जब भागती है कोई लड़की, जरूरी नहीं साथ में लड़का भी भागा होगा

बंद समाजों, कुंठित घरों और मर्दों के आदेश पर चलने वाले घरों की लड़कियां हमेशा लड़के के लिए ही नहीं भागती, न शादी के लिए भागती हैं. वो जिंदगी में बस थोड़ा सा आजाद होने के लिए भाग रही होती हैं.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 1:54 PM IST
जब भागती है कोई लड़की, जरूरी नहीं साथ में लड़का भी भागा होगा
क्यों भागती हैं लड़कियां घरों से
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 1:54 PM IST
बरेली की साक्षी मिश्रा के केस में हुआ कुछ यूं है कि जितने मुंह उतनी बातें. जो जाति के सवाल पर प्रगतिशील बन गए, उन्हें भी उसके भविष्य की चिंता खाए जा रही है. वो एक ही रट लेकर बैठ गए हैं, 20 साल कोई उमर होती है भला. 20 साल में कितनी अकल होती है लड़की को या लड़के को भी. 20 साल की बुद्धि से जीवन का इतना बड़ा फैसला कोई कैसे ले सकता है.

तर्क से सोचेंगे तो बात सही भी लगती है. 20 साल मुहब्बत में पड़ने, प्यार वाली चिट्ठियां लिखने की उम्र तो हो सकती है, लेकिन शादी जैसा फैसला लेने की उम्र तो नहीं है. फैसला गलत भी हो सकता है, पसंद गलत भी हो सकती है.

वैसे तो जीवन में कुछ भी, कभी भी गलत हो सकता है और इतिहास गवाह है लड़कियों के गलत फैसलों का भी. लेकिन उनकी गलतियां गिनाने वालों ने कभी ये भी सोचा है कि लड़कियां जिंदगी में गलत फैसले करती क्यों हैं? क्यों वो 20 साल की उम्र में घर से भागकर किसी ऐसे व्यक्ति से शादी कर लेती हैं, जो शादी तो छोड़िए, शायद प्यार किए जाने के लायक भी न हो? मेरे मुहल्ले की वो लड़की ऐसे लड़के के प्रेम में क्यों पड़ गई, जिसने उसकी ब्लू फिल्म बनाकर इंटरनेट पर डाल दी थी? इलाहाबाद के एक बड़े कवि की बेटी ने ऐसे लड़के से प्यार क्यों किया कि जो प्यार की जिम्मेदारी लेने के वक्त भाग खड़ा हुआ और लड़की ने अपने कमरे के पंखे से लटककर जान दे दी? हम सबने देखी, सुनी हैं ऐसी सैकड़ों कहानियां. हम सबने लड़की को दोषी बताया है, लेकिन कभी ये नहीं पूछा कि लड़कियां क्यों फंसती हैं, गलत लड़कों के चक्कर में? क्यों होते हैं लड़के ऐसे मक्कार, गैरजिम्मेदार? क्यों होता है ये सब कि जो सदियों से हो रहा है?

ऐसा भी तो हो सकता था कि 20 साल की उम्र में लड़की जिसके प्रेम में पड़ी, पड़ी रहती. सात रंगों वाली कलम से प्यार वाली चिट्ठी लिखती, चिट्ठी में सितारे बनाती, डायरी में कविताएं लिखती, लड़के के साथ घूमने जाती, लड़के को घर बुलाती. जीकर देख लेती एक बार ये वाली भी मुहब्बत. क्या पता, एक बार जी लेने के बाद वो खुद उस प्रेम से ऊपर उठ जाती, आगे बढ़ जाती. फिर कोई नया प्रेम आता. ऐसे दो-चार प्रयोग तो हो ही सकते थे जिंदगी में. इस बीच जिंदगी को बनाने वाले असली काम भी हो रहे होते, जैसेकि पढ़ाई, किसी अच्छी यूनिवर्सिटी में एडमिशन, अपने कॅरियर पर फोकस, अपने पैरों पर खड़े होने के लिए मेहनत. प्यार भी चलता रहता पैरलल.



