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गुजरात: BJP से मिला 'धोखा', कराडिया राजपूतों ने कहा- लोकसभा चुनाव में सिखाएंगे सबक

2017 में कारडिया राजपूतों का प्रदर्शन

2017 में कारडिया राजपूतों का प्रदर्शन

दानसिंह मोरी कहते हैं, "भावनगर में अगले सप्ताह समुदाय के सदस्यों की मीटिंग होगी जिसमें बीजेपी के खिलाफ एक्शन लेने की योजना पर विचार किया जाएगा. हम अगले सप्ताह प्रदर्शन रैली की तारीख की घोषणा करेंगे."

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    (विजयसिंह परमार)

    लोकसभा चुनाव से ठीक पहले गुजरात के सौराष्ट्र इलाके में कराडिया राजपूत बीजेपी के खिलाफ अपनी ताकत दिखाने की तैयारी कर रहे हैं. कराडिया राजपूतों का कहना है कि बीजेपी ने 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले उनसे जो वादे किये थे उन्हें पूरा नहीं किया गया, जिसके कारण वे प्रदर्शन करने पर मजबूर हो रहे हैं.

    कराडिया राजपूत ओबीसी समुदाय से संबंध रखते हैं. 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले समुदाय के लोग उस वक्त एकत्रित हो गए, जब जमीन के मुद्दे को लेकर भावनगर के नजदीक बुधेल गांव के पूर्व सरपंच दानसिंह मोरी को सस्पेंड कर दिया गया और उनका उत्पीड़न किया गया. कथित तौर पर इसके आदेश गुजरात बीजेपी प्रमुख जीतू वघानी ने दिए थे.

    इस उत्पीड़न के खिलाफ कराडिया समुदाय के लोगों ने पूरे राज्य में प्रदर्शन किया. हालांकि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल और सौराष्ट्र के कराडिया समुदाय से आने वाले कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के दखल के बाद प्रदर्शनों को रोक दिया गया.

    45 साल के दानसिंह मोरी ने न्यूज18 से बात करते हुए कहा, "बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और बीजेपी के अन्य नेताओं के साथ मीटिंग के दौरान हमें आश्वासन दिया गया कि मेरे खिलाफ दर्ज पुलिस केस वापस ले लिए जाएंगे और हम प्रदर्शन वापस लेकर चुनाव में बीजेपी का समर्थन करेंगे. लेकिन आश्वासन के दो साल बाद भी कोई केस वापस नहीं लिया गया, मेरे खिलाफ नए केस दर्ज किए गए हैं और मेरे परिवार का उत्पीड़न जारी है. इसलिए बीजेपी को सबक सिखाने के लिए समुदाय के सदस्यों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन करने का फैसला किया है."

    परंपरागत रूप से कराडिया राजपूत बीजेपी को वोट देते रहे हैं. भावनगर और जूनागढ़ लोकसभा सीट पर ये समुदाय निर्णायक साबित हो सकता है.

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    दानसिंह मोरी कहते हैं, "भावनगर में अगले सप्ताह समुदाय के सदस्यों की मीटिंग होगी जिसमें बीजेपी के खिलाफ एक्शन लेने की योजना पर विचार किया जाएगा. हम अगले सप्ताह प्रदर्शन की तारीख की घोषणा करेंगे."

    दरअसल 2014 में वजुभाई वाला के कर्नाटक का राज्यपाल बनने के बाद कराडिया राजपूत राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं. वजुभाई वाला गुजरात बीजेपी के सीनियर नेता थे जो 1998 से 2012 तक महत्वपूर्ण फाइनेंस पॉर्टफोलियो पर रहे. 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वजुभाई वाला मुख्यमंत्री बनने की रेस में शामिल थे. हालांकि मुख्यमंत्री का पद आनंदीबेन पटेल को सौंपकर, वाला को कर्नाटक का राज्यपाल बना दिया गया.



    वजुभाई वाला के गुजरात के राजनीतिक परिदृश्य से बाहर होने के बाद कराडिया समुदाय को राजनीतिक अवसान के दौर से गुजरना पड़ रहा है. 2017 के विधानसभा चुनाव में समुदाय का एक भी सदस्य चुनकर विधानसभा नहीं पहुंचा. यहां तक कि कराडिया समुदाय के जिन नेताओं ने बीजेपी के टिकट पर भी चुनाव लड़ा था वे भी चुनाव हार गए.

    समुदाय के एक सीनियर नेता ने न्यूज18 से बात करते हुए कहा, "हालांकि, 2017 के चुनाव से पहले कराडिया नेताओं ने बीजेपी से समझौता कर लिया, लेकिन युवाओं को विश्वास में नहीं लिया गया और वे समुदाय के नेताओं से गुस्सा थे. बीजेपी ने कराडिया के घावों पर नमक छिड़का, क्योंकि उन्हें उनके द्वारा वादों के कारण समर्थन दिया गया था, लेकिन उन्होंने समुदाय के नेताओं को अपने विरोध के बारे में फिर से सोचने के लिए मजबूर किया है जो बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण होगा.”

    अखिल गुजरात राजपूत समाज के कंभा गोहिल ने न्यूज 18 से बात करते हुए कहा, "अमित शाह सहित बीजेपी नेताओं ने हमसे वादा किया था कि दानसिंह मोरी के खिलाफ दर्ज केस वापस ले लिए जाएंगे, लेकिन अब वे भूल गए हैं और हमारा फोन भी नहीं उठा रहे हैं. हमने गुजरात में बीजेपी को खड़ा करने के लिए कई साल लगाए लेकिन अब हमें नजरअंदाज किया जा रहा है. हम भविष्य की योजनाओं को लेकर अगले सप्ताह मीटिंग कर रहे हैं."

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