क्यों राजमाता विजयाराजे सिंधिया की तरफ लौट रही है बीजेपी?

ग्वालियर की कई सीटों पर आज भी सिंधिया घराने का प्रभाव माना जाता है और विजयाराजे की जन्मशती पर पांच दिनों की रिले-मैराथन दौड़ आयोजित कर बीजेपी इसी प्रभाव को वोट में बदलने की कोशिश करती नज़र आती है.

Ankit Francis | News18Hindi
Updated: October 12, 2018, 11:45 AM IST
क्यों राजमाता विजयाराजे सिंधिया की तरफ लौट रही है बीजेपी?
राजमाता विजयाराजे सिंधिया
Ankit Francis | News18Hindi
Updated: October 12, 2018, 11:45 AM IST
मध्य प्रदेश की राजनीति में भले ही सिंधिया राजघराने की ताकत ज्योतिरादित्य के जरिए एक बार फिर कांग्रेस के पाले में हो लेकिन जीवाजी राव सिंधिया, राजमाता विजयाराजे, यशोधरा राजे और राजस्थान में वसुंधरा राजे इसी घराने के उन कुछ नामों में से हैं जो हिंदू महासभा, जनसंघ और अब बीजेपी में रहकर कांग्रेस विरोधी राजनीति के कद्दावर चेहरे माने जाते रहे.

विजयाराजे के राजनीतिक जीवन की शुरुआत भले ही कांग्रेस के जरिए हुई थी लेकिन पार्टी छोड़ने के बाद उन्होंने कभी समझौता नहीं किया और एमपी में कांग्रेस की सरकार गिराने का कारनामा तक कर डाला. ग्वालियर के इलाके की सीटों पर आज भी इस घराने का प्रभाव माना जाता है और विजयाराजे की जन्मशती पर ग्वालियर से लेकर दिल्ली तक पांच दिनों की रिले-मैराथन दौड़ आयोजित कर बीजेपी इसी प्रभाव को वोट में बदलने की कोशिश करती नज़र आती है.

बीजेपी ने राजमाता विजयाराजे
विजयाराजे सिंधिया की जन्मशती मनाने के लिए बीजेपी महिला मोर्चा ग्वालियर से लेकर दिल्ली तक पांच दिनों की रिले-मैराथन दौड़ आयोजित कर रही है. इस रैली के माध्यम से पार्टी यह बताने की कोशिश करने वाली है कि वो पहले से ही महिलाओं को राजनीति में प्रतिनिधित्व देती आई है. और मोदी सरकार में महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए किस तरह की योजनाएं चलाई जा रही हैं. ग्वालियर के सिंधिया राजवंश की राजमाता विजया राजे सिंधिया का जन्म शताब्दी वर्ष 12 अक्टूबर से शुरू हो रहा है. बता दे कि विजयाराजे बीजेपी के संस्थापक सदस्यों में से एक रही हैं. बीजेपी महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष विजया राहटकर ने बताया, 'यह राजमाता विजयाराजे सिंधिया को हमारी श्रद्धांजलि होगी. उनके जन्म के सौ साल होने पर हम देश भर में कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं.'



इस रैली की शुरुआत 12 अक्टूबर को ग्वालियर से होगी और यह 16 अक्टूबर को दिल्ली में खत्म होगी. महिला सशक्तीकरण के नाम से आयोजित यह मैराथन पांच राज्यों, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली से होकर गुजरेगा. रिले-मैराथन दौड़ की शुरुआत ग्वालियर मध्य प्रदेश से होगी, जो विजयाराजे सिंधिया का अपना शहर था. यहां पर राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान रिले—मैराथन को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे. दिल्ली में 16 अक्टूबर को इसका समापन होगा, जहां बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह रिले—मैराथन का स्वागत करेंगे. उसके बाद तालकटोरा स्टेडियम में एक भव्य कार्यक्रम होगा. इस मैराथन में शुरू से लेकर अंत तक 375 किमी के बीच 100 महिलाएं दौड़ेंगी. उनके साथ ही कई सेलेब्रिटी भी बीच में इससे जुड़ेंगे और मोदी सरकार की उन योजनाओं को लोगों से साझा करेंगे जिससे महिलाओं का सशक्तिकरण हुआ है. मोदी सरकार की योजनाओं से जुड़े कार्यक्रम को रेखांकित करने वाले 50 कार्यक्रम भी किये जाएंगे.

