Bihar Election Result 2020: तेजस्वी यादव को लालू की छाया से बाहर निकालने में इस 'बड़े भाई' की खास भूमिका

एमबीए ग्रेजुएट संजय यादव ने 2013 तक गुरुग्राम में एक आईटी फर्म में टीम मैनेजर के तौर पर काम किया. आरजेडी से जुड़ने के बाद इन्होंने ही सूचना प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया की दुनिया में पार्टी का परिचय कराया.  (PTI)
एमबीए ग्रेजुएट संजय यादव ने 2013 तक गुरुग्राम में एक आईटी फर्म में टीम मैनेजर के तौर पर काम किया. आरजेडी से जुड़ने के बाद इन्होंने ही सूचना प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया की दुनिया में पार्टी का परिचय कराया. (PTI)

तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) की महागठबंधन में मौजूदा स्थिति, पिछले कुछ वर्षों में सभी प्रमुख मुद्दों पर पार्टी का रुख तय करने और डिजिटल प्लेटफार्मों पर एक मजबूत उपस्थिति सुनिश्चित करने के पीछे संजय यादव (Sanjay Yadav) ही हैं. वह तेजस्वी के राजनीतिक सलाहकार के रूप में सेवारत हैं.

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  • Last Updated: November 11, 2020, 2:43 PM IST
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(मारिया शकील/रौनक कुमार गुंजन)

नई दिल्ली/पटना. अक्टूबर 2013 में जब 23 वर्षीय तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) ने महसूस किया कि क्रिकेट में उनका करियर खत्म हो गया है, तो उन्होंने राजनीति में दूसरी पारी की शुरुआत करने का फैसला लिया. इसमें एक शख्स ने तेजस्वी पर भरपूर विश्वास जताया. तब तेजस्वी ने संजय यादव (Sanjay Yadav) से मिलवाया था, जो उनसे सिर्फ 5 साल बड़े थे लेकिन तेजस्वी ने उन्हें पिता समान बताया था. तेजस्वी ने संजय यादव का परिचय देते हुए कहा था, 'ये मेरे बडे भाई हैं, अब हम साथ-साथ हैं.'

36 वर्षीय संजय यादव जल्द ही लालू परिवार के अंदरूनी सूत्र बन गए. अपने तेज दिमाग और राजनीतिक सूझबूझ के जरिए संजय यादव ने लालू यादव का विश्वास बहुत कम समय में हासिल कर लिया. पिछली बार जब संजय यादव आरजेडी संरक्षक लालू प्रसाद यादव से रांची जेल में मिले थे, तो गठबंधन के तौर-तरीकों और उम्मीदवार चयन पर खूब चर्चा की थी.



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News18 से एक्सक्लूसिव बातचीत में उन्होंने कहा था, 'मेरी उम्र से अधिक चुनाव लड़ने वाले दिग्गज नेता (लालू यादव) को समझाना बहुत मुश्किल है. इसके लिए आपको ठोस तैयारी करनी पड़ती है. अगर आप सामाजिक संयोजनों पर उचित डेटा नहीं रखते हैं, तो क्या समझाइएगा. हालांकि, लालूजी समझदार हैं. उन्होंने हमसे (तेजस्वी और मुझे) कहा, 'अब तुम लोग जानो, लेकिन जीत जाएंगे ना?' संजय यादव ने एक लाइन में कहा था, 'निश्चिंत रहिए.'

एक सूबेदार पिता का इकलौते बेटे संजय यादव मामूली परिवार से आते हैं. उन्होंने हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के नांगल सिरोही में गांव के एक हिंदी-माध्यम स्कूल में पढ़ाई की. उन्होंने बताया, 'आरजेडी और बिहार में एक बाहरी व्यक्ति होने के नाते मेरा जुड़ाव केवल नेता से है. कोई आत्मीयता, कोई पक्षपात नहीं है.'

एमबीए ग्रेजुएट संजय यादव ने 2013 तक गुरुग्राम में एक आईटी फर्म में टीम मैनेजर के तौर पर काम किया. आरजेडी से जुड़ने के बाद इन्होंने ही सूचना प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया की दुनिया में पार्टी का परिचय कराया. आरजेडी के संगठन में ईबीसी और एससी / एसटी के लिए आरक्षण लागू करने पर जोर दिया. इसके बाद आरजेडी संगठनात्मक पदों में आरक्षण लागू करने वाली देश की पहली राजनीतिक पार्टी बनी.


