अमित शाह: रिकॉर्ड रैलियां, शास्त्रीय संगीत और शतरंज के खिलाड़ी!

सियासत और शतरंज के खिलाड़ी अमित शाह अपनी आलोचना वाली खबरें भी संभालते हैं. सियासी चक्रव्यूह रचने में माहिर हैं, विरोधियों को या तो हाशिए पर कर देते हैं या फिर अपने पक्ष में. जैसा मौका वैसी चाल...

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: May 30, 2019, 8:04 PM IST
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: May 30, 2019, 8:04 PM IST
कम ही लोग जानते हैं कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह शतरंज के खिलाड़ी रहे हैं. 2006 में वो गुजरात स्टेट चेस ऐसोसिएशन के चेयरमैन थे. इस खेल में उनकी दिलचस्पी इतनी है कि तब उन्होंने पायलट प्रोजेक्ट के रूप में अहमदाबाद के सरकारी स्कूलों में शतरंज को शामिल करा दिया था. दरअसल, शतरंज के नियम उन्होंने सियासत में भी बखूबी आजमाए हैं. तभी वह जानते हैं कि कौन मोहरा किस जगह राजा और रानी के लिए कब खतरा बन सकता है? कौन किसकी काट के लिए काम आ सकता है? शतरंज की तरह शाह की सियासत के कोई तयशुदा नियम नहीं हैं, जैसा मौका वैसी चाल.

नाटकों में भी उनकी बहुत रुचि है. अपने विद्यार्थी जीवन में कई मौकों पर उन्होंने मंच पर प्रदर्शन किया है. सियासत भी रंगमंच ही है. इसे उनसे बेहतर भला कौन समझ सकता है? देखने में बहुत गंभीर लगने वाले शाह अपनी अति-व्यस्तता और बहुत सारे सार्वजनिक कार्यक्रमों के बावजूद शास्त्रीय संगीत सुनकर तथा शतरंज खेलकर खुद को तरोताजा कर लेते हैं. समय मिलने पर वह क्रिकेट का भी आनंद लेते हैं. शतरंज के खिलाड़ी की तरह ही चुनाव में भी जीत के लिए काम करते रहना उनका शौक बन गया है. इसीलिए वो बीजेपी के सबसे सफल अध्यक्ष हैं.



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मसालेदार खाना, मुकेश का गाना और अंताक्षरी



सबसे बड़ी पार्टी का अध्यक्ष पद संभालने वाले शाह अपनी छोटी-छोटी ख्वाहिशों को पूरा करना नहीं भूलते. बताया जाता है कि शाह खाने के काफी शौकीन हैं. उन्हें मसालेदार खाना भाता है. पाव भाजी पसंद है. शाह अपनी लंबी कार यात्राओं के दौरान शास्त्रीय संगीत सुनते हैं. वह गायक मुकेश के प्रशंसक हैं. अंताक्षरी खेलना भी उन्हें बहुत अच्छा लगता है. कहा जाता है कि शाह कभी अंताक्षरी में हारते नहीं. उन्हें हिंदी के बेशुमार गाने याद हैं.

रैलियों और यात्रा का रिकॉर्ड
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अमित शाह ने 2019 का चुनाव जीतने के लिए 312 लोकसभा क्षेत्रों का दौरा किया. 161 रैलियां और 18 रोड शो किए. कुल 1.58 लाख किमी की यात्रा की. यह देश की किसी भी पार्टी के अध्यक्ष से अधिक है. अब अगर एग्जिट पोल में बीजेपी को सबसे आगे बताया जा रहा है तो उसके पीछे यह मेहनत ही है. वह कभी चैन से नहीं बैठते. एग्जिट पोल अगर सच में बदलता है तो इस धमाकेदार जीत का असली सेहरा पीएम नरेंद्र मोदी के बाद अगर किसी के सिर बंधता है तो वह हैं अमित शाह.

कभी चुनाव नहीं हारे

शाह 1989 से 2017 के बीच छोटे-बड़े 43 चुनाव लड़ चुके हैं. जीवन में एक भी चुनाव नहीं हारे. उनको करीब से जानने वाले लोग बताते हैं, "शाह को यूं ही चाणक्य नहीं कहा जाता. वह सियासी चक्रव्यूह रचने में माहिर हैं. वह विरोधियों को या तो हाशिए पर कर देते हैं या अपने पक्ष में कर लेते हैं. उन्हें जहां पर सेंध लगानी होती है, वहां की पूरी स्टडी करते हैं. बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अपने एक लेख में बताया है कि शाह चुनावों के लिए बहुत पहले से उसी तरह तैयारी करते हैं, जैसे प्रतिभावान और मेहनती छात्र लगातार पढ़ाई करते हैं. अमित शाह ने 17 साल की उम्र में ही चाणक्य का पूरा इतिहास पढ़ लिया था.

सुबह 7 बजे टेबल पर होती है डिटेल!

वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु मिश्र कहते हैं, "कोई भी अमित शाह की विचारधारा और कार्यशैली की आलोचना कर सकता है, लेकिन उनकी जीवटता और मेहनत पर सवाल नहीं उठा सकता. अलग-अलग भाषाओं के अखबारों में क्या छपा है, इस बारे में वह सुबह 7 बजे तक अपडेट हो जाते हैं. 6 बजे पूरी डिटेल उनकी टेबल पर होती है. उनकी टीम में भी उन्हीं की तरह छह घंटे की नींद लेने वाले लोग काम करते हैं.”

मिश्र के मुताबिक, संगठन क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता कि वह किसी भी बूथ के कार्यकर्ता से सीधे संपर्क कर सकते हैं. सबका डेटाबेस उनके पास है. एक लक्ष्य पूरा होने से पहले वह दूसरा तय रखते हैं. किसी को कभी बैठने नहीं देते. उनके किसी प्रदेश में पहुंचने से पहले उनकी टीम पहुंच जाती है. वह जल्दी किसी पर विश्वास नहीं करते, लेकिन जब किसी पर उन्हें विश्वास हो जाता है तो फिर उसे बहुत मानते हैं."

मिश्र के मुताबिक, रणनीति बनाने वाली इनकी कोर टीम में कैलाश विजयवर्गीय, भूपेंद्र यादव, राम माधव, अनिल जैन और सुनील बंसल बताए जाते हैं. मीडिया की रणनीति अमित मालवीय और अनिल बलूनी बनाते हैं.

शतरंज के खिलाड़ी की सियासत


यह शतरंज के खिलाड़ी अमित शाह की सियासी जादूगरी ही है कि उन्‍होंने कांग्रेस को सिर्फ पांच राज्यों में समेटकर देश का सियासी नक्शा ही बदल दिया है. चुनाव जीतने के लिए अमित शाह ने गणित भी लगाया और केमिस्ट्री भी बनाई. उन पार्टियों से भी समझौता किया, जिनका सिर्फ किसी क्षेत्र विशेष या जाति विशेष में ही प्रभाव था. कोशिश बस पार्टी के लिए जोड़ने की रही. उन्होंने ओबीसी और दलितों को पार्टी से जोड़ने के लिए जातियों के नेताओं को पार्टी में तवज्जो दी. मौर्य, कुशवाहा, यादव, राजभर और निषादों को बड़े पैमाने पर बीजेपी के साथ शिफ्ट करने में वह कामयाब रहे.

जब अमित शाह किसी प्रदेश को जीतने के लिए उतरते हैं तो अपने काम इतने इनवॉल्व हो जाते हैं कि पांच-छह घंटे ही सोते हैं. चुनाव जीतने के लिए वह उसी तरह तैयारी करते हैं, जैसे कोई मेहनती छात्र परीक्षा में अव्वल आने के लिए लगन से पढ़ाई करता है. इसीलिए वह लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल कर लेते हैं.

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संभालते हैं निगेटिव खबरें

आमतौर पर नेताओं को पॉजिटिव खबरें ही पसंद आती हैं, लेकिन शाह ऐसे नेता हैं जो अपने लिए छपी निगेटिव खबरों को भी संभाल लेते हैं. अमित शाह ने अपनी वेबसाइट पर 'प्रेस' कॉर्नर में Critic ऑप्शन भी डलवाया है. वो अपनी आलोचनाओं से सीखते हैं. साथ ही यह बताने की कोशिश करते हैं वह आलोचनाओं को बर्दाश्त करते हैं.

शाह के साथ यूं ही नहीं जुड़ते गए रिकॉर्ड!

अमित शाह अगस्‍त 2014 से बीजेपी के अध्‍यक्ष हैं. उन्होंने न सिर्फ भारत के सियासी नक्शे को भगवामय किया है बल्कि भाजपा को 10 करोड़ सदस्‍यों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भी बनवाया है. इसके पीछे उनकी रणनीति और मेहनत काम करती है. 2016 के विधानसभा चुनावों में असम, त्रिपुरा में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी. यही नहीं केरल, पश्‍चिम बंगाल तथा तमिलनाडु में भी मजबूती से उभरी. इसलिए कोई इससे इनकार नहीं कर रहा है कि बीजेपी के अब तक के शानदार सफर के सबसे बड़े सेनानी अमित शाह हैं.

शाह किसी दिन बैठते नहीं, बल्कि पार्टी को मजबूत करने के लिए किसी न किसी जगह का उनका दौरा तय रहता है. शाह का यात्रा विवरण देखें तो उन्होंने सिर्फ उन राज्यों का दौरा नहीं किया, जिनमें बीजेपी की सरकार हैं बल्कि उन पर भी फोकस किया जहां अभी भगवा ध्वज फहराया जाना बाकी है. शाह के ज्‍यादातर दौरे वो थे जिनमें वह पार्टी का जमीनी ढांचा मजबूत कर रहे थे या उसे आंध्र प्रदेश, केरल, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना एवं पश्‍चिम बंगाल जैसे पारंपरिक रूप से कमजोर राज्यों में पूरी तरह जमीन से ही खड़ा करने में लगे हुए थे. एग्जिट पोल के मुताबिक इनमें भी बीजेपी इस बार अच्छा करती दिख रही है.