ज्योतिरादित्य को कमज़ोर करने की साजिश!
इलाके के वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली बताते हैं कि ग्वालियर चंबल के इलाके में बीजेपी पिछले दिनों काफी कमज़ोर हो रही है इसलिए उसने सिंधिया खानदान के नाम का सहारा लेना शुरू कर दिया है. एक तरफ बीजेपी राजमाता की तारीफ करती है दूसरी तरफ उनके ही नेता जयभान सिंह पवैया चुनावी सभाओं में सिंधिया खानदान की कड़ी आलोचना करते रहते हैं. खुद शिवराज भी कई रैलियों में ज्योतिरादित्य को महाराजा और खुद को किसान का बेटा बताते रहे हैं. श्रीमाली आगे सवाल करते हैं कि बीजेपी राजमाता को बढ़िया नेता साबित कर देगी तो इससे ज्योतिरादित्य के लिए ही सिम्पेथी पैदा होगी, इससे कांग्रेस का क्या नुकसान होगा भला. हालांकि एमपी बीजेपी के प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल इस सवाल पर कहते हैं कि हम सिर्फ अपने पूर्वज नेताओं को याद करने के लिए ये सारे आयोजन कर रहे हैं. हालांकि पिछले दिनों चंबल इलाके में गए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी मंच से विजयाराजे की तारीफों के पुल बांधे थे और ज्योतिरादित्य का नाम लेने से बचते नज़र आए थे.

हिंदुत्व की राजनीति का केंद्र रहा है ग्वालियर
ग्वालियर का जय विलास महल हमेशा से ही मध्य प्रदेश की राजनीति के केंद्र में रहा है. आज़ादी के बाद यही महल रजवाड़ों की राजनीति का गढ़ था. ये वो लोकसभा सीट है जहां देश के पहले आम चुनावों में हिंदू महासभा के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी. कई मायनों में नागपुर के बाद हिंदुत्व की राजनीति का इतिहास यहां से भी जुड़ा हुआ है. सिंधिया खानदान के नेता चाहे वो कांग्रेस में रहे या फिर जनसंघ-बीजेपी में, इस सीट ने उन्हें कभी निराश नहीं किया. साल 1984 के चुनावों में अटल बिहारी वाजपेयी को भी यहां से हार का सामना करना पड़ा.



कहानी शुरू होती है छोटे-छोटे रजवाड़ों को जोड़कर मध्य भारत नाम के राज्य के अस्तित्व में आने के बाद. यहीं के आखिरी महाराजा थे जीवाजी राव सिंधिया. मध्य भारत के मुखिया को सांकेतिक तौर पर चुना जाता था. 28 मई 1948 से लेकर 31 अक्टूबर 1956 तक जीवाजी सिंधिया यहां के राज प्रमुख थे. 1951 के पहले लोकसभा चुनावों में यहां 11 सीटों पर चुनाव हुए जिनमें से 9 कांग्रेस और दो हिंदू महासभा के खाते में आई. 1952 में 99 सीटों पर पहले असेंबली इलेक्शन हुए, जिनमें 75 सीटों पर कांग्रेस जबकि 11 सीटों पर हिंदू महासभा ने जीत दर्ज की. गौरतलब है कि 31 अक्टूबर 1956 को ये शाही रियासतें मध्य प्रदेश में मिला दीं गई. 1957 में दूसरी लोकसभा के चुनाव होने थे और हिंदू महासभा से निपटने के लिए कांग्रेस के पास एक ही ऑप्शन था सिंधिया राजशाही का साथ.

ऐसे राजनीति में आईं थी विजयाराजे
1957 में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ग्वालियर आए और उनकी मुलाक़ात जीवाजी सिंधिया से हुई. हालांकि जीवाजी को कांग्रेस के लोकतंत्र वाले आइडिया में भरोसा नहीं था और उनकी नीतियों के प्रति भी खुलकर नाराजगी जाहिर करते रहते थे. विजयाराजे सिंधिया के भाई ध्यानेंद्र सिंह बताते हैं कि जीवाजी राव पर कांग्रेस ने दबाव बनाया तो कहानी में एंट्री हुई जीवाजी की पत्नी विजयाराजे सिंधिया की. विजयाराजे दिल्ली यह कहने आईं थी कि जीवाजी राजनीति में नहीं आना चाहते लेकिन गोविन्द वल्लभ पंत और लाल बहादुर शास्त्री ने उन्हें ऐसा प्रस्ताव दिया कि विजयाराजे मना नहीं कर सकीं. नेहरू कामयाब रहे और ग्वालियर से तो नहीं लेकिन गुना से विजयाराजे ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और हिंदू महासभा के उम्मीदवार को 60 हज़ार से ज्यादा वोट से हरा दिया. हिंदू महासभा इन चुनावों में सिर्फ एक सीट पर सिमट कर रह गई.

आखिर कांग्रेस क्यों छोड़ी
मध्य प्रदेश में सीएम द्वारका प्रसाद मिश्र जिन्हें इंदिरा का करीबी माना जाता है, काफी दबदबा रखते थे. 1966 में ग्वालियर में छात्रों ने आन्दोलन किया, पुलिस ने गोली चलाई और दो छात्र मारे गए. इस घटना के बाद विजयाराजे और डीपी मिश्र के बीच के मतभेद सार्वजानिक हो गए. इसी साल नाराज़ होकर विजयाराजे ने कांग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया और आने वाले लोकसभा-विधानसभा चुनावों में खड़ा होने का ऐलान कर दिया. कारीरा विधानसभा से जनसंघ के टिकट पर जबकि गुना लोकसभा से स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर उन्होंने जीत दर्ज की.