लेकिन ऐसा नहीं होता. ये सबकुछ हो सके, उससे पहले ही भाग जाती हैं लड़कियां. एक अंधेरे से निकलकर दूसरे अंधेरे में मर जाने के लिए. 20 की उमर में भागती हैं और 21 में नौ महीने का पेट लिए जिंदगी के घनचक्कर में फंस चुकी होती हैं. एक ऐसी भूल-भुलैया, जिससे बाहर निकलने की कोई राह नहीं. घरवाले बेटी को मार न डालें तो मरा हुआ मान लेते हैं, मोहल्ला गॉसिप करता है और सुधीजन सोशल मीडिया पर विचार व्यक्त करते हैं कि इसीलिए कोई नहीं चाहता कि बेटी पैदा हो.
लोग सब कहते हैं, बस ये एक सवाल नहीं करते कि लड़कियां क्यों भाग जाती हैं घर से? वो घर में रहते हुए प्रेम में भी क्यों नहीं रह सकती थीं? प्रेम में रहने की शर्त बाप के घर में न रहना ही क्यों थी?
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आपके पास सही जवाब नहीं है, क्योंकि आपने कभी सही सवाल नहीं पूछा.

18वीं सदी के एक बड़े रूसी लेखक निकोलाई चेर्नीश्वेस्की ने 1863 में एक उपन्यास लिखा था- “व्हॉट इज टू बी डन.” उस उपन्यास की नायिका वेरा 21 साल की उम्र में शादी कर लेती है क्योंकि वो जिस घर में रहती है, वहां से भागना चाहती है. उस घर में उस पर सौ पहरे, सौ पाबंदियां है. उसे रोज ठोंक-पीटकर अच्छी लड़की बनने का पाठ पढ़ाया जाता है. मां हर वक्त उस पर लेंस ताने रहती है. बड़ी होती लड़की की पवित्रता बचाए रखने के लिए पूरा परिवार मुस्तैद है. ताकि शादी की रात उसके पति को एक अनछुई, कुंवारी लड़की तोहफे में सौंपी जाए. जिसने बेटी पैदा की, उसके लिए अपनी बेटी की वर्जिनिटी बचाने से बड़ा कोई दायित्व नहीं, और बचा लेने से बड़ी कोई उपलब्धि नहीं.

वेरा के लिए इस कैद से निकलने की एक ही राह है- शादी. घरवालों और दुनिया की नजर में जो शादी दिख रही है, वो दरअसल वेरा और उसके पति के बीच एक सीक्रेट कॉन्ट्रैक्ट है. वो लड़का उस कैद से निकलने में सिर्फ उसकी मदद कर रहा है.



जर्मन-टर्किश फिल्मकार फतिह अकिन की फिल्म “हेड ऑन” की भी कुछ ऐसी ही कहानी है. जर्मनी में रह रहा टर्किश परिवार तुर्क के अलावा किसी और समुदाय में बेटी की शादी करने को राजी नहीं. लड़की घर से बाहर नहीं जा सकती, दोस्तों के साथ नहीं घूम सकती, नौकरी नहीं कर सकती. ये सब करने की इजाजत सिर्फ शादी के बाद है और वो भी किसी तुर्क से. घर ऐसा कि पिता के सामने मां की जबान नहीं खुलती. भाई आंखें तरेरे बिना बात नहीं करता. मजाल है, जो बाप-भाई के सामने मुंह से चूं निकल जाए. लड़की को एक दिन एक तुर्क लड़का मिलता है. दोनों के बीच न प्यार, न दोस्ती, न कोई फीलिंग. बस शादी कर लो ताकि मैं उस घर से निकल सकूं. और वो शादी करके उस कैद से भाग जाती है. यहां शादी सिर्फ शादी नहीं है. शादी वो सड़क है, जो आजादी की ओर जाती है.

हालांकि फिल्म की आगे की कहानी भी कोई सुंदर नहीं. लेकिन उस तुर्क घर के अंदर भी कहानी कौन बड़ी सुंदर थी. जिस लड़की का पैदा होना ही परिवार के लिए एक ट्रेजेडी हो, उसकी जिंदगी कैसे त्रासदियों का लंबा सिलसिला नहीं होगी.

15 साल पहले एक बड़े मल्टीनेशनल में काम कर रही मेरी मौसी की बेटी को उसकी कंपनी अमेरिका भेज रही थी. मौसी ने मना कर दिया. कहा, “शादी के बाद पति से पूछकर जहां जाना हो जाना. अभी तो हम नहीं भेजेंगे.”

