Bihar Election: क्‍या बिहार लालू-नीतीश की मंडल पॉलिटिक्‍स से परे नए ब्रांड लोकतंत्र का पक्‍का रास्‍ता बना रहा है?

बिहार चुनाव के दौरान तेजस्‍वी ने भी कई रैलियां कीं. (Pic- PTI)
बिहार चुनाव के दौरान तेजस्‍वी ने भी कई रैलियां कीं. (Pic- PTI)

आरजेडी (RJD) संभवत: बिहार चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी हो सकती है और विपक्षी गठबंधन या महागठबंधन (Mahagathbandhan) राज्य में अगली सरकार बना सकता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 9, 2020, 6:53 AM IST
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माजिद आलम
नई दिल्‍ली. राष्ट्रीय जनता दल यानी आरजेडी (RJD) संभवत: बिहार चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी हो सकती है और विपक्षी गठबंधन या महागठबंधन (Mahagathbandhan) राज्य में अगली सरकार बना सकता है. शनिवार को जारी विभिन्न एक्जिट पोल में ऐसा देखने को मिला. नीतीश कुमार सत्ता विरोधी लहर से लड़ रहे हैं. वहीं ऐसा लगता है कि बिहार के मतदाताओं को आखिरकार तीन दशक पुराने 'मंडल हैंगओवर' से अधिक मिला है.

कांग्रेस के खिलाफ 1970 के जेपी आंदोलन में लालू प्रसाद यादव की भागीदारी ने उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत को चिह्नित किया. लालू यादव 1990 के दशक में बिहार के मुख्यमंत्री बने और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ने 15 साल तक राज्य में शासन किया. राज्य में एक राजनीतिक प्रवाह के बाद राजद सत्ता में आई. स्वतंत्रता के बाद श्री कृष्ण सिन्हा ने 1961 में हुई मृत्यु तक 15 वर्षों तक बिहार पर शासन किया. इसके बाद राज्य राजनीतिक बहाव में चला गया.

1990 के दशक में राज्य की राजनीति ने एक दिलचस्प मोड़ लिया जब अगले तीन दशकों में राजद और जद(यू) ने तीन-तीन कार्यकालों तक शासन किया. क्रिस्टोफर जाफरलॉट- पेरिस के साइंसेज पो में पॉलिटिकल साइंस प्रोफेसर के अनुसार यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि राजद का शासन मंडल आयोग की रिपोर्ट के बीच आया, जिसने नव-निर्मित जाति समूह- अन्य पिछड़ा वर्ग या ओबीसी के लिए सकारात्मक कार्रवाई की घोषणा की. 1990 के दशक से मंडल की राजनीति को 'साइलेंट रिवॉल्यूशन' के रूप में जाना जाता है.
जाफरलॉट के मुताबिक मंडल की राजनीति ने एक सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया शुरू की, जिसके परिणामस्वरूप कुछ सामाजिक उद्धार हुआ. उच्च और प्रमुख जातियों की कीमत पर जनता की राजनीतिक शक्ति में वृद्धि हुई. यह उत्तर भारत की ओर गया और उत्तर प्रदेश में 'समाजवादी’ आंदोलन के रूप में देखा गया, जहां दो मुख्य दल- समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) हमेशा राज्य में मामलों के शीर्ष पर रहे.



राजनीतिक टिप्पणीकारों का कहना है कि इन राज्यों में राजनीति हमेशा केंद्र में पार्टियों की इच्छा के खिलाफ रही है, जिनमें उच्च जातियों का वर्चस्व रहा है. कांग्रेस और बीजेपी को या तो इन राज्यों में अन्‍य दलों के साथ गठबंधन करना पड़ा या विधानसभा में उनकी न्यूनतम उपस्थिति दर्ज देखी गई.

हालांकि, यूपी एक अपवाद बना रहा क्योंकि 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को शानदार जीत मिली. जबकि उसी पार्टी को बिहार में नीतीश कुमार को बिना किसी सवाल के सीएम उम्मीदवार के रूप में चित्रित करना है. दूसरी ओर कांग्रेस यूपी और बिहार दोनों में एक न्यूनतम ताकत बनी रही.

पटना के एक सामाजिक कार्यकर्ता का कहना है, 'बिहार में जंगलराज की धारणा थी, लेकिन साथ ही राज्य में सामाजिक न्याय के लिए आंदोलन चल रहा था. 1990 के दशक के अंत तक अन्य राज्यों के साथ-साथ सरकार द्वारा भागीदारी में आगे बढ़ने तक बहुत सुधार नहीं हुआ था.'

