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जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर CJI और सरकार के बीच 'अजीबोगरीब' तनातनी!

Utkarsh Anand | News18Hindi
Updated: May 28, 2018, 7:52 PM IST
जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर CJI और सरकार के बीच 'अजीबोगरीब' तनातनी!
फाइल फोटो

हाईकोर्ट के जज रहे सीएस कर्णन को अपने फैसले में दोषी बताते हुए, 7 जजों की खंडपीठ में से 2 ने यह कहा था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सिस्टम के पुनरीक्षण को जरूरत बताया था.

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बीते 14 महीने से एक अजीबोगरीब वजह से मेमरैन्डम ऑफ प्रॉसिजर (MoP) पर आखिरी फैसला नहीं हो पाया है. MoP एक गाइडबुक है, जो सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को अपॉइंट करने से संबंधित है. केंद्र सरकार का दावा है कि MoP चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और कोलेजिएम की ओर से अटका हुआ है वहीं दूसरे पक्ष का मानना है कि 13 मार्च 2017 को फाइनल प्रपोजल भेजने के लिए बाद इसमें और कुछ नहीं किया जा सकता. इन दोनों तर्कों के बीच सरकार की ओर से जुलाई 2017 में सीजेआई की बजाए सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को पत्र लिखा गया है.

दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने सीजेआई को दो बार MoP में प्रस्तावित बदलाव को लेकर सूचित किया लेकिन इस मामले में आखिरी मैसेज रजिस्ट्रार जनरल को भेजा गया. यह साफ नहीं है कि आखिर क्यों सरकार ने पत्र लिखने के लिए CJI को नहीं बल्कि रजिस्ट्रार जनरल को चुना.

सूत्रों के कहना है कि सीजेआई ने कोर्ट रजिस्ट्री में एक अधिकारी के नाम लिखे लैटर पर रिस्पॉन्ड करना जरूरी नहीं समझा. और इसी गतिरोध के चलते अपॉइंटमेंट्स की प्रक्रिया को अंतिम रूप देने में अनिश्चितता बनी रह गई. सरकार ने मार्च 2016 में और अगस्त 2016 में सीजेआई को एमओपी के मसौदे में संशोधन को लेकर चिट्ठी लिखी थी. सीजेआई ने आखिरकार 13 मार्च, 2017 को एमओपी मसौदा भेजा, और स्पष्ट किया कि यह फाइनल वर्जन है लेकिन सरकार इसे दबाए बैठी रही.

इन सबके बीच जुलाई 2017 में जस्टिस कर्णन को कोर्ट की अवमानना का दोषी पाते हुए 7 जजों की खंडपीठ में से 2 जजों ने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए बने सिस्टम पर पुनर्विचार की जरूरत पर जोर दिया था. जुलाई 2017 के फैसले को अपने नए पत्र का आधार बनाते हुए, सरकार ने एमओपी के मसौदे में और संशोधन के लिए लिखा.

लेकिन, 11 जुलाई, 2017 की तारीख का यह नया लैटर सीजेआई या सीजेआई कार्यालय में भेजा ही नहीं गया था. इसे रजिस्ट्रार जनरल को भेज दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट के सूत्रों ने CNN-NEWS 18 को बताया कि सीजेआई दीपक मिश्रा का मानना ​​है कि न्यायपालिका की ओर से MoP को आखिरी रूप दिया जा चुका है.

सूत्रों का कहना है, 'सीजेआई के मुताबिक,  सरकार के खत पर उन्हें या कॉलेजियम के बाकी जजों को कुछ करने की जरूरत नहीं है क्योंकि रजिस्ट्रार ऑफिस के पास आने वाले हर खत का जवाब देने के लिए सीजेआई ऑफिस बाध्य नहीं है.'

अब जबकि सरकार संसद समेत हर मंच पर दावा करती रहती है कि सुप्रीम कोर्ट और सीजेआई को उसके द्वारा भेजे गए आखिरी संवाद (लैटर) का जवाब देना है, सीजेआई ऑफिस ने तो इस पत्र पर विचार करना भी जरूरी नहीं समझा क्योंकि यह गलत अधिकारी को भेज दिया गया.ऐसा लगता है कि MoP चिट्ठी भेजने और पाने वालों के पतों के बीच ही कहीं अपना रास्ता भूल गया है.

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First published: May 28, 2018, 6:56 PM IST
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