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West Bengal Election 2021: वोटर नहीं खोल रहे अपने पत्ते, इस चुप्पी का क्या है राज़?

West Bengal Assembly Election 2021: इस बार के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी टीएमसी को जबरदस्त चुनौती दे रही है. इन दिनों राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा ज़ोरों पर है कि क्या एंटी इंकम्बेंसी ममता बनर्जी की एक दशक पुरानी सत्ता को खत्म कर देगी?

West Bengal Assembly Election 2021: इस बार के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी टीएमसी को जबरदस्त चुनौती दे रही है. इन दिनों राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा ज़ोरों पर है कि क्या एंटी इंकम्बेंसी ममता बनर्जी की एक दशक पुरानी सत्ता को खत्म कर देगी?

West Bengal Assembly Election 2021: इस बार के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी टीएमसी को जबरदस्त चुनौती दे रही है. इन दिनों राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा ज़ोरों पर है कि क्या एंटी इंकम्बेंसी ममता बनर्जी की एक दशक पुरानी सत्ता को खत्म कर देगी?

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 23, 2021, 10:18 AM IST
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कोलकाता. पश्चिम बंगाल के चुनावी (Bengal Assembly Election 2021) अखाड़े में हर तरफ शोरगुल है. हर पार्टी के नेता ताबड़तोड़ रैलियां कर रहे हैं. एक दूसरे पर भाषण के जरिये निशाना साध रहे हैं. लाउडस्पीकर पर हर तरफ चुनावी प्रचार हो रहा है. लेकिन बंगाल के वोटर चुप हैं. वो किसे वोट देंगे या फिर इस बार किसका पलड़ा भारी है इसको लेकर वोटर अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं. लोग कुछ भी कहने से हिचकिचा रहे हैं.

ये थोड़ा असामान्य है. बंगालियों को बात और बहस करना खासा पसंद है. पहले बस स्टॉप से ​​लेकर चाय के स्टॉल, चमचमाते शॉपिंग मॉल से लेकर पार्क तक, और ट्रेन से लेकर होटल तक हर जगह वो राजनीतिक बहस करते दिख जाते थे. ऐसा नहीं है कि वोटरों ने एकाएक चुप्पी साध ली है. दरअसल बंगाल में चुनाव को लेकर अलग माहौल है. यहां वोटिंग के दौरान लोगों को हिंसा का डर सता रहा है. लोगों को इस बात का भी डर लग रहा है कि अगर वो किसी नेता को वोट नहीं देंगे तो फिर उनके खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई भी की जा सकती है.

इस चुप्पी का क्या मतलब?
वरिष्ठ पत्रकार सुबीर भौमिक इस चुप्पी का मतलब समझाते हुए कहते हैं, 'इस बार चुनाव का नतीजा क्या होगा इसको लेकर लोग पक्के नहीं है. इसलिए वे चुप रहना पसंद करते हैं. दरअसल बंगाल में राजनीतिक प्रतिशोध की परंपरा रही है. लिहाजा इससे भी लोग चिंतित रहते हैं. चुप्पी का मतलब ये भी है कि लोग गुस्से में हैं और बदलाव चाहते हैं.'
साल 2011 में ऐसा नहीं था माहौल


साल 2011 के चुनाव के दौरान भी वोटरों के बीच चुप्पी थी, लेकिन इस तरह की नहीं. उन दिनों लेफ्ट के नेता वोटरों को अपने साथ बनाए रखने के लिए जमकर मेहनत कर रहे थे. इसके बावजूद लोग बदलाव की उम्मीद में ममता बनर्जी के लिए आवाज़ें बुलंद कर रहे थे. लोगों को उन दिनों उम्मीद थी कि ममता लेफ्ट के 34 साल की सत्ता को उखाड़ फेंकेगी. उन दिनों तृणमूल कांग्रेस का नारा- चुप चाप फूले छाप' खासा लोकप्रिय हुआ था.

क्या होगा चुनावी नतीजा?
इस बार के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी टीएमसी को जबरदस्त चुनौती दे रही है. इन दिनों राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा ज़ोरों पर है क्या जनता विरोधी लहर ममता बनर्जी की एक दशक पुरानी सत्ता को खत्म कर देगी? चर्चा इस बात की भी है कि क्या हिंदू वोटों को मजबूत करने की बीजेपी की रणनीति काम आएगी या नहीं? या फिर ममता बनर्जी इस बार जीत की हैट्रिक लगाएगी.

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वोटर की चुप्पी
इन चुनावी हलचल के बीच वोटर अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं वो चुप हैं. दक्षिण कोलकाता में भबानीपुर में रहने वाले एक वोटर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, 'हम यहां बिलकुल नहीं बोलना चाहते हैं. हम नहीं जानते कि मतदान के दिन क्या होगा, लेकिन दोनों पार्टियों के समर्थक वोट मांगने के लिए आ रहे हैं.'

जंगलमहल -पुरुलिया, बांकुरा, झाड़ग्राम और पश्चिम मिदनापुर के चार जिलों में साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया था. बीजेपी को राज्य की 42 लोकसभा सीटों में से 18 सीटों पर जीत मिली थी. लेकिन इन इलाकों में टीएमसी सरकार ने जो काम किया है, वो जमीनी स्तर पर दिख रहा है. स्कूल बन गए हैं और यहां सड़कें भी बन गई हैं. (पूरा आर्टिकल पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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