राजद गुट 'MY’ गुट या मुस्लिम-यादव गुट के परिणामस्वरूप सत्ता में था, जो राज्य में कुल लगभग 30 प्रतिशत बनता है. दो समूहों के गठबंधन से लालू प्रसाद यादव के लिए परिणाम सामने आए, जिनकी पार्टी ने तीन कार्यकाल वाली राजद सरकार की सत्ता संभाली.

लालू यादव चारा घोटाले में आरोपी थे, जिसके कारण उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने सीएम का पद संभाला, हालांकि लालटेन हमेशा सत्‍ता में बना रहा. इस चुनाव में लालू का चारा घोटाला और जंगल राज तब भी गूंजता रहा जब सत्ता पक्ष ने बिहार में दुखद स्थिति के लिए राजद सुप्रीमो को निशाना बनाया. पीएम मोदी ने अपने चुनावी भाषणों के दौरान लालू के बेटे तेजस्वी यादव को 'जंगल राज' के 'युवराज' कहा. हालांकि, तेजस्वी ने आरोपों के जवाब में कहा कि लालू के शासन के वर्षों में 'सामाजिक न्याय' था, और अगर राजद सत्ता में आती है तो बिहार आर्थिक न्याय देखेगा.

लालू के 'जंगल राज ’ के जवाब में नीतीश कुमार ने राजद से 'सुशासन बाबू’ की उपाधि धारण की. हालांकि नीतीश ने सड़कों, विकास और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया, लेकिन वे भी जेपी आंदोलन और लोहिया राजनीति के अनुयायी थे. जहां राजद की राजनीति मुस्लिम-यादव राजनीति पर आधारित थी, वहीं नीतीश वोट बैंक ने विखंडन के माध्यम से काम किया. उन्हें ओबीसी जाति कुर्मी, उच्च-जाति के मुसलमानों का समर्थन था. इससे उन्‍हें राजद के वोट बैंक को भंग करने और बीजेपी के कुछ परंपरागत वोट हासिल करने का समर्थन मिला.

नीतीश ने राज्‍य में पंद्रह साल शासन किया. बीजेपी के साथ, फिर राजद और फिर बीजेपी के साथ. नीतीश के दल जदयू के एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि नीतीश जी ने 15 साल तक काम किया और उन्हें पता है कि राज्य कैसे चलाना है. उन्हें हर समुदाय और विशेषकर महिलाओं का समर्थन प्राप्त है.

हालांकि, 15 साल के लंबे शासन के बाद राज्य में सत्ता विरोधी लहर के कारण नीतीश राजनीति में गिरावट दर्ज की गई. कोरोनो वायरस महामारी ने इस चुनाव में नीतीश के खिलाफ उलटे प्रवास, बाढ़ और बेरोजगारी को जोड़ा. एक राजनीतिक टिप्पणीकार ने कहा कि बिहार के युवा मतदाताओं ने लालू के कार्यकाल की तुलना करने के लिए किसी अन्य मुख्यमंत्री को नहीं देखा होगा. हो सकता है कि यह नीतीश कुमार के लिए काम कर सकता थे.

एक लेख में जाफरलॉट बताते हैं कि बीजेपी के हिंदू राष्ट्रवाद ने जाति गठबंधनों और वोट बैंक को एक ऐसे सेटअप से अलग कर दिया, जहां जाति की पहचान इस्लाम से ‘खतरे’ के खिलाफ हिंदू एकता में बदल गई. इसका सबूत पिछले लोकसभा चुनाव में देखा गया है जहां बीजेपी और सहयोगी दलों ने 40 में से 39 सीटें जीती थीं.

हालांकि, एक और विरोधी सिद्धांत है जो पिछले दशक में व्यावहारिक रहा है. बिहार के डिप्टी सीएम और वरिष्ठ बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी ने एक साक्षात्कार में बताया कि राजद के सबसे बड़े टुकड़े में से एक राज्य में नए त्रिकोणीय शासन के रूप में आया है. बीजेपी के दिग्‍गज नेता बताते हैं कि इस व्यावहारिक सिद्धांत के अनुसार बिहार में तीन दल थे- राजद, जद (यू) और बीजेपी. तीनों में से जो भी दो दल हाथ मिलाते हैं. गठबंधन सत्ता में आता है.
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