Bihar Election Results 2020: नीतीश के इतिहास में छिपा है चौथी बार बिहार का मुख्यमंत्री बनने का राज़

नीतीश कुमार
नीतीश कुमार

Bihar Election News: जनता दल यूनाइटेड के मुखिया नीतीश कुमार (Nitish Kumar) अपने नपे-तुले फैसलों के लिए जाने जाते हैं. बिजली विभाग की नौकरी छोड़कर राजनीति में आने वाले नीतीश की सबसे दोस्ती रही.

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  • Last Updated: November 11, 2020, 2:45 PM IST
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नई दिल्ली/पटना. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election Results 2020) में भाजपा (BJP) का प्रदर्शन अपने सहयोगी जनता दल-युनाईटेड (JDU) के मुकाबले शानदार रहा है और उसकी अपेक्षा 31 और सीटों पर जीत दर्ज कर दूसरे नंबर की पार्टी बन गई. दोनों दल पिछले दो दशकों से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में सहयोगी रहे हैं और यह पहला मौका है जब भाजपा इस गठबंधन में वरिष्ठ सहयोगी के रूप में उभरी है.

आंकड़ों के मुताबिक भाजपा 74 सीटों पर जीत दर्ज की और 43 सीटों पर जदयू के विधायक जीते. भले ही राज्य में राजग की सरकार बन जाए और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बन जाएं लेकिन यह परिवर्तन बिहार के सत्ताधारी गठबंधन में सत्ता के समीकरण को बदलने की क्षमता रखता है.

राजग और महागठबंधन के बीच कांटे का मुकाबला हुआ. राजग 125 सीटों पर जीता वहीं राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेतृत्व वाला महागठबंधन ने भी 110 सीटों पर जीता. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2005 के बाद दूसरी बार सत्ता में आने के बाद अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में मुखर रहेगी.




2015 में राजद से गठबंधन
सबकी नजरें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर रहेंगी कि ऐसी स्थिति में उनका क्या रुख रहेगा. मालूम हो कि कुमार भाजपा के हिन्दुत्व के मुद्दे पर अलग राय रखते रहे हैं. वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में जद(यू) को 71 सीटें मिली थी. उस चुनाव में जद(यू) का राजद के साथ गठबंधन था.

भाजपा ने 2013 के लोकसभा चुनाव में जब नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया था तब नीतीश कुमार की पार्टी इसका विरोध करते हुए 17 साल पुराने गठबंधन से अलग हो गई थी. बाद में मोदी के नेतृत्व में जब राजग को लोकसभा चुनावों में भारी जीत मिली तो उधर नीतीश का राजद से मतभेद होने शुरु हो गए. बाद में राजद से अलग होकर उन्होंने भाजपा का दामन थामा और फिर बिहार के मुख्यमंत्री बनें.

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समता पार्टी का जनता दल यूनाईटेड में विलय हो गया
साल 2010 के विधानसभा चुनाव में जद(यू) को जहां 115 सीटें मिली थी वहीं भाजपा को 91 सीटें मिली थी. साल 2005 के विधानसभा चुनाव में जद(यू) की जीत का आंकड़ा 88 था तो भाजपा को 55 सीटें मिली थी. साल 2000 के चुनाव में भाजपा को 67 सीटें मिली थी जबकि नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी समता पार्टी को 34 सीटों से संतोष करना पड़ा था. उस समय झारखंड बिहार का हिस्सा था. बाद में समता पार्टी का जनता दल यूनाईटेड में विलय हो गया था.

गौरतलब है कि नीतीश पर अक्सर अवसरवादी होने के आरोप लगते हैं. अब इसे राजनीतिक अवसरवाद या शिथिलता कहें उनके प्रभाव से हिंदुत्ववादी ताकतें बिहार पर हावी नहीं हो पाई हैं.  भाजपा के एक वर्ग मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली होने के बाद भी बिहार में अब तक उनका अपना सीएम नहीं हो पाया. कोई भी फैसला करने में पूरी सावधानी बरतने वाले नीतीश जोखिम उठाने वाले नेताओं में से एक हैं. जेपी आंदोलन में भाग लेने वाले नीतीश ने बिजली विभाग की नौकरी छोड़कर राजनीति में आने का फैसला किया.

 बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए नीतीश
जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान उनके साथी रहे लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के विपरीत चुनावी नीतीश कुमार को  तीन बार हारने के बाद 1985 के विधानसभा चुनावों में जीत का पहला स्वाद मिला. तब उन्होंने हरनौत से लोकदल के उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की. हालांकि कांग्रेस ने इस चुनाव में क्लीन स्वीप कर गई थी.

