Bihar Assembly Elections 2020: प्रवासी मजदूर-बेरोजगारी और बाढ़, बिहार चुनाव की दिशा तय करेंगे ये फैक्टर

2011 की जनगणना के अनुसार 7.5 मिलियन प्रवासियों ने अपना राज्य बिहार बताया था.
2011 की जनगणना के अनुसार 7.5 मिलियन प्रवासियों ने अपना राज्य बिहार बताया था.

Bihar Assembly Elections 2020: लॉकडाउन में दूसरी जगहों से घर आने वाले लोगों में बिहार में बड़ी संख्या में लोग आए थे. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 15 लाख लोग ट्रेनों से आए थे. 2 लाख अन्य लोग बसों से आए. रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि यह संख्या ज्यादा हो सकती है. मई से 29 लाख से अधिक लोगों ने सरकार से मिलने वाले 1000 रुपयों की सहायता राशि के लिए रजिस्ट्रेशन कराया था.

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  • Last Updated: September 21, 2020, 11:52 AM IST
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(माजिद आलम)

पटना. बिहार में अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा (Bihar Assembly Elections 2020) के चुनाव होने हैं. राज्य में बढ़ती बेरोजगारी (Unemployment) से संकट पैदा हो रहा है. नौकरी जाने से बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमित खाड़ी देशों से लौटे हैं. बाढ़ और कोरोना वायरस (Covid-19) भी ऐसा मुद्दा है, जो इस बार चुनाव को प्रभावित करेंगे और चुनाव की दिशा तय करेंगे.

केंद्र सरकार ने जब लॉकडाउन किया तब बाहर के शहरों में रहने वाले लोग अपने घरों में आए, जो दैनिक अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा थे. इसे आर्थिक गतिविधियों में एक गतिरोध देखने को मिला. लॉकडाउन में दूसरी जगहों से घर आने वाले लोगों में बिहार में बड़ी संख्या में लोग आए थे. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 15 लाख लोग ट्रेनों से आए थे. 2 लाख अन्य लोग बसों से आए. रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि यह संख्या ज्यादा हो सकती है. मई से 29 लाख से अधिक लोगों ने सरकार से मिलने वाले 1000 रुपयों की सहायता राशि के लिए रजिस्ट्रेशन कराया था.



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बिहार में सबसे ज्यादा बेरोजगारों की संख्या क्यों है
2011 की जनगणना के अनुसार 7.5 मिलियन प्रवासियों ने अपना राज्य बिहार बताया था. ज्यादातर प्रवासियों ने बेरोजगारी और नौकरी की तलाश के कारण राज्य से बाहर आने का कारण बताया. दिल्ली की जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले अविनाश कुमार कहते हैं" जब भारत में दशकों के दौरान बेरोजगारी बढ़ी है इसलिए बिहार में भी यह आंकड़ा बढ़ा है. डाटा बताएगा कि इण्डस्ट्री बढ़ रही है लेकिन कहीं न कहीं रोजगार पैदा नहीं हो रहा है"

अविनाश कुमार की स्टडी के अनुसार फैक्ट्रीज की बढ़ती हुई संख्या रोजगार पैदा करने में महत्वपूर्ण योगदान नहीं दे पाई है. 2011-12 से 2016-17 के दौरान प्रति फैक्ट्री मजदूरों की संख्या 34 से घटकर 28 हो गई है. 2017-18 के दौरान देश में भारी बेरोजगारी रही, ऐसे में बिहार में भी यही स्थिति पैदा हुई. बिहार की बेरोजगारी औसत (7.2) देश की बेरोजगारी औसत (6.1) से ज्यादा थी. यह पीरियोडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे 2019 के आंकड़े हैं. सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन इकोनमी (CMIE) के डाटा में बेरोजगारी दर 13.1 बताई गई है जो दोगुनी है.


बाढ़ और अनौपचारिक श्रम
इस साल बिहार के 38 में से 16 जिले बाढ़ प्रभावित रहे. इससे 63 लाख लोग प्रभावित हुए है. केंद्रीय कौशल विकास मंत्रालय के अनुसार, अधिकतम प्रवासी पूर्वी चंपारण, कटिहार, मधुबनी, गया, पश्चिम चंपारण, दरभंगा, अररिया और मुजफ्फरपुर लौट आए हैं। 2017-18 में बिहार में आकस्मिक श्रम का हिस्सा 32.1 था जो राष्ट्रीय औसत (24.3) से ज्यादा था. बाढ़ प्रभावित क्षेत्र उद्योगों की स्थापना की संभावना काफी कम छोड़ते हैं. पूर्णिया, किशनगंज, कटियार और अररिया जैसे सीमांचल के चार जिले विकास और साक्षरता में पिछड़ गए.

लोगों का वापस लौटना
2 मिलियन लोग बाहरी राज्यों से अपने घर लौटे हैं. इसके अलावा विदेशों से आने वाले लोग भी शामिल हैं. विदेश मंत्रालय के डाटा के मुताबिक सबसे ज्यादा बाहर से आने वाले लोगों के 50 जिलों में 9 जिले बिहार के हैं. दरभंगा, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, मधुबनी में सबसे ज्यादा लोग सऊदी अरब से आये हैं. इसके अलावा यूएई, कतर, ओमान और कुवैत से भी लोग आए हैं. हालांकि इनकी कुल संख्या के बारे में जानकारी नहीं है. अविनाश कुमार के अनुसार 2012-13 में रिवर्स माइग्रेशन शुरू हुआ था. 11 फीसदी लोगों के पास उनकी योग्यता के अनुसार कोई काम था. बाकी 89 फीसदी के पास छोटा-मोटा काम था.

विशेषज्ञों के अनुसार खाड़ी देशों से पलायन करने वाले श्रमिकों से पश्चिम एशिया को नुकसान हो सकता है. गोपालगंज और सीवान जिले के लोग काफी संख्या में खाड़ी जिले से वापस आते हैं.


विपक्ष तैयार है
चुनाव के लिए राज्य तैयार है और युवाओं की बेरोजगारी एक बड़ी चिंता है. द वायर की रिपोर्ट में चालीस बेरोजगारी दर 40 फीसदी बताई गई है. बाढ़ से प्रभावित इलाकों की उपेक्षा और पलायन के कारण सीमांचल में क्षेत्रीय दलों की वैकल्पिक बढ़त देखी जा सकती है. अधिकतर दल सीमांचल के उन इलाकों में पहुंचकर अपनी पार्टी का प्रचार कर रहे हैं. असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने 2019 में मुस्लिम बाहुल्य किशनगंज की सीट जीती थी और अन्य मुस्लिक बाहुल इलाकों पर नजर गड़ाए हुए है. इनमें पूर्णिया, अररिया और कटियार भी आते हैं.

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