Bihar assembly election 2020: देश के लिए इतना अहम क्यों है बिहार विधानसभा चुनाव?

नीतीश कुमार (Nitish Kumar) भी बीजेपी के साथ गठबंधन को जारी रख सत्ता में दोबारा वापसी की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. (PTI)
नीतीश कुमार (Nitish Kumar) भी बीजेपी के साथ गठबंधन को जारी रख सत्ता में दोबारा वापसी की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. (PTI)

Bihar assembly election 2020: कोरोना वायरस महामारी (Covid-19 Pandemic) के दौर में देश में ये पहला चुनाव है. ऐसे में वोटिंग के नियम भी बदले हैं और चुनाव प्रचार करने के तरीकों में भी बदलाव आया है. बिहार में लंबे समय के बाद लालू प्रसाद यादव और दिवंगत रामविलास पासवान के बिना चुनाव हो रहे हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 12, 2020, 9:57 AM IST
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नई दिल्ली/बिहार. शतरंज की बिसात सज चुकी है. सफेद और काले मोहरे किसके होंगे, ये भी तय हो चुका है. रणनीति भी बन चुकी है. युद्ध की रेखाएं भी खींच दी गई हैं. बस इंतजार है वोटिंग का. बिहार चुना (Bihar assembly election 2020) में अब 20 से कम दिन बच गए हैं. ऐसे में बीजेपी, जेडीयू, आरजेडी, एलजेपी और कांग्रेस समेत सभी पार्टियां राजनीति के इस शतरंज की बाजी में शह और मात का खेल खेलने के लिए तैयार हैं. बिहार को हमेशा से सामाजिक और राजनीतिक रूप से एक पक्षपातपूर्ण राज्य के तौर पर देखा गया है. कोरोना वायरस महामारी (Covid-19 Pandemic) में देश में ये पहला चुनाव है. ऐसे में वोटिंग के नियम भी बदले हैं और चुनाव प्रचार करने के तरीकों में भी बदलाव आया है. बिहार में लंबे समय के बाद लालू प्रसाद यादव और दिवंगत रामविलास पासवान के बिना चुनाव हो रहे हैं. इस बीच नीतीश कुमार (Nitish Kumar) भी बीजेपी के साथ गठबंधन को जारी रख सत्ता में दोबारा वापसी की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं.

बिहार इतना जरूरी क्यों?
बिहार ऐतिहासिक रूप से जयप्रकाश नारायण की जमीनी राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों का गढ़ रहा है, जिसने शक्तिशाली इंदिरा गांधी सरकार को हिलाकर रख दिया था. फिर 1977 में तत्कालीन केंद्र सरकार को पहली बार इमरजेंसी लागू करनी पड़ी. कांग्रेस विरोधी ताकतों के गठबंधन ने बिहार में ही सामाजिक न्याय की राजनीति के बीज बोए. यहां के नेताओं जैसे नीतीश कुमार, लालू प्रसाद और सुशील कुमार मोदी राष्ट्रीय स्तर पर उभकर आए. हालांकि, अब तीनों अलग-अलग राजनीतिक कोनों में खड़े हैं. 1977 में बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने मुंगेरीलाल आयोग की सिफारिशों को लागू किया, जो नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण प्रदान करता है.

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