Bihar Elections 2020: अपने काम गिनाने के बजाय लालू यादव की नाकामियां क्यों गिना रहे हैं नीतीश कुमार?

नीतीश ने अपनी '7 निश्चय योजना' के दूसरे भाग का अनावरण किया है, जो चुनावी वादों का एक सेट है. इसमें लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के प्रमुख चिराग पासवान के विद्रोह को फोकस में रखा गया है.
नीतीश ने अपनी '7 निश्चय योजना' के दूसरे भाग का अनावरण किया है, जो चुनावी वादों का एक सेट है. इसमें लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के प्रमुख चिराग पासवान के विद्रोह को फोकस में रखा गया है.

2015 के चुनाव में बिहार ने महागठबंधन में एक राजनीतिक प्रयोग देखा. एक दूसरे के कट्टर-प्रतिद्वंद्वी, लेकिन समाजवादी आंदोलन के मित्र, नीतीश कुमार (Nitish Kumar) और लालू यादव (Lalu Yadav) एक साथ गए थे. नीतीश चुनाव में सीएम चेहरा थे और लालू सोशल इंजीनियरिंग की ताकत थे. तब चुनाव में 'जंगल राज' का टैग भुला दिया गया था.

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  • Last Updated: October 12, 2020, 3:29 PM IST
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(मारिया शकील)

नई दिल्ली/पटना. किसी के साथ किसी की तुलना एक स्मार्ट मार्केटिंग रणनीति हो सकती है, लेकिन राजनीति में इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब 'परिवर्तन' और 'आशा' की कहानी अपना आकर्षण खो देती है. और जब तुलना समय और विचारों दोनों में बराबरी की नहीं होती, तब ये जनमत में गिरावट को जन्म देती है. बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) इन दिनों यही कर रहे हैं. नीतीश अपनी सरकार की सफलताएं और काम गिनाने के बजाय लालू प्रसाद यादव के 15 साल के कार्यकाल की नाकामियां (15 years of Nitish Kumar vs 15 years of Lalu Yadav) गिना रहे हैं.

'आया तो बार बार संदेशा अमीर का, हमसे मगर ना हो सका सौदा ज़मीर का'. नीतीश कुमार जनता के बीच कुछ यूं अपने और लालू के बीच फर्क को बता रहे हैं. नरेंद्र मोदी ने जून 2013 में नीतीश कुमार को गोवा में हुए बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की अभियान समिति के अध्यक्ष के रूप में घोषित किया था. फिर बाद में कुछ समय के लिए नीतीश बीजेपी से अलग हुए और विपक्ष ने उन्हें संभावित प्रधानमंत्री कैंडिडेट के तौर पर प्रोजेक्ट किया. हालांकि, नीतीश वापस बीजेपी के साथ गठजोड़ कर चुके हैं और बाकी का इतिहास हम सब जानते हैं.



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समाजशास्त्री मनीषा प्रियम ने नीतीश कुमार की तुलनात्मक थ्योरी पर आधारित चुनाव प्रचार पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसा करने से जेडीयू खुद को आरजेडी के साथ एक समान मंच पर ला रही है. मनीषा प्रियम कहती हैं, 'यह एक गैर-तुलना है, क्योंकि नीतीश कुमार की सुशासन बाबू की छवि है. ऐसे में उन्हें अपने 15 साल की लालू के 15 साल से तुलना करने की जरूरत क्या है? उन्हें आरजेडी के साथ तुलना करने की क्या जरूरत है, जिसका नेतृत्व तेजस्वी यादव जैसे युवा नेता कर रहे हैं? शायद 2005 में ऐसा करना अच्छा था, लेकिन अब क्यों? '

ऐसे में सवाल ये है कि क्या नीतीश कुमार अब रक्षात्मक हो गए हैं, क्योंकि वो तीसरी बार 'जंगल राज' का डर बेचने की कोशिश कर रहे हैं. सवाल ये भी है कि क्या बिहार चुनाव में जनता से वोट मांगने के लिए नीतीश के पास मुद्दे नहीं हैं? नीतीश ने अपनी '7 निश्चय योजना' के दूसरे भाग का अनावरण किया है, जो चुनावी वादों का एक सेट है. इसमें लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के प्रमुख चिराग पासवान के विद्रोह को फोकस में रखा गया है.


2015 के चुनाव में बिहार ने महागठबंधन में एक राजनीतिक प्रयोग देखा. एक दूसरे के कट्टर-प्रतिद्वंद्वी, लेकिन समाजवादी आंदोलन के मित्र, नीतीश कुमार और लालू यादव एक साथ गए थे. नीतीश चुनाव में सीएम चेहरा थे और लालू सोशल इंजीनियरिंग की ताकत थे. तब चुनाव में 'जंगल राज' का टैग भुला दिया गया था और लोगों को याद दिलाने में नीतीश मुखर थे. नीतीश ने बताया था कि ये अवसरवाद का गठबंधन था.

