बिहार में बच्‍चों की मौत पर कुमार विश्‍वास बोले- सियासी खेल खेलते रहिए, स्कोर 90+

कुमार विश्‍वास ने रविवार शाम को ट्वीट किया, स्कोर 90 Plus हो चुका है. इलाज की सामान्य सुविधाओं के अभाव में, एक जिला अस्पताल में, भारत के नौनिहालों की मौत का.

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Updated: June 16, 2019, 11:50 PM IST
बिहार में बच्‍चों की मौत पर कुमार विश्‍वास बोले- सियासी खेल खेलते रहिए, स्कोर 90+
मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत पर कुमार विश्‍वास ने ट्वीट करके राजनीति दलों पर निशाना साधा है. (फाइल फोटो)
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Updated: June 16, 2019, 11:50 PM IST
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (AES) से करीब 93 बच्चों की मौत हो चुकी है. जबकि दर्जनों बच्‍चे अभी भी अस्‍पताल में भर्ती हैं. बच्‍चों की मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है. इस मामले को लेकर कुमार विश्‍वास ने सरकार ने घेरा है.

कुमार विश्‍वास ने रविवार शाम को ट्वीट किया, 'स्कोर 90 Plus हो चुका है. इलाज की सामान्य सुविधाओं के अभाव में, एक जिला अस्पताल में, भारत के नौनिहालों की मौत का. हर दल-नेता जीत रहा है, भविष्य के अलावा. निहायत ग़ैर ज़रूरी मुद्दों का यह सियासी खेल, यूं ही खेलते रहिए जब तक आख़री उम्मीद बोल्ड न हो जाए.'



एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम पर कहा जा रहा है कि बच्चों की मौत लीची खाने से हो रही हैं. बिहार के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने दावा किया है कि अधिकांश मौतें हाइपोग्लाइसीमिया (शुगर लेवल में अचानक भारी कमी) के कारण हुई हैं. इंसेफलाइटिस से बच्चों की मौत का यह सिलसिला 1995 से ही जारी है.


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मरने वाले बच्चे सिर्फ गरीब घरों के हैं

इस बारे में समाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद अनिल प्रकाश ने न्यूज18 से बातचीत में कहा कि एईएस से बच्चों की मौत के आंकड़ें में तो सिर्फ अस्पतालों में होने वाली मृत्यु के दर्ज किए जाते हैं. कई बच्चे तो झोलाछाप डॉक्टरों और केमिस्ट के यहां जाकर आधे-अधूरे इलाज के कारण दम तोड़ रहे हैं. उन्होंने कहा कि ये मरने वाले बच्चे सिर्फ गरीब घरों के हैं.

कुपोषित बच्चों को लीची से है सर्वाधिक खतरा

इस इलाके में गर्मी के चरम पर पहुंचने और मानसून के शुरू होने के समय हर साल एईएस से बच्चों की मौत होती है. इस लिहाज से 24 सालों में इन मौतों से बचने के लिए कोई विशेष शोध या उपाय नहीं किए गए हैं. इस बारे में विश्व की प्रसिद्ध पत्रिका 'द लांसेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल' में एक विशिष्ट शोध प्रकाशित किया गया था. द लांसेट के अनुसार लीची में हायपोग्लायसिन-ए और मेथिलीन साइक्लोप्रोपाइल ग्लाइसीन होते हैं, जो कुपोषित बच्चों के खून में शुगर का लेवल बहुत कम कर देते हैं.

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द लांसेट के मुताबिक यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब इन कुपोषित बच्चों को पिछली रात भोजन नहीं मिला होता है और दूसरे दिन सुबह अपनी भूख मिटाने के लिए वे लीची के बागानों में गिरे हुए अधपके या पके फल उठाकर खा लेते हैं.

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