक बार  छोड़ साल 1967 से यहां लेफ्ट का ही कब्जा रहा, ये सीट भी इस बार तृणमूल कांग्रेस के नाम रही. इस चुनाव में वाम दलों को उस समय और असहज स्थिति का सामना करना पड़ा, जब माकपा के वयोवृद्ध नेता सुजन चक्रवर्ती को भी तृणमूल प्रत्याशी ने 40 हजार वोटों से हरा दिया.

'BJP विरोधी लहर में बह गए लेफ्ट वोट'

माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य नीलोत्पल बसु ने कहा, ‘‘हमें हार मिली क्योंकि सत्ता विरोधी लहर सहित अन्य मुद्दे लोगों की बीजेपी को पश्चिम बंगाल की सत्ता से दूर रखने की भावना के आगे हाशिये पर चले गए.’’ जबकि विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल की जीत 5 फीसदी अतिरिक्त लोकप्रिय वोट मिलने से हुई है, जो लेफ्ट का वोट बैंक हुआ करता था.

भाकपा (माले) लिबरेशन पार्टी के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य का मानना है कि ‘‘वर्ष 2019 में भाजपा ने यहां की 18 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी और कुल 40 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, उस समय लेफ्ट और कांग्रेस के वोट बीजेपी को गए थे, इस बार लेफ्ट के वोट तृणमूल के पक्ष में गए.’’



BJP की कोई कोशिश नहीं आई काम

इस बार के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने एड़ी चोटी का जोर लगाया, फिर भी  10 साल से सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने कोलकाता पर कब्जा बरकरार रखा. पार्टी ने शहर की 14 सीटों पर जीत दर्ज की. तृणमूल कांग्रेस को मिली-जुली आबादी होने के बावजूद जोड़ासंको,भवानीपुर और कोलकाता पोट सीट अच्छे खासे अंतर से जीत मिली. जोडासंकों में मिली जुली आबादी रहती है और इनमें बड़ी संख्या हिंदी भाषी प्रवासियों की हैं,  इसके बावजूद तृणमूल प्रत्याशी विवेक गुप्ता को 52,123 वोट मिले जबकि भाजपा की मीणा देवी 39,380 वोट ही मिल सके. भवानीपुर एकमात्र सीट थी जिसमें केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने घर-घर जाकर प्रचार किया लेकिन यहां पर तृणमूल ने भाजपा प्रत्याशी को करीब 31 हजार मतों से मात दी.

राजनीतिक विश्लेषकों ने बताई हार की वजह 

राजनीतिक विश्लेषणों का मानना है कि कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस की एकतरफा जीत में कोविड-19 की खराब होती स्थिति, तृणमूल कांग्रेस की आखिरी तीन चरणों के चुनाव को मिलाकर एक चरण करने की मांग जैसे फैक्टर्स ने अहम भूमिका निभाई. बीजेपी के खिलाफ कई लेफ्ट संगठनों और अल्पसंख्यकों के प्रचार ने भी बीजेपी के खिलाफ मतदाताओं को एकजुट करने का काम किया, जिसका फायदा तृणमूल को मिला. राजनीतिक विश्लेषक सिवाजी प्रतिम बसु के मुताबिक -आखिरी चरणों में जमीन पर यह धारणा बनी कि तृणमूल सत्ता में वापसी कर रही है, जिसने मतदाताओं को प्रभावित किया. जिनमें जोड़ासंको और भवानीपुर की हिंदी भाषी बिहारी आबादी शामिल है।’’

(Disclaimer: यह खबर सीधे सिंडीकेट फीड से पब्लिश हुई है. इसे News18Hindi टीम ने संपादित नहीं किया है.)

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