तेजस्वी यादव की महागठबंधन में मौजूदा स्थिति, पिछले कुछ वर्षों में सभी प्रमुख मुद्दों पर पार्टी का रुख तय करने और डिजिटल प्लेटफार्मों पर एक मजबूत उपस्थिति सुनिश्चित करने के पीछे संजय यादव ही हैं. वह तेजस्वी के राजनीतिक सलाहकार के रूप में सेवारत हैं. डिप्टी सीएम के रूप में उनके 18 महीने के सफल कार्यकाल के दौरान संजय यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. जनता से माफी मांगने और पोस्टर पर अपने सीएम माता-पिता की छवियों के बिना जाने का सुविचारित फैसला तेजस्वी यादव का था, लेकिन इसके बीज संजय ने बोए थे.

संजय यादव बताते हैं, 'रेहनुमई लालू की, अगुवाई तेजस्वी की... पोस्टर राजनीतिक परिवर्तन के बारे में था. इसे सुचारू बनाने और दूसरी पंक्ति के नेतृत्व के उद्भव को प्रदर्शित करने के लिए जरूरी भी था.'


हालांकि, बिहार की राजनीति में 26 जुलाई 2017 को एक बड़ा मोड़ आया. नीतीश कुमार आरजेडी गठबंधन से बाहर चले गए. उसी शाम लालू यादव को कोर्ट में पेश होने के लिए रांची जाना पड़ा. राजभवन में तेजस्वी ने इसका विरोध किया. बिहार की सड़कों पर खूब हंगामा हुआ. '4 साल में 4 सरकार, सीएम नीतीश कुमार' के पोस्टर और बैनर लहराए गए. इसी समय विपक्ष के नेता के रूप में राज्य विधानसभा में तेजस्वी का भाषण और उनके पिता की तुलना में एक अलग दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्ति के रूप में उनकी सामरिक स्थिति मजबूत हुई.

इस बार के चुनाव में तेजस्वी यादव ने युवा वोटर्स को लुभाने की भरपूर कोशिश की. 10 लाख नौकरियां देने के वादे को लेकर भी अच्छा-खासा रिसर्च किया गया था. ये भी संजय यादव के दिमाग की उपज थी. नीतीश कुमार के खिलाफ एक जादू की तरह काम करने वाली टैगलाइन भी इसी संजय यादव ने हरियाणा में रहकर गढ़ी थी. तेजस्वी यादव ने हर रैली में दोहराया था कि नीतीश कुमार थक गए हैं. उन्हें एक ऐसे राजनेता की तरह चित्रित किया गया, जिसके पास राज्य के लिए कोई विजन नहीं है.


तेजस्वी यादव के हर इलाके में जनसभा करने की योजना और पैदल घूमने की रणनीति भी संजय यादव ने बनाई थी. उन्होंने एक ही दिन में 19 रैलियों का रिकॉर्ड बनाया. औसतन प्रति दिन 12.5 रैलियों को संबोधित किया. ये सब संजय द्वारा सुनिश्चित किया गया था. हालांकि, पूरे चुनाव प्रचार में उन्होंने खुद को कार्यालय तक सीमित रखा. कहीं भी तेजस्वी के साथ नहीं दिखे, लेकिन इस दौरान रिसर्च वर्क, वोटिंग ट्रेंड्स पर नजर बनाए रखी.

प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में 100 कमजोर और मजबूत बूथों की सूची डेटा मूल्यांकन के माध्यम से चार्ट की गई थी. चुनाव से पहले उम्मीदवारों को सामाजिक संरचना महीनों पहले दे दी गई थी. संजय और तेजस्वी दोनों इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि युवा नेता और उनके पिता के बीच एक पीढ़ी का अंतर है. ऐसे में अगर सरकार बनी, तो वह पार्टी के पुराने सिद्धांतों पर काम नहीं करेगी.

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तेजस्वी के साथ अपने समीकरण को बढ़ाते हुए संजय यादव ने News18 से कहा था, “नेतृत्व में विश्वास है और मुझे तेजस्वी राजनीति का एक अच्छा छात्र लगता है. वह जल्दी सीखते हैं. हमारा गहरा विश्वास है. इसे हम लागू करना चाहते हैं.'
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