मेरे एक दोस्त की बहन का कॉलेज का ग्रुप गोआ पिकनिक मनाने जा रहा था. दोस्त ने बहन को नहीं जाने दिया. कहा, “शादी के बाद पति के साथ जाना गोआ.” जबकि वो दोस्त खुद बिना शादी के चार बार गोआ घूम आया था. उसको गोआ जाने के लिए शादी करने की जरूरत नहीं थी. बहन को थी.



10 साल पहले तक हमारे घर में लड़कियां एक सीमित दायरे से बाहर कुछ भी करना चाहें तो कहा जाता, “शादी के बाद करना.” जिंदगी का हर काम शादी तक के लिए मुल्तवी रखा हुआ था. घूमना, सजना, जीना, मरना, जो करना शादी के बाद. कोई लड़का जिंदगी के अरमान पूरे करने के लिए बैठकर शादी का इंतजार नहीं कर रहा था. सेक्स करने के लिए भी नहीं. वो रात दस बजे घर लौटे तो कोई पूछता नहीं था, “अभी तक कहां थे.” लड़की की हर एक्टिविटी पर घर-खानदान तो छोड़ो, पूरा मुहल्ला तक नजर रखता था.

अब तो ये सब लिखते-बोलते लगता है, जैसे किसी गुजरे जमाने की बात हो. लेकिन नहीं, जमाना आज भी वहीं है, जहां था. बस मैं थोड़ा आगे निकल आई तो पीछे मुड़कर देखने में सब दूर-दूर नजर आता है. जो आगे नहीं निकल पाईं, उनके लिए जमाना अब भी वहीं ठहरा हुआ है. इलाहाबाद के उस मुहल्ले में आज भी जाने कितनी लड़कियां जिंदगी में थोड़ी सी आजादी, थोड़ी सी खुशी के लिए, सिनेमा देखने, घूमने और गोआ जाने के लिए शादी का इंतजार कर रही हैं. उन्हें यकीन नहीं कि ये सब अकेले अपने दम पर भी मुमकिन है. ये सब करने के लिए उन्हें एक लड़के की दरकार है.

बंद समाजों, कुंठित घरों और मर्दों के आदेश पर चलने वाले परिवारों की लड़कियां हमेशा लड़के के लिए ही नहीं भागती, न शादी के लिए भागती हैं. वो जिंदगी में बस थोड़ा सा आजाद होने के लिए भाग रही होती हैं. वो बस अपने भाई जितना आजाद होने के लिए भागती हैं. वो बस थोड़े से सपने देख सकने, थोड़ा सा इंसान हो सकने के लिए भागती हैं. जैसे आलोक धन्वा ने अपनी उस कविता “भागी हुई लड़कियां” में लिखा था कि जब भी भागती है कोई लड़की तो जरूरी नहीं कि साथ में कोई लड़का भी भागा होगा. तो सच तो ये है कि हर बार प्रेम के लिए ही नहीं भागती लड़कियां. वो सिर्फ जिंदा रह सकने के लिए भी भागती हैं. वो भागती हैं क्योंकि अपनी मां जैसी जिंदगी नहीं जीना चाहतीं.

ये भागना अनेकों बार दुर्भाग्य भी लेकर आता है, लेकिन जिस घर से भागी थीं वो, वहां भी कौन सा सौभाग्य आया था उनके हिस्से. जैसे पैदा हुईं, जैसे पाली गईं, दुर्भाग्य कहीं उनका पीछा नहीं छोड़ेगा. बाप के लिए वो इंसान नहीं, घर की इज्जत होंगी. जिस लड़के से प्रेम करेंगी, उसके लिए प्यार नहीं, भोगने वाली देह होंगी. जिस सड़क पर चलेंगी, छेड़ने वाला माल होंगी. जिस घर में ब्याही जाएंगी, सेवा करने वाली दासी होंगी.

यहां दिल्ली में बैठकर अगर हमें लगता है कि दुनिया बदल गई है, कि ये सब किसी गुजरे जमाने की बात हुई तो बाबा नागार्जुन के शब्दों में हम “सुगंधित मूर्ख” हैं, बल्कि मूर्ख नहीं, हम धूर्त हैं.

लड़कियों का दुर्भाग्य, उनके भागने ने नहीं, उनके घर ने, इस समाज ने, इसके मूल्यों, संस्कारों और परवरिश ने उसी दिन लिख दिया था, जिस दिन वो पैदा हुई थीं.

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First published: July 16, 2019, 1:35 PM IST
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