बिहार विधानसभा चुनाव: 'घर वापसी' वाले 10 फीसदी वोट साबित होंगे टर्निंग पॉइंट

बिहार में देश के अलग-अलग हिस्सों से 10 लाख से ज्यादा मजदूर घर लौटे हैं.
बिहार में देश के अलग-अलग हिस्सों से 10 लाख से ज्यादा मजदूर घर लौटे हैं.

चुनाव आयोग (Election commission) के सूत्रों की मानें, तो बिहार (Bihar) में विधानसभा चुनाव (Assembly elections) समय पर होगा और अगर बिहार में चुनाव समय तो हुआ, तो अक्टूबर के पहले सप्ताह से लेकर नवंबर के दूसरे सप्ताह तक चुनाव की प्रक्रिया चलेगी.

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नई दिल्ली. बिहार (Bihar) और पश्चिम बंगाल (West Bengal) में विधानसभा चुनाव (Assembly elections) की आहट तेज हो गई. वैसे तो पश्चिम बंगाल और बिहार के चुनाव में करीब 6 महीने का अंतर है, लेकिन जिस तरह भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने बिहार और पश्चिम बंगाल में लगातार वर्चुअल रैली कर रहे हैं, उससे साफ है कि भारतीय जनता पार्टी बिहार के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के चुनावों की तैयारी में अभी से लग गई है.

चुनाव आयोग के सूत्रों की मानें, तो बिहार में चुनाव समय पर होगा और अगर बिहार में चुनाव समय तो हुआ, तो अक्टूबर के पहले सप्ताह से लेकर नवंबर के दूसरे सप्ताह तक चुनाव की प्रक्रिया चलेगी. यानी चुनाव में तीन महीने का ही समय बचा है. इन तीन महीनों में पार्टियों और उम्मीदवारों को अपनी ताकत का एहसास कराने के साथ-साथ जनता तक अपने काम और अपने चुनावी वादे पहुंचाने हैं.

क्या बाहुबली की जगह लेंगे टेक्नोक्रेट
कोराना संकट के बीच हो रहे इन चुनावों में बहुत कुछ बदला-बदला नजर आने वाला है. सबसे पहले बात करें प्रचार के तरीके की तो इससे पहले जहां नेताओं के पास जनसभा से लेकर जनसम्पर्क तक का रास्ता रहता था, वहीं इस बार वर्चुअल रैली और सोशल मीडिया ही सबसे बड़ा हथियार होंगे. यानी इस चुनाव में तकनीक बड़ा मुद्दा होगी. ऐसे में ये अनुमान भी लगाया जा रहा है कि जिस बिहार में कभी टिकट पाने के लिए बाहुबली होना जरूरी होता था, वहां इस चुनाव में तकनीकी ज्ञान होना ज्यादा जरूरी होगा. शायद यही वो कारण है जिससे राबड़ी यादव जैसे नेता भी पिछले दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से एक्टिव हुए हैं.
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10 फीसदी वोट करेंगे फैसला
कोरोना ने सिर्फ चुनाव प्रचार का रास्ता ही नहीं बदला, बल्कि चुनावी मुद्दे भी बदल दिए हैं. अगर हम जमीनी स्तर पर देखें तो पिछले 3 महीने में चुनावी मुद्दे बदल गए हैं. बिहार में पिछले चुनावों में भले ही चुनावी रैलियों में विकास, रोजगार और अपराध कम करने की बात होती हो, लेकिन मतदान आते-आते बिहार में जाति का गणित इन मुद्दों पर भारी पड़ता था. इस बार ऐसा होता नहीं दिख रहा है. बिहार में विधानसभा चुनावों में करीब सात करोड़ से ज्यादा मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे, लेकिन इसमें 10 फीसदी मतदाता ऐसे हैं जिन्होंने सीधे-सीधे कोरोना के संकट को झेला है. ये लोग हैं जो रोजगार की तलाश में देश के अलग-अलग हिस्सों में गए थे और कोरोना के संकट ने उन्हें घर लौटने पर मजबूर कर दिया. आंकड़ों की मानें, तो बिहार में देश के अलग-अलग हिस्सों से 10 लाख से ज्यादा मजदूर घर लौटे हैं. अगर एक मजदूर के परिवार को देखें, तो वहां मां-बाप, बेटे-बेटी समेत करीब 6 से 7 वोटर होते हैं यानी बिहार लौटे मजदूरों के परिवार का वोट कुल वोटों के 10 फीसदी के आस-पास होगा.

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लालू युग के बाद अब नीतीश ने भी पूरे किए 15 साल
किसी भी राज्य के विधानसभा चुनावों में 10 फीसदी वोट खासे मायने रखते हैं, क्योंकि कई राज्यों में 3-4 फीसदी वोटों के अंतर से सरकारें बदल जाती हैं. ऐसे में दोनों राजनीतिक गठबंधनों के लिए मजदूरों का पलायन बड़ा मुद्दा बना हुआ है. इन पलायन के बीच दोनों घटकों के नेता बिहार में रोजगार के अवसर न होने के लिए एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं. यहां दिलचस्प आंकड़ा ये है कि अब नीतीश कुमार की सरकार भी लालू प्रसाद यादव के बराबर 15 साल का कार्यकाल पूरा कर चुकी है, ऐसे में अब जनता को तय करना है कि बिहार के इस हालात के लिए असल में जिम्मेदार कौन है, क्योंकि अमित शाह की रैली के बाद ये तय हो गया है कि बिहार में मुकाबला नीतीश बनाम तेजस्वी ही होगा.

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