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हिंसा मामलाः बंगाल सरकार ने SIT की मदद के लिए किया 10 आईपीएस अधिकारियों को नियुक्त

चुनाव बाद पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा की जांच सीबीआई कर रही है. हिंसा मामले में जांच एजेंसी ने अब तक 31 केस दर्ज किए हैं.

चुनाव बाद पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा की जांच सीबीआई कर रही है. हिंसा मामले में जांच एजेंसी ने अब तक 31 केस दर्ज किए हैं.

कलकत्ता उच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय पीठ ने चुनाव के बाद हिंसा की घटनाओं की जांच के लिए 19 अगस्त को एसआईटी के गठन का आदेश दिया था जिसमें भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी सोमेन मित्रा, सुमन बाला साहू और रणबीर कुमार शामिल थे.

  • News18Hindi
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    कोलकाता. पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य में चुनाव के बाद हिंसा के मामलों की जांच के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) की मदद करने के लिए 10 आईपीएस अधिकारियों को नियुक्त किया है. एक वरिष्ठ अधिकारी ने बृहस्पतिवार को बताया कि अधिकारियों को कोलकाता पुलिस के तहत आने वाले इलाकों के साथ ही राज्य के उत्तर, पश्चिम और दक्षिण जोन के लिए तैनात किया गया है.

    राज्य के गृह विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार, ‘‘आईपीएस अधिकारियों को माननीय कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा गठित एसआईटी की मदद करने के लिए उन्हें नियमित कार्यों से छूट दी जाती है.’’ कलकत्ता उच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय पीठ ने चुनाव के बाद हिंसा की घटनाओं की जांच के लिए 19 अगस्त को एसआईटी के गठन का आदेश दिया था जिसमें भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी सोमेन मित्रा, सुमन बाला साहू और रणबीर कुमार शामिल थे.

    जानकारी के मुताबिक, पश्चिम बंगाल सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल कर दी है, लेकिन अभी सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री की ओर से इस याचिका का परीक्षण किया जा रहा है. परीक्षण का काम पूरा होने के बाद मामले को सूचीबद्ध किया जाएगा.

    राज्य सरकार ने अपनी विशेष अनुमति याचिका में आरोप लगाया है कि उसे केंद्रीय एजेंसी से निष्पक्ष और न्यायसंगत जांच की उम्मीद नहीं है, जो सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारियों के खिलाफ मामले दर्ज करने में व्यस्त है. इससे पहले वकील अनिंद्य सुंदर दास ने शीर्ष अदालत में एक ‘कैविएट’ याचिका दायर कर आग्रह किया था कि यदि राज्य या अन्य वादी अपील करते हैं तो उनकी सुनवाई के बिना कोई आदेश पारित नहीं किया जाना चाहिए. अनिंद्य सुंदर दास उन जनहित याचिकाकर्ताओं में से एक थे जिनकी याचिका पर 19 अगस्त को उच्च न्यायालय का फैसला आया था.

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