राजस्थान विधानसभा उपचुनाव: इन तीन सीटों पर जीत के लिए जुटे भाजपा-कांग्रेस के रणनीतिकार

राजस्थान उपचुनाव में पूरा फोकस राजसमन्द, सहाड़ा और सुजानगढ़  विधानसभा सीटों पर है. (प्रतीकात्मक तस्वीर )

राजस्थान उपचुनाव में पूरा फोकस राजसमन्द, सहाड़ा और सुजानगढ़  विधानसभा सीटों पर है. (प्रतीकात्मक तस्वीर )

विधानसभा उपचुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही तरफ से जोरताड़ शुरू हो गया है. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनियां उपचुनाव को लेकर पूरी तरह से सक्रिय हैं. पूरा फोकस राजसमन्द, सहाड़ा और सुजानगढ़  विधानसभा सीटों पर है.

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जयपुर. राजस्थान ( Rajasthan) में विधानसभा सत्र खत्म होने के साथ ही प्रदेश में उपचुनाव (by-election) का घमासान शुरू हो गया है. कांग्रेस और भाजपा  के दिग्गज तीनों विधानसभा सीटों के लिए डेरा डालने की तैयारी में है. तीनों जगह टिकट के लिए जिताऊ उम्मीदवारों का चयन इस वक्त सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनियां ( Satish Poonia ) के लिए ये चुनाव अग्नि परीक्षा से कम नहीं है.

विधानसभा उपचुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही तरफ से जोरताड़ शुरू हो गया है. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनियां उपचुनाव को लेकर पूरी तरह से सक्रिय हैं. वह प्रदेश भर से आने वाले कार्यकर्ताओं और नेताओं को पूरा समय दे रहे हैं, लेकिन इस वक्त उनका पूरा फोकस राजसमन्द, सहाड़ा और सुजानगढ़  विधानसभा सीटों पर है. पूनियां का दावा है कि तजुर्बे के साथ युवा जोश को टिकट में प्राथमिकता मिलेगी. संकेत साफ है, बुजुर्ग दावेदारों के बजाय युवा पार्टी की प्राथमिकता में होंगे.

भाजपा में  राजसमंद और सहाड़ा में टिकट के दावेदारों में परिवारवाद हावी दिख रहा है. भाजपा में इस बार कांग्रेस की तरह गुटबाजी ज्यादा दिख रही है. जिससे कार्यकर्ता परेशान हैं. भाजपा का कमजोर पक्ष आपसी फूट है, पर उसका मजबूत कैडर उसकी ताकत है. कांग्रेस का ग्रासरूट तक कैडर नहीं दिखाई देता. आरएसएस के मुकाबले बूथ मैनेजमेंट की काट निकालने में कांग्रेस को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है.

भाजपा में किरण माहेश्वरी और पूर्व सांसद हरिओम सिंह राठौड़ के परिवारों से तगड़ी दावेदारी सामने आई है. किरण माहेश्वरी की बेटी दीप्ति माहेश्वरी मैदान में ताल ठोक रहीं हैं. अपनी मां की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए टिकट मांग रही हैं. पूर्व सासंद हरिओम सिंह राठौड़ के पुत्र कर्णवीर सिंह राठौड़ की भी मजबूत दावेदारी  हैं. इन दोनों की लड़ाई में महेंद्र कोठारी और जगदीश पालीवाल में से किसी एक को टिकट मिल सकता है. दिनेश बड़ोला भी दावेदार  हैं. भाजपा का एक खेमा सहानुभूति फैक्टर को ध्यान में रखते हुए दीप्ति की पैरवी कर रहा है. माहेश्वरी के नाम पर नेता प्रतिपक्ष गुलाबंचद कटारिया का खेमा सहमत नहीं है. कटारिया के अलावा सांसद दीया कुमारी का खेमा अपना उम्मीदवार उतारना चाहता है.
मजबूत पक्ष-

राजसमन्द भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है. आरएसएस का यहां अच्छा प्रभाव है.

कमजोर पक्ष -



भाजपा में जबरदस्त खेमेबंदी. गुटबाजी की वजह से नुकसान. नगर परिषद चुनाव भी भाजपा हार चुकी. इसलिए गलत टिकट चयन पार्टी की उम्मीदों पर पानी फेर सकता है. सभी को स्वीकार्य चेहरे की तलाश में नेता मशक्कत कर रहे हैं.

सहाड़ा भाजपा में तो टिकट की लड़ाई घर के भीतर है. दो सगे भाई और कांग्रेस विधायक के समधी दावेदार हैं. पूर्व विधायक डॉ. रतनलाल जाट, डॉ. बालूराम जाट, रूपलाल जाट, मनफूल चौधरी, कालूलाल गुर्जर और लादूलाल पीतलिया दावेदार हैं. डॉ. रतनलाल और डॉ. बालूराम सगे भाई हैं. दोनों पहले विधायक रह चुके हैं. रूपलाल जाट को पिछली बार टिकट मिला था, जिसमें वे हार गए थे. रूपलाल जाट कांग्रेस विधायक रामलाल जाट के समधी हैं. मनफूल चौधरी कमर्शियल टेक्सेशन के अधिकारी हैं. टिकट के लिए नॉकरी छोडऩे की तैयारी कर रहे हैं. पूर्व मुख्य सचेतक कालूलाल गुर्जर और भाजपा नेता लादूलाल पीतलिया भी दावेदार हैं. सहाड़ा से सियासी समीकरणों के हिसाब से भाजपा जाट को टिकट दे सकती है.

मजबूत पक्ष- भाजपा के दावेदार अनुभवी हैं. पहले विधायक रह चुके हैं.

कमजोर पक्ष-  गुटबाजी का नुकसान हो सकता है. खेमेबंदी समस्या. नगरपालिका चुनाव में जीत के बावजूद आपसी फूट के कारण बोर्ड नहीं बना था. सतीश पूनियां इसलिए यहां फूंक -फूंक कर कदम रख रहे हैं. नए चेहरे पर भी पार्टी दाव लगा सकती है.

भाजपा में तीन बड़े दावेदार उभर कर सामने आए हैं. पूर्व मंत्री खेमाराम मेघवाल, बीएल भाटी और संतोष मेघवाल दावेदार हैं. संतोष मेघवाल वर्तमान में प्रधान है. पिछले चुनाव में निर्दलीय लडक़र 36 हजार वोट हासिल किए थे. कुछ माह पहले ही भाजपा में आए हैं.  बीएल भाटी पहले पूर्व मंत्री युनूस खान के ओएसडी रहे हैं.  पिछली बार भी टिकट की दावेदारी की थी. खेमाराम मेघवाल 2 बार विधायक रह चुके हैं. वसुंधरा राजे के पहले कार्यकाल में खान मंत्री बने. मगर पिछला चुनाव हार गए.

टिकट के लिए अगला सप्ताह निर्णायक है. भाजपा एक के बाद एक कई सर्वे करा चुकी है. जिताऊ चेहरे के लिए सर्वे की रिपोर्ट अहम होगी. इसलिए दावेदार फील्ड में माहौल बनाकर टिकट पक्का करने में जुटे हैं.
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