अमित शाह @3साल: बीजेपी के चाणक्‍य जिनका लोहा विपक्षी भी मानते हैं

News18.com
Updated: September 14, 2017, 4:30 PM IST
अमित शाह @3साल: बीजेपी के चाणक्‍य जिनका लोहा विपक्षी भी मानते हैं
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Updated: September 14, 2017, 4:30 PM IST
'कभी अपने रहस्य दूसरों के साथ साझा नहीं करने चाहिए, आज नहीं तो कल वे आपको नष्ट ही कर देंगे.' ये कहना है वर्तमान भारतीय राजनीति के सबसे बड़े रणनीतिकार चाणक्य भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का. भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह इस कथन का कड़ाई से पालन करते हैं. उनके अनुसार, किसी मिशन की सफलता उसकी गोपनीयता पर भी निर्भर करती है. इन दिनों बीजेपी हेडक्वार्टर में ये बात अक्सर दोहराई जाती है. इसमें कोई दोराय नहीं है कि अमित शाह के निर्णय समय-समय पर न सिर्फ जनता को बल्कि उन लोगों को भी चौंकाते रहे हैं जिनका दिल्ली की राजनीति और पार्टी विशेष में अच्छा दखल माना जाता है. उन्‍होंने बतौर बीजेपी अध्‍यक्ष तीन साल पूरे कर लिए हैं. अमित शाह का लोहा न सिर्फ उनकी पार्टी के लोग बल्कि विपक्षी भी मानते हैं.

एक वरिष्ठ भाजपा नेता का कहना है, 'शाह पुराने ढर्रे की राजनीति में भरोसा नहीं करते हैं. जहां पार्टी नेताओं पर मेहरबान रहती है, उनका लक्ष्य तय है और वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी को मिली लोकप्रियता को वोटों में बदलना चाहते हैं.' शाह आगे बढ़कर नेतृत्व लेने में भरोसा करते हैं. भाजपा अध्यक्ष बनने के 36 महीनों में शाह ने लगभग 5,68,940 किलोमीटर यात्रा करते हुए देश के 680 में से 325 जिलों का दौरा किया है. उन्होंने 575 रैलियों और सभाओं को संबोधित किया है और 2203 संगठन की सभाएं की हैं.



रणनीतिकार शाह

शाह संगठन को एक पार्टी की तरह नहीं, बल्कि एक संस्थान की तरह देखते हैं. 11 अशोक रोड पर न्यूज़18 को एक भाजपा नेता ने बताया कि जबसे शाह ने पार्टी अध्यक्ष का पद संभाला है, उन्होंने स्टाफ के किसी भी व्यक्ति को नहीं बदला है. तमाम धारणाओं से अलग पार्टी अध्यक्ष के ऑफिस में गुजरात संबंधी मामलों को देखने के लिए एक ही आदमी है. शाह ने जब से पद संभाला है उन्होंने पार्टी के अंदर बने हुए कई धड़ों को ख़त्म किया है. उन्होंने भाजपा के अंदर ही 19 विभाग और 10 प्रोजेक्ट बनाए हैं ताकि पार्टी बिना किसी रुकावट के असरदार तरीके से काम कर सके.

शाह के करीबी बताते हैं कि 11 करोड़ कार्यकर्ताओं वाली पार्टी को असरदार बनने के लिए एक संगठन की तरह काम करने की जरूरत है. शाह ने इन नए विभागों को बनाकर राष्ट्र को यही संदेश देना चाहा है. शाह का दूसरा संदेश जो पार्टी के लोगों के लिए था, 'पार्टी की संस्कृति को बदले बिना पार्टी के कामकाज का आधुनिकीरण.' उनके द्वारा विभाग विभाजित करने में इस बात की झलक साफ देखी जा सकती है. जैसे पार्टी में सुशासन, पॉलिसी रिसर्च, कानूनी दस्तावेज, पार्टी की पत्रिकाएं बनाने व छापने संबंधी भी विभाग हैं. प्रशिक्षण और फीडबैक के कामकाज पर भी जोर दिया गया है.

जो 10 प्रोजेक्ट पार्टी के अंदर शुरू किए गए हैं उसमें ऑफिस के नवीनीकरण और पार्टी के जिला दफ्तर बनवाने का भी प्रस्ताव है. 2017 के ख़त्म होने तक भारत के सभी जिलों में भाजपा के ऑफिस होंगे. इस योजना के तहत लक्षद्वीप जैसे छोटे, केंद्रशासित प्रदेश में शाह ने मई के तीसरे हफ्ते में बूथ विस्तारकों के साथ एक सभा की थी. शाह ने ये भी सुनिश्चित किया कि पार्टी के नेता और मंत्री दोनों ही समय-समय पर बूथ-लेवल संवाद करते रहें.



कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने न्यूज़ 18 को बताया, 'शाह किसी भी मामले की तह तक जाते हैं और जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा, वे जनसंघ के समय के मूल्यों को पार्टी में वापस लेकर आए हैं. उन्होंने पार्टी के सभी पेंच कस दिए हैं, अब हमें बूथों पर अपनी पकड़ बनानी है और जनसम्पर्क मजबूत करना है.'

अप्रैल के आखिरी हफ्ते में शाह ने देश के सभी बड़े राज्यों में 3 दिन, छोटे राज्यों में 2 दिन और केंद्रशासित प्रदेशों में 1 दिन बिताने का मिशन शुरू किया. इसके लिए वे 95 दिनों में 2 लाख किलोमीटर की यात्रा करेंगे. उनकी बूथ-विस्तारक योजना का आगाज़ पश्चिम बंगाल में हो चुका है, जहां 2014 में मोदी लहर बेअसर रही थी.

शाह की इस यात्रा से पहले हुई मुलाक़ात को याद करते हुए भाजपा के नेशनल जनरल सेक्रेटरी और बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय बताते हैं, 'उन्होंने मुझसे पूछा- सबसे कठिन क्षेत्र कौन सा है? और फिर उन्होंने कहा, यात्रा वहीं से शुरू करते हैं.' उन्होंने बताया कि शाह हर 3 महीने पर पश्चिम बंगाल की एक रिव्यू मीटिंग करते हैं, अगले 3 महीने के लिए लक्ष्य तय करते हैं. वे बंजर भूमि में भी हरियाली ला सकते हैं. शाह की उनके साथ हुई बातचीत बहुत छोटी सी थी, जिसमें शाह ने उनसे फ़ोन पर कहा कि संगठन बंगाल में बहुत कमजोर है, वे उसकी मजबूती की शुरुआत वहीं से करना चाहते हैं.

फ्रंटफुट पर खेलना पसंद है
शाह के बारे में मजेदार ये है कि वे किसी तरह की कोर टीम बनाने में भरोसा नहीं करते हैं. वे अलग-अलग कामों के लिए अलग-अलग लोगों पर निर्भर रहते हैं. भाजपा के एक अन्य नेता का कहना है,'ये किसी भी तरह के नकारात्मक असर को कम करता है.' शाह के काम करने के तरीका पार्टी के लोगों को भी अचम्भे में डालता रहा है. एक बार उन्होंने एक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ता रहे सुनील बंसल को 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले की गतिविधियां जांचने के लिए उत्तर प्रदेश भेज दिया था. उनकी इस मैनेजमेंट ने ही हमें 71 सीटों पर जीत दिलाई.

बंसल के अलावा राम माधव पर भरोसा दिखाते हुए जम्मू एवं कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में भी पार्टी ने अपनी पैठ बना ली है. असम में भाजपा को मिले भारी बहुमत के पीछे भी राम माधव की रणनीति को ही कारगर माना जाता है. पार्टी अभी अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में सत्ता में है. मई के पहले हफ्ते में अमित शाह त्रिपुरा के दौरे पर गए, जहां उन्होंने माणिक सरकार के राज पर निशाना साधा. जल्दी ही तृणमूल कांग्रेस के 6 विधायक बगावत कर भाजपा में शामिल हो गए. जहां भाजपा ने शाह के नेतृत्व में बिहार और दिल्ली को छोड़कर सभी राज्यों में जीत हासिल की, वहीं पार्टी के उपाध्यक्ष विनय सहस्रबुद्धे का कहना है, 'हम बूथ लेवल पर अपनी पकड़ बना रहे हैं और ऐसे में शाह को भाजपा की इलेक्शन जिताने वाली मशीन समझना गलत होगा. यह एक लक्ष्य निर्धारित कर के की जाने वाली राजनीति का नतीजा है.'

इसमें कोई दोराय नहीं है कि शाह भाजपा को 4 दशकों की सबसे अधिक ऊंचाई पर ले गए हैं. राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं कि शाह अन्य भाजपा नेताओं की तरह नहीं हैं. वे बेहद मेहनती हैं और सत्ता के लिए उनकी भूख उन्हें विपक्ष के लिए भयंकर डर का कारण बनाती हैं. कोई भी उनके काम करने के तरीके से असहमत हो सकता है, मगर आखिर में यही मायने रखता है कि उन्होंने पार्टी को किन ऊंचाइयों पर पहुंचाया. अमित शाह के दिल्ली आने तक भाजपा 7 राज्यों में थी, ये आंकड़ा अब 18 है.

मारया शकील
First published: September 14, 2017
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