बिहार से खुलेगा देश में डिजिटल इलेक्शन का रास्ता, ऐसे साबित हो सकता है कारगर

बिहार से खुलेगा देश में डिजिटल इलेक्शन का रास्ता, ऐसे साबित हो सकता है कारगर
कोरोना महामारी के कारण इस बार चुनावी रैलियों पर असर पड़ना लाजिमी है.

आगामी बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections 2020) में नीतीश कुमार (Nitish Kumar) रिकॉर्ड चौथे कार्यकाल के लिए मैदान में होंगे. इस चुनाव को लेकर कई उम्मीदें हैं और संभावनाएं भी. हालांकि, कोरोना महामारी के कारण इस बार चुनावी रैलियों पर असर पड़ना लाजिमी है. चुनावों के दौरान लोगों से लोगों का संपर्क अब सबसे बड़ा खलनायक बन गया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: June 21, 2020, 12:51 PM IST
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(सुभोजित सेनगुप्ता)

नई दिल्ली. वो 1995 का साल था. अविभाजित बिहार (Bihar Elections) का अंतिम चुनाव, जहां नवगठित समता पार्टी ने पहली बार बिहार के अगले मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार (Nitish Kumar) को प्रोजेक्ट किया. लालू राज के चरम पर रहते हुए दूसरी पार्टियों के सभी दावों और अरमानों पर पानी फिर गया था. चुनाव के महीनों को तब एक उत्सव के रूप में चिह्नित किया गया था. प्रतिस्पर्धी हेलिकॉप्टर स्पॉटिंग. चुनावी रैलियों में गुब्बारे बेचने वाले, जलेबी बनाने वाले और मूंगफली फेरीवालों से मेले जैसा माहौल तैयार किया गया था. मैं तब मतदाता नहीं था. इसलिए मैंने घर पर बहुत अच्छा बर्ताव किया, ताकि पिताजी मुझे चुनावी रैली दिखाने लेकर जाए, जो मेरे लिए मेला ही था.

भारत में चुनाव यूनिवर्सल एडल्ट फ्रैंचाइज़ी (वयस्क मताधिकार व्यवस्था) के उपयोग की एक यांत्रिक प्रक्रिया से बहुत अधिक मायने रखती है. इसे लोगों से लोगों के संपर्क के उत्सव के रूप में देखा जाता है. इसलिए इसे अक्सर 'डांस ऑफ डेमोक्रेसी' भी कहा जाता है, जिसमें कार और बाइक रैलियां, लंबे मार्च और सार्वजनिक बैठकें का दौर चलता है. लाखों लोग अपने नेताओं को सुनने के लिए इकट्ठा होते हैं. इससे अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलता है. दोपहिया वाहन, तोरण, और इवेंट मैनेजमेंट की मांग बढ़ती है.



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आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार रिकॉर्ड चौथे कार्यकाल के लिए मैदान में होंगे. इस चुनाव को लेकर कई उम्मीदें हैं और संभावनाएं भी. हालांकि, कोरोना महामारी के कारण इस बार चुनावी रैलियों पर असर पड़ना लाजिमी है. चुनावों के दौरान लोगों से लोगों का संपर्क अब सबसे बड़ा खलनायक बन गया है.


चुनाव आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल आगामी चुनावों को स्थगित करने की उनकी कोई योजना नहीं है. कोरोना काल में टेक्नोलॉजी की एक बड़ी भूमिका पर जोर दिया जा रहा है. साफ है कि नेता इस बार जनसभा की बजाय डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रैलियां करेंगे. सिर्फ मतदाता जागरूकता और मतदान प्रक्रिया में ही नहीं, बल्कि पहली बार संभवतया चुनाव अभियान प्रमुख रूप से डिजिटल रूप में होंगे.

राजनीतिक रणनीतिकार और डिजाइनबॉक्स के संस्थापक नरेश अरोड़ा कहते हैं कि टेक्नोलॉजी वैसे भी चुनावीकरण में एक प्रमुख भूमिका निभा रही थी. कोरोना महामारी ने अब राजनीतिक दलों के लिए इसे और अधिक अनिवार्य बना दिया है. हालांकि, इससे चुनावों में त्योहार जैसी बात खत्म हो जाएगी.

इंटरनेशनल डेटा कॉर्पोरेशन के अनुसार, भारत में 400 मिलियन से अधिक स्मार्टफोन यूजर्स और 450 मिलियन से अधिक फीचर फोन यूजर्स हैं. इस बाजार ने पिछले तीन वर्षों में फीचर फोन से बड़ी छलांग लगाई है. ऐसे में क्या चुनाव में डिजिटल मिडियम से अधिक वोटर्स को भुनाया जा सकता है? ग्लोबल डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी आइओबार इंडिया (Isobar India) के COO गोपा कुमार के अनुसार, 'चुनाव में सभी सोशल प्लेटफ़ॉर्म एक प्रमुख भूमिका निभाएंगे. ये मतदाताओं और उम्मीदवारों के बीच की खाई को पाटने में मदद करेंगे. फेसबुक, टिकटॉक, हेलो, शेयरचैट, वॉट्सऐप- ये सभी लोकप्रिय प्लेटफार्म हैं, जहां लोग जुड़ते हैं और समय बिताते हैं.'


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इन सबसे एकमात्र वॉट्सऐप ही ऐसा प्लेटफॉर्म है, जो स्मार्टफोन और कुछ फीचर फोन दोनों में उपलब्ध है. ऐसे में जाहिर तौर पर चुनाव में ये सबसे बड़ा कारगर साबित होगा. बता दें कि बिहार में वॉट्सऐप, फेसबुक और यूट्यूब के क्रमश: 3 करोड़, 2.5 करोड़ और 2.65 करोड़ एक्टिव यूजर्स हैं. ये पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के लिए स्पष्ट रूप से एक बड़ा प्लेटफॉर्म साबित होगा, जिसकी जनसंख्या 9.7 करोड़ है. (मूल रूप से अंग्रेजी में इस आर्टिकल को पूरा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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