नेहरू-शास्त्री सरकार तक भी होते थे 'वन नेशन वन इलेक्शन', अब ऐतराज क्यों?

बुधवार को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में वन नेशन, वन इलेक्शन के विचार, 2022 में आजादी के 75वें जश्न, महात्मा गांधी के इसी साल 150वें जयंती वर्ष को मनाने समेत कई मामलों पर चर्चा की गई.

Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: June 19, 2019, 9:38 PM IST
नेहरू-शास्त्री सरकार तक भी होते थे 'वन नेशन वन इलेक्शन', अब ऐतराज क्यों?
पीएम मोदी वन नेशन, वन इलेक्शन मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक की अध्यक्षता करते हुए (फोटो साभार-पीएमओ)
Ravishankar Singh
Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: June 19, 2019, 9:38 PM IST
पीएम मोदी की 'वन नेशन- वन इलेक्शन' के प्रस्ताव को लेकर बुधवार को सभी पार्टियों की एक बैठक बुलाई गई. इस मीटिंग में प्रस्ताव को लेकर एक कमिटी बनाई जाएगी, जो इसके सभी पक्षों पर विचार करके अपनी रिपोर्ट देगी. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, टीएमसी अध्यक्ष ममता बनर्जी, बीएसपी सुप्रीमो मायावती, आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इस मीटिंग में शामिल नहीं हुए. वहीं, वाईएसआर कांग्रेस, बीजू जनता दल, लेफ्ट और टीआरएस जैसी पार्टियां इस बैठक में शामिल हुईं.

उड़ीसा के सीएम नवीन पटनायक ने 'वन नेशन वन इलेक्शन' के प्रस्ताव का समर्थन किया. आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और वाईएसआर कांग्रेस के प्रमुख जगन मोहन रेड्डी ने भी एक देश एक चुनाव का समर्थन किया. एनसीपी प्रमुख शरद पवार, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, नेशनल कांफ्रेंस के फारूक अब्दुल्लाह, एनडीए के सभी सहयोगी दल, टीआरएस की तरफ से केसीआर के बेटे केटीआर इस बैठक में शामिल हुए. पीएम मोदी ने इस बैठक की अध्यक्षता की.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह वन नेशन, वन इलेक्शन की सोच को लेकर हुई सर्वदलीय बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए


21 पार्टियों ने दिया प्रस्ताव को समर्थन

बैठक के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मीडिया से बात करते हुए कहा, 'हमने वन नेशन, वन इलेक्शन को लेकर 40 राजनीतिक पार्टियों को आमंत्रित किया था, लेकिन 21 पार्टियां ही इस बैठक में शामिल हुईं. तीन राजनीतिक पार्टियों ने पत्र के जरिए अपनी राय रखी. बैठक में शामिल लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों ने वन नेशन, वन इलेक्शन को लेकर सहमति दी, लेकिन लेफ्ट की राय थोड़ा अलग थी, हालांकि लेफ्ट ने भी इस आइडिया का विरोध नहीं किया. वन नेशन, वन इलेक्शन पर सुझाव के लिए कमेटी बनाई जाएगी.'

बुधवार को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में वन नेशन, वन इलेक्शन के विचार, 2022 में आजादी के 75वें जश्न, महात्मा गांधी के इसी साल 150वें जयंती वर्ष को मनाने समेत कई मामलों पर चर्चा की गई. बीजेपी नेताओं का कहना है कि पीएम मोदी मानते हैं कि वन नेशन, वन इलेक्शन के विचार को बीजेपी या मोदी के एजेंडा के तौर पर नहीं देखना चाहिए. ये देश का एजेंडा होना चाहिए. वन नेशन, वन इलेक्शन पर विशेषज्ञों ने भी अपनी-अपनी राय रखी है.

भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने भी पीएम मोदी के वन नेशन, वन इलेक्शन की बात पर अपनी सहमति दी है

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क्या कहते हैं भारत के पूर्व चुनाव आयुक्त?

भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने कहा है कि वन नेशन, वन इलेक्शन से फायदा भी है और इसका नुकसान भी है. न्यूज 18 हिंदी के साथ बातचीत में कुरैशी ने कहा है कि वन नेशन, वन इलेक्शन की बात बेहतरीन है. लोकसभा चुनाव और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ होने से कई फायदे होंगे. अगर यह प्लान देश में लागू हो गया तो इससे देश की अर्थव्यवस्था में काफी सुधार देखने को मिलेंगे, लेकिन इससे नुकसान से भी इंकार नहीं किया जा सकता.

एसवाई कुरैशी ने कहा है कि पीएम मोदी का यह आइडिया साल 2016 से ही देश में गूंज रहा है. पीएम मोदी ने लोकसभा चुनाव एवं विधानसभा चुनाव साथ-साथ कराने का विचार दिया था. इस मामले को पिछले एक-दो साल से कानून मंत्रालय देख रहा है. मेरा मानना है कि वन नेशन, वन इलेक्शन व्यवस्था देश में लागू करने से पहले और कई मुददों का भी हल होना जरूरी है.

कुरैशी के मुताबिक कानून मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति ने पिछले साल दिसंबर में ही अपनी रिपोर्ट में लोकसभा और राज्यसभा चुनाव साथ-साथ कराए जाने की सिफारिश की थी. इसके बाद कानून मंत्रालय ने इलेक्शन कमीशन से राय मांगी थी. बाद में चुनाव आयोग ने भी कानून मंत्रालय की स्थायी समिति के इस विचार पर अपनी सहमति दे दी थी. चुनाव आयोग ने कहा था कि इसके लिए चुनाव पर खर्च और कुछ राज्यों के विधानसभाओं का कार्यकाल बढ़ाने या घटाने के लिए संविधान में संशोधन करना जरूरी हो जाएगा.

मतदाताओं की फाइल फोटो


70 हज़ार करोड़ रुपए से भी ज्यादा हुए खर्च

चुनाव आयोग ने कानून मंत्रालय को दिए अपने जवाब में कहा कि वह इस प्रस्ताव का समर्थन करता है, लेकिन इस पर 9 हजार करोड़ रुपए से अधिक का खर्च आएगा. चुनाव आयोग ने सरकार तथा समिति को बताया था कि एक साथ चुनाव कराने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें तथा वोटर वेरिफियेबल पेपर ऑडिट ट्रायल (वीवीपीएटी) मशीनें खरीदनी होंगी. आयोग ने कहा कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ साथ कराने के लिए ईवीएम और वीवीपीएटी मशीनें खरीदने के वास्ते 9 हजार 284 करोड़ 15 लाख रुपए की जरूरत पड़ेगी.

एक अनुमान के मुताबिक इस लोकसभा चुनाव  में भी 70 हजार करोड़ रुपए से भी अधिक खर्च किए गए हैं. ऐसा माना जा रहा है कि इस बार का सत्रहवीं लोकसभा का चुनाव अब तक के सबसे महंगे चुनावों में से एक रहा है. सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि 17वीं लोकसभा के लिए हुए चुनावों में प्रत्याशियों की ओर से करीब 60 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए हैं. चुनाव आयोग ने भी इस राशि के 15-20 प्रतिशत के बराबर राशि खर्च की है. ऐसे में कुल 70 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए हैं.

आजादी के बाद  से 1967 तक देश में लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक साथ ही होते थे, लेकिन बाद में कुछ प्रदेशों में राष्ट्रपति शासन लगे और धीरे-धीरे यह व्यवस्था खत्म हो गई. 1952 में पहले लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हुए. 1957, 1962, 1967 तक भी केंद्र और राज्यों के चुनाव एक साथ होते रहे. लेकिन, 1967 के बाद क्षेत्रीय दलों के बनने के बाद संतुलन बिगड़ गया और राज्यों में मध्यावधि चुनाव होने की शुरुआत हो गई. 1971 में पहली बार लोकसभा का मध्यावधि चुनाव हुए. 1971, 1984 में कांग्रेस ने समय से पहले ही लोकसभा भंग कर दिया. 1980, 1991, 1998, 1999 में भी लोकसभा समय से पहले भंग हुए. ऐसे में कुछ जानकारों का मानना है कि पीएम मोदी ने एक बार फिर से इस मुद्दे को उछाल कर सियासी वातावरण को स्वच्छ करने की दिशा में एक कदम बढ़ाया है.

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First published: June 19, 2019, 8:47 PM IST
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