बस्तर: शॉर्ट फिल्म से माओवादियों को सही रास्ते पर लाएगी पुलिस

इस शॉर्ट फिल्म का नाम 'नई सुबह का सूरज' है, जो एक सच्ची घटना पर आधारित है. इसे वहां तैनात एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने लिखा है

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Updated: July 19, 2019, 11:39 AM IST
बस्तर: शॉर्ट फिल्म से माओवादियों को सही रास्ते पर लाएगी पुलिस
बस्तर में पुलिस ने माओवादियों के खिलाफ एक नया मोर्चा खोला है. (सांकेतिक तस्वीर)
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Updated: July 19, 2019, 11:39 AM IST
(रौनक शिवहरे)

बस्तर में पुलिस ने माओवादियों के खिलाफ एक नया मोर्चा खोला है. एक आईपीएस अधिकारी की अगुआई में सैकड़ों जवान आने वाले स्वतंत्रता दिवस पर माओवादियों के खिलाफ एक नए हमले की तैयारी कर रहे हैं, और यह हमला है- एक शॉर्ट फिल्म.

इस शॉर्ट फिल्म का नाम 'नई सुबह का सूरज' है, जो एक सच्ची घटना पर आधारित है. इसे वहां तैनात एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने लिखा है. वर्तमान में बस्तर के दर्शनीय स्थानों पर इस फिल्म की शूटिंग चल रही है. फिल्म का उद्देश्य न केवल माओवादी प्रोपेगैंडा को रोकना है, बल्कि पर्यटन को बढ़ावा देना भी है.

10 मिनट की इस शॉर्ट फिल्म में स्थानीय पुलिस और माओवादियों से मुकाबला करने वाले बल से 100 जवानों को दिखाया गया है. फिल्म की कहानी से लेकर संवाद और गानों तक सभी को आपीएस अधिकारी सूरज सिंह परिहार ने लिखा है, जो कि दंतेवाडा में नियुक्त हैं. वह भी फिल्म में अभिनय कर रहे हैं. एसपी रैंक के अधिकारी अभिषेक पल्लव और राय वैभव मिश्रा, फिल्म के डायरेक्शन और प्रोडक्शन में शामिल हैं.

करेली के जंगलों में 'नई सुबह का सूरज' की शूटिंग की जा रही है, जहां सात साल पहले माओवादियों ने एक पुलिस स्टेशन पर घात लगाकर हमला किया था और वहां तैनात जवानों पर अंधाधुंध गोलीबारी की थी.

पुलिस जवान निभा रहे मुख्य किरदार

पुलिस ने अपने जवानों को गणपति, हिडमा और हौन्गी की भूमिकाओं के लिए भी तैयार किया है. बता दें कि गणपति, हिडमा सीपीआई (माओवादी) के मोस्ट वॉंटेड लीडर हैं. सीपीआई (माओवादी) के पूर्व बॉस, महासचिव गणपति की भूमिका निभाने के लिए भिलाई के एक अभिनेता को बुलाया गया है. हौन्गी फिल्म की मुख्य किरदार है, जिसे डीआरजी जवान सुनैना पटेल निभा रही हैं.
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यह फिल्म हौन्गी के जीवन पर आधारित है जिसका माओवादियों से मोहभंग हो जाता है और वह सूरज सिंह परिहार से निवेदन करती है कि वह चाहती हैं कि उसका तीन साल का बेटा गोरिल्ला फोर्स जॉइन करने के बजाय स्कूल जाए. परिहार उसकी बात मान लेते हैं और उसके बेटे को उसके अतीत का पता चले बिना पास के स्कूल में छात्र बनने की व्यवस्था करते हैं. हौन्गी के जीवन में यह नया सवेरा है और यहीं से फिल्म का नाम आया है.



ऐसे आया फिल्म का आइडिया

परिहार ने कहा, "जब से मैं यहां तैनात हुआ हूं स्थानीय ग्रामीणों के दर्द को समझने के लिए काम कर रहा हूं, जिनमें से कुछ को नक्सलियों ने जबरन भर्ती किया था. मैं उन सभी के बारे में लिख रहा हूं जो मैंने यहा सीखा. मैं कविता और लघु कहानियां लिखने का प्रयास कर रहा था.. यह शॉर्ट फिल्म उन सभी प्रयासों का परिणाम है."

न्यूज18 से बात करते हुए दंतेवाडा के अभिषेक पल्लव ने कहा, "माओवाद के बारे में कहानियां आमतौर पर ट्विस्ट करके बताई जाती हैं जो आत्मसमर्पित माओवादियों के दर्द से मेल नहीं खाती हैं. उस गलती को सुधारने के उद्देश्य से इस फिल्म की शूटिंग की जा रही है. हमने इस फिल्म के लिए माओवाद पर कई विशेषज्ञों से सलाह ली है."

फिल्म को बस्तर के स्कूलों और आश्रमों में वितरित किया जाएगा और इसे विभिन्न माध्यमों से प्रमोट किया जाएगा. पल्लव ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इससे लोगों की मानसिकता में बदलाव आएगा.

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First published: July 19, 2019, 11:38 AM IST
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