पहली चुनावी जीत के चार साल बाद वह बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए. यह वही दौर था जब सारण से लोकसभा सदस्य रहे लालू प्रसाद पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. उस वक्त जनता दल के भीतर मुख्यमंत्री के लिए नीतीश ने लालू का समर्थन किया था. इसके बाद कुछ वर्षों में लालू प्रसाद बिहार की राजनीति में सबसे ताकतवर नेता के तौर पर उभरे, हालांकि बाद में चारा घोटाले में नाम आने और फिर पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाने के बाद वह विवादों से घिरते चले गए.

नीतीश ने भी 1990 के दशक के मध्य में ही जनता दल और लालू से अपनी राह अलग कर ली तथा बड़े समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस के साथ समता पार्टी का गठन किया. उनकी समता पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन किया और नीतीश ने एक बेहतरीन सांसद के रूप में अपनी पहचान बनाई तथा अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में बेहद ही काबिल मंत्री के तौर पर छाप छोड़ी.

लालू युग’ के पटाक्षेप की शुरुआत
बाद में लालू प्रसाद और शरद यादव के बीच विवाद हुआ. यादव ने अपनी अलग राह पकड़ ली. इसके बाद समता पार्टी का जनता दल के शरद यादव के धड़े में विलय हुआ जिसके बाद जनता दल (यूनाइटेड) वजूद में आया. जद(यू) का भाजपा का गठबंधन जारी रहा. साल 2005 की शुरुआत में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा-जद (यू) के गठबंधन वाला राजग कुछ सीटों के अंतर से बहुमत के आंकड़े दूर रह गया जिसके बाद राज्यपाल बूटा सिंह ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश की जिसको लेकर विवाद भी हुआ. उस वक्त केंद्र में संप्रग की सरकार थी.

इसके कुछ महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में राजग की बिहार में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी और यहीं से बिहार की राजनीति में तथाकथित ‘लालू युग’ के पटाक्षेप की शुरुआत हुई.

सत्ता में आने के बाद नीतीश ने नए सामाजिक समीकरण बनाने हुए पिछड़े वर्ग में अति पिछड़ा और दलित में महादिलत के कोटे की व्यवस्था की. इसके साथ ही उन्होंने स्कूली बच्चियों के लिए मुफ्त साइकिल और यूनीफार्म जैसे कदम उठाए और 2010 के चुनाव में उनकी अगुवाई में भाजपा-जद(यू) गठबंधन को एकतरफा जीत मिली.इसके बाद भाजपा में ‘अटल-आडवाणी युग’ खत्म हुआ और नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर आए तो नीतीश ने 2013 में भाजपा से वर्षों पुराना रिश्ता तोड़ लिया.

भाजपा के समर्थन से एक बार फिर बिहार के मुख्यमंत्री बने
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जद(यू) को बड़ी हार का सामना करना पड़ा और भाजपा ने बिहार से बड़ी जीत हासिल की. नीतीश ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया.

करीब एक साल के भीतर ही मांझी का बागी रुख देख नीतीश ने फिर से मुख्यमंत्री की कमान संभाली. 2015 के चुनाव में वह राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़े और इस महागठबंधन को बड़ी जीत हासिल हुई.नीतीश ने अपनी सरकार में उप मुख्यमंत्री एवं राजद नेता तेजस्वी यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. हालांकि कुछ घंटों के भीतर ही भाजपा के समर्थन से एक बार फिर बिहार के मुख्यमंत्री बने.

उन्हें नरेन्द्र मोदी के खिलाफ एक चुनौती के तौर पर देखने वाले लोगों ने नीतीश के इस कदम को जनादेश के साथ विश्वासघात करार दिया. हालांकि, वह बार-बार यही कहते रहे कि ‘मैं भ्रष्टाचार से समझौता कभी नहीं करूंगा.’

LJP ने 30 सीटों पर जद(यू) को नुकसान पहुंचाया
इस बार के विधानसभा चुनाव के परिणाम साफ संकेत दे रहे हैं कि सत्तारूढ़ जद(यू) को नुकसान हुआ और उसका कारण बनी है चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) जो इस बार अकेले दम चुनाव मैदान में थी.

हालांकि इसके लिए लोजपा को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है. लोजपा का सिर्फ 1 विधायक जीता लेकिन पार्टी को 5.8 फीसदी वोट जरूर मिले हैं. आंकड़ों पर गौर किया जाए तो पता चलता है कि लोजपा ने कम से कम 30 सीटों पर जद(यू) को नुकसान पहुंचाया है.
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