संगठन पर जोर, चुनौतियों से उबरने की सीख

अपनी यात्रा में वह न सिर्फ संगठन को चुनौतियों से उबारने का मंत्र बताते हैं बल्कि उनकी कोशिश है कि सरकार और संगठन की आपसी नाराजगी दूर हो. हरियाणा जैसे राज्य जहां सरकार में कार्यकर्ताओं, विधायकों की सुनवाई नहीं हो रही है वहां वह एसपी, डीसी के साथ पार्टी के लोगों की बैठक करवाने को कह रहे हैं. ताकि विधानसभा चुनाव में इसका खामियाजा न भुगतना पड़े.

मार्च 2017 तक की उनकी यात्राओं का विश्लेषण करें तो शाह ने एक दिन में औसतन 524 किमी का सफर किया. आपको शायद यकीन न हो, उन्होंने तब 32 महीने में पांच लाख 7 हजार किलोमीटर से ज्‍यादा लंबी यात्राएं कीं थीं. सियासी विश्लेषकों के मुताबिक, शाह की सक्रियता का ही नतीजा है कि बीजेपी इस तरह से उभरी. देश का राजनीतिक नक्शा बदल चुका है तो उसके पीछे कहीं न कहीं शाह की रणनीति और मेहनत काम करती है.

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पोल एजेंट से पार्टी अध्यक्ष तक

अमित शाह गुजराती हैं, लेकिन उनका जन्म मुंबई में हुआ था. अहमदाबाद में वह आरएसएस सदस्य बने. एबीवीपी के लिए काम किया और 1984-85 में बीजेपी में आए. पहली बार पार्टी ने उन्हें अहमदाबाद के नारायणपुर वार्ड में पोल एजेंट बनाया था. पोल एजेंट रहने के दौरान ही उन्होंने राजनीति का गणित समझना शुरू कर दिया था.

इसके बाद भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और फिर गुजरात भाजपा के उपाध्यक्ष तक वह एक के बाद एक सीढ़ियां चढ़ते गए. ज़मीनी स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं तक उनकी पहुंच और उनसे निजी तौर पर जुड़े रहने के कारण उनकी छवि बाक़ी नेताओं से अलग बनी. जब गुजरात में मोदी युग शुरू हुआ तो उन्‍हें गृह मंत्रालय दिया गया.

यूपी की चुनौती से पार पाना

चुनावी गणित के महारथी शाह को छोटे से छोटे आंकड़े पर गौर करने के लिए जाना जाता है. इसीलिए वह जानते थे कि केंद्र में सरकार बनाने के लिए उत्तर प्रदेश में जीतना बेहद महत्वपूर्ण है. 2014 में ही बेहद अहम लोकसभा चुनाव हुए और तभी से उनका उत्तर प्रदेश से रिश्ता शुरू हुआ. बीजेपी ने उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे सियासी तौर पर बेहद जटिल माने जाने वाले राज्य का काम सौंपा. वह भी इस चुनौती को समझ रहे थे. इस बैटल ग्राउंड को जीतने के लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश के हर कोने में यात्रा की और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के साथ पार्टी के विकास के एजेंडा को आगे बढ़ाया. नतीजा इतना शानदार रहा कि बीजेपी ने यूपी में 80 में 73 सीटों पर जीत हासिल की. 2019 में भी उनकी सबसे ज्यादा यात्राएं यूपी में ही हुई हैं.

पार्टी अध्यक्ष बनते ही मार लिया मैदान

पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद पहले ही साल बीजेपी ने पांच में चार विधानसभा चुनाव जीत लिए- महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा में पार्टी के मुख्यमंत्री बने तो जम्मू-कश्मीर में उपमुख्यमंत्री के पद के साथ बीजेपी गठबंधन सरकार का हिस्सा बनी. उन्‍होंने यूपी विधानसभा चुनाव में भी प्रचंड बहुमत के साथ बीजेपी की सरकार बनवाने की कामयाबी हासिल की. वहां पार्टी का वनवास खत्म करवाया.

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हालांकि, दिल्ली और बिहार में हार के बाद बीजेपी के कई वरिष्ठ नेताओं ने अमित शाह की लीडरशिप पर सवाल खड़े किए थे लेकिन असम, त्रिपुरा जैसे राज्यों में जीत के बाद उनकी तारीफ करने में तनिक भी देर नहीं की. ज़ाहिर है कि यह तारीफ बेकार नहीं गई. बिहार में भी नीतीश कुमार के साथ बीजेपी की सरकार बनवा ली. एग्जिट पोल  के मुताबिक 2019 में भी उनकी रणनीति और मेहनत सफल होती दिख रही है.

 

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