जनसंघ ने विधानसभा में विजयाराजे को विपक्ष का नेता बना दिया. कांग्रेस का भी एक धड़ा जिसका नेतृत्व रीवा के जागीरदार नेता गोविन्द नारायण के पास था वह डीपी मिश्र से खफा था. विजयाराजे और गोविंद ने मिलकर डीपी मिश्र की सरकार को गिरा दिया. हालांकि गोविंद 20 महीने बाद ही कांग्रेस में वापस लौट गए और सरकार गिर गई. साल 1971 में इंदिरा गांधी ने प्रिवीपर्स ख़त्म कर दिया और राजघरानों को मिलने वाला वेतन बंद हो गया. उधर इसी साल पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने ग्वालियर लोकसभा सीट से जीत दर्ज की थी. विजयाराजे इंदिरा के फैसले से काफी नाराज़ थी और इस दौरान उनके करीबी रहे हिंदूवादी नेता संभाजी राव आंगरे ने उन्हें बेटे माधवराव को राजनीति में ले आने की सलाह दी. आंगरे की सलाह पर ही माधवराव को जनसंघ की सदस्यता दिला दी गई. 26 साल के माधव राव ने गुना सीट से कांग्रेस के सीनियर लीडर देशराज जाधव को डेढ़ लाख वोटों से हरा दिया.

कांग्रेस ने ही मां-बेटे को अलग कर दिया
इस अलगाव के केंद्र में भी इमरजेंसी का साल ही था. इमरजेंसी लागू हुई और विपक्ष के बाकी नेताओं की तरह विजयाराजे को गिरफ्तार कर लिया गया जबकि माधवराव नेपाल भाग गए. विजयाराजे ने जब ये वादा किया कि वह राजनीति से दूर रहेंगी तभी माधवराव के खिलाफ जारी वारंट वापस लिया गया. माधवराव अपने पिता की तरह हिंदुत्व की राजनीति के पक्षधर नहीं थे और उनका झुकाव कांग्रेस की तरफ होने लगा. बिना पार्टी जॉइन किए 1977 में उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से ग्वालियर से निर्दलीय की तरह चुनाव लड़ा और जीत गए, हालांकि मध्य प्रदेश की 40 में से 38 सीटों पर जनता पार्टी के कैंडिडेट जीते. 1980 के विधानसभा चुनावों से पहले माधवराव ने कांग्रेस जॉइन कर ली थी और विजयाराजे नई-नई बनी बीजेपी के साथ हो गयीं. विजयाराजे की नाराज़गी इस कदर थी कि 1980 के चुनावों में वो जनता पार्टी के टिकट पर रायबरेली से चुनाव लड़ने पहुंच गई. विजयाराजे के इस फैसले के बाद जय विलास महल में मां-बेटे अलग-अलग रहने लगे. माधवराव मां से इस अलगाव के लिए आंगरे को ज़िम्मेदार मानते थे.

बेटे से लगाव और बीजेपी
विजयाराजे बीजेपी के संस्थापक सदस्यों में से एक थीं. पहली बार 1957 का चुनाव उन्होंने गुना लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर लड़ा और जीता था. 1962 में उन्हें कांग्रेस ने ग्वालियर से टिकट दिया. कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने गुना से 1967 में स्वतंत्र पार्टी से चुनाव लड़ा और जीतीं. इसके बाद वो गुना सीट छोड़कर नहीं गई माधवराव के कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्होंने 4 बार लगातार बीजेपी के टिकट पर यहां से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. 2001 में विजयाराजे की मौत के बाद माधवराव यहां से जीते लेकिन कुछ ही महीनों बाद एक प्लेन क्रैश में उनकी भी मौत हो गई तब से ज्योतिरादित्य यहां से 4 बार लगातार जीत दर्ज कर चुके हैं. माधवराव ने भी कांग्रेस जॉइन करने के बाद ग्वालियर से 5 बार लगातार चुनाव जीता था.



12 अक्टबर 1980 को राजमाता के 60वें जन्मदिन पर एक पार्टी रखी गई थी जहां उन्होंने माधवराव से संपत्ति के बंटवारे की बात कह दी. इसके बाद मां-बेटे के रिश्ते इतने ख़राब हो गए कि राजमाता की बीमारी के वक्त भी माधवराव मिलने नहीं गए. 25 जनवरी 2001 को राजमाता के देहांत के बाद सामने आई वसीयत में माधवराव और ज्योतिरादित्य को अरबों की संपत्ति से बेदखल करने की बात सामने आई थी. वसीयत के हिसाब से उन्होंने अपनी बेटियों को तमाम जेवरात और अन्य कीमती चीजें दी थीं और संभाजी राव आंगरे को विजयाराजे सिंधिया ट्रस्ट का अध्यक्ष बना दिया. रिश्ते इतने ख़राब हो गए थे कि ग्वालियर के जयविलास पैलेस में रहने के लिए उन्होंने माधवराव से एक रुपए साल का किराया भी मांग लिया था. माधवराव से राजमाता इतनी नाराज थीं कि 1985 में अपने हाथ से लिखी वसीयत में उन्होंने माधवराव को अंतिम संस्कार में शामिल होने से भी इनकार कर दिया था.
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