नीतीश कुमार ने 2005 से 2013 तक बीजेपी के साथ सरकार चलाई थी. ये वे साल थे जब बिहार में कई परिवर्तन हुए. बिहारियों के लिए नीतीश बिहारी एक उम्मीद की किरण थे. इस दौरान बिहार ने पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण, आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों (ईबीसी) के लिए आरक्षण जैसे कई अहम फैसले लिए गए. कानून के शासन में लोगों का विश्वास बहाल हुआ. बिहार की जनता ने उन्हें 2010 में और भी बड़ा जनादेश दिया. 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में NDA ने 206 सीटें जीतीं.

उस चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल को विपक्ष के नेता पद की दावेदारी के लिए भी पर्याप्त सीटें नहीं मिलीं. अगले कुछ वर्षों में नीतीश की राजनीतिक अखंडता, साफ-सुथरी छवि स्थापित हुई. उन्हें 'सुशासन बाबू' (सुशासन का व्यक्ति) के रूप में पहचान मिली. लेकिन, फिर राजनीतिक उथल-पुथल का युग आया. इससे सुशासन बाबू का शासन भी प्रभावित हुआ.

बिहार सरकार के गृह विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, सीएम के रूप में अपने पहले पांच वर्षों की तुलना में, नीतीश कुमार के तीसरे कार्यकाल के दौरान अपराध के मामलों में बढ़ोतरी हो गई. अपहरण की संख्या में लगभग पांच गुना वृद्धि हुई. राज्य में कथित बलात्कार के मामले 1.5 गुना बढ़ गए. राज्य ने 2005 की तुलना में 2019 में हत्या, डकैती, लूट, चोरी और चोरी की घटनाएं भी बढ़ी हैं
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नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में शिक्षा क्रांति हुई थी. बिहार की सड़कों पर साइकिल चलाती लड़कियां राज्य में सुशासन सरकार की पहचान बन गई. 2005-06 के बाद से प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में लड़कियों की नामांकन दर 20% के करीब रही. फिर गिरावट का दौर आया. 2016-2017 में बिहार में सबसे ज्यादा प्राथमिक शिक्षा की पढ़ाई छोड़ने वाले मामले 38.69% दर्ज किए गए, जो राष्ट्रीय औसत 26.96% से बहुत अधिक है. 2018 में मुजफ्फरपुर शेल्टर होम केस सामने आया.

एक मेडिकल जांच में पता चला कि इस शेल्टर होम में रहने वाले 42 में से 34 कैदियों का यौन शोषण किया गया. इनमें से कई प्रेग्नेंट हो गईं थी और उनका बच्चा भी गिरा दिया गया. मामला आखिरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और नीतीश कुमार की तीखी आलोचना हुई. फिर पटना से 250 किमी दूर त्रिवेणीगंज के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में ऐसी ही घटना हुई.

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2019 में बिहार में बाढ़ देखी गई और बिहार के डिप्टी सीएम सुशील मोदी की तस्वीरों को उनके पटना घर से निकाले जाने की खबरें राष्ट्रीय समाचार चैनलों पर छाईं। यह दर्शाता है कि राज्य की खराब शहरी संरचना, खराब जल निकासी प्रणाली एक गंभीर समस्या थी. 2011 की जनगणना के अनुसार, 31.2% के राष्ट्रीय औसत की तुलना में बिहार में शहरीकरण की दर 11.3% थी.


देश के पांचवें वार्षिक स्वच्छता सर्वेक्षण के दौरान बिहार राज्य के छह सबसे गंदे शहरों के साथ सूची में सबसे नीचे रहा. कोरोना वायरस महामारी ने हालात और बदतर कर दिए. नीतीश कुमार एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने राज्य की सीमा पर लोहे के फाटकों की स्थापना की और अपने गृह राज्य में प्रवासियों को लौटने से मना कर दिया. जबकि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों के सीएम ने अपने लोगों को घर वापस भेजने के लिए बसें भेजीं. ऐसे में नीतीश कुमार ने अपनी सुशासन बाबू की छवि का खुद ही त्याग कर दिया.

आज राज्य अपने प्रवासियों कामगारों के घर लौटने के बाद दोबारा काम पाने को एक नई चुनौती के रूप में देख रहा है. सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने कहा कि 2011-12 और 2018-19 के बीच बिहार में बेरोज़गारी की दर लगभग तीन गुना बढ़ गई. नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (NSSO) के आंकड़ों से पता चला कि 2011-12 की तुलना में 2011-12 में महिलाओं में बेरोजगारी लगभग 30% बढ़ गई.


ऐसे में कहा जा सकता है कि अगर 2005 का चुनाव बिहार के गौरव के बारे में था, तो 2010 में नीतीश ने खुद को सुशासन बाबू में बदल लिया. 2015 में वह बीजेपी के लिए चुनौती बने. अब अगर आरजेडी के 15 साल के साथ तुलना की जाए, तो उसे 2020 में नीतीश कुमार को फिर से खुद को साबित करना है.
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