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नंदीग्राम का संग्राम: ममता बनर्जी के खिलाफ बीजेपी ने आखिर शुभेंदु अधिकारी को ही मैदान में क्यों उतारा?

ममता बनाम अधिकारी, कौन मारेगा बाज़ी?

ममता बनाम अधिकारी, कौन मारेगा बाज़ी?

Battle of Nandigram: सुवेंदु अधिकारी हर अच्छे और बुरे वक्त में ममता बनर्जी के साथ रहे. अधिकारी का करीब 20 साल का रिश्ता 27 नवंबर 2020 को खत्म हो गया. वो बीजेपी में शामिल हो गए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 7, 2021, 12:39 PM IST
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(सुजीत नाथ)

कोलकाता. पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव (West Bengal Election 2021) के लिए उल्टी गिनती शुरू हो गई है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने उम्मीदवारों की घोषणा पहले की कर दी है. जबकि बीजेपी की तरफ से भी कैटिडेट्स की पहली लिस्ट आ गई है. वैसे तो वोटिंग 294 सीटों के लिए होगी. लेकिन हर किसी की निगाहें इस बार नंदीग्राम (Nandigram) सीट पर टिकीं है. एक ऐसी सीट जिस पर बीजेपी और टीएसमी दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर हैं. ममता बनर्जी बनाम शुभेंदु अधिकारी. एक ऐसा मुकाबला जो बंगाल की राजनीति को नई दिशा दे सकता है. सवाल उठता है कि आखिरी बीजेपी ने ममता बनर्जी को घरने के लिए शुभेंदु अधिकारी पर ही दांव क्यों खेला. क्या वो नंदीग्राम में ममता के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं.

ममता और शुभेंदु अधिकारी का पुराना रिश्ता रहा है. साल 2007 की नंदीग्राम की घटना आपको याद होगी. उस वक्त पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्जी ने नंदीग्राम में एक केमिकल फैक्ट्री लगाने की योजना बनाई थी. इसके तहत इंडोनेशिया की सलेम ग्रुप के लिए नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण किया जाना था. लेकिन इस प्रोजेक्ट का भारी विरोध हुआ. इसके बाद पुलिस फायरिंग में 14 लोगों की मौत हो गई. सीबीआई की जांच के बाद इस प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया गया. ममता ने मार्च 2007 में नंदीग्राम का दौरा किया. इस घटना के बाद उन्हें बंगाल से 34 साल बाद लेफ्ट की सरकार को उखाड़ फेंकने का मौका मिल गया. ममता की राजनीति ने यही से यू टर्न लिया.



ममता और शुभेंदु अधिकारी के मजबूत रिश्ते
नंदीग्राम की घटना में जिन लोगों के परिवार के सदस्य मारे गए थे, ममता ने उनके प्रति सहानुभूति जताई. उस वक्त ममता ने ग्रीन वैली रिजॉर्ट से नंदीग्राम पुलिस स्टेशन तक की यात्रा की. 54 किलोमीटर के इस मार्च में ममता को लोगाों का भारी समर्थन मिला. कहा जाता है कि इस रणनीति के पीछे शुभेंदु अधिकारी का भी दिमाग था. वो उन दिनों किसी साये की तरह ममता के साथ रहते थे. अधिकारी हर अच्छे और बुरे वक्त में ममता के साथ रहे. अधिकारी का करीब 20 साल का रिश्ता 27 नवंबर 2020 को खत्म हो गया. वो बीजेपी में शामिल हो गए.

आखिर शुभेंदु ही क्यों?
साल 2019 के लोकसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी बंगाल में कई जिलों के प्रभारी थे, लेकिन टीएमसी ने यहां कोई खास प्रदर्शन नहीं किया. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर बीजेपी ने उन्हें अपने खेमे में शामिल करने की दिलचप्सी क्यों दिखाई. दरअसल अधिकारी और ममता दोनों नंदीग्राम और सिंगुर आंदोलन से निकल कर आए हैं. ऐसे में बीजेपी ममता बनर्जी पर उनके हथियार से ही वार करना चाहती है, जिससे कि उन्हें ज्यादा दर्द हो. इतना ही नहीं बीजेपी को नंदीग्राम में सत्ता विरोधी लहर का फायदा भी मिल सकता है.

2019 में अधिकारी का प्रदर्शन
आईए एक नजर डालते हैं 2019 के लोकसभा में शुभेंदु के प्रदर्शन पर. टीएमसी ने 13 में से नौ लोकसभा सीटें खो दी हैं, जहां शुभेंदु को एक बड़े नेता के तौर पर देखा जाता है. पुरुलिया, झारग्राम, मुर्शिदाबाद, मालदा, पूर्वी मिदनापुर पश्चिम मिदनापुर, बांकुरा और बिष्णुपुर में शुभेंदु का दबदबा है. लेकिन इसके बावजूद टीएसी को हार का सामना करना पड़ा. कुल मिलाकर, पुरुलिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, पश्चिम मिदनापुर, झाड़ग्राम, पूर्वी मिदनापुर, बांकुरा और बिष्णुपुर में कुल 13 लोकसभा सीटें और 86 विधानसभा सीटें हैं जहां शुभेंदु को बूथ मैनेजमेंट का एक्सपर्च माना जाता है. (पूरा आर्टिकल पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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