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OPINION: क्या 'दबंग जातियों' को मुख्यमंत्री पद न देना BJP की नई तरह की राजनीति है?

News18Hindi
Updated: December 3, 2019, 7:43 PM IST
OPINION: क्या 'दबंग जातियों' को मुख्यमंत्री पद न देना BJP की नई तरह की राजनीति है?
आजादी के बाद कुछ इस तरह से बदली उत्‍तर प्रदेश की राजनीति.

आजादी के बाद उत्‍तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की राजनीति (Politics) में कई प्रयोग देखने को मिले. कांग्रेस (Congress) ने पहले तीन दशक में केवल ब्राह्मण और बनिया समुदाय (Brahmin or Bania Community) के नेताओं पर ही भरोसा जताया था.

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(सुमित पांडेय)

आजादी के बाद पहले तीन दशक में कांग्रेस ने ब्राह्मण और बनिया समुदाय से संबंधित नेताओं को ही उत्‍तर प्रदेश का मुख्‍यमंत्री बनाया. हालांकि इंदिरा गांधी छोटे समुदाय के नेताओं को भी महत्‍व देती रहीं. पार्टी ने दलित और मुस्लिम समेत सभी जातियों से अच्‍छे संबंध बनाए. पार्टी को उनका समर्थन भी मिला, लेकिन उन्‍होंने शीर्ष पदों पर ब्राह्मण और बनिया समुदाय के नेताओं को ही रखा.

वक्त गुजरने के साथ दूसरे सामाजिक समीकरणों ने कांग्रेस के एकाधिकार को चुनौती दी. चरण सिंह कांग्रेस से रिश्ता तोड़ कर समाजवादियों और जनसंघ की मदद से 1967 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. राम मनोहर लोहिया ने दूसरे कृषक समुदायों को इकट्ठा करने की कोशिश की, जिन्हें अब अन्य पिछड़ा वर्ग के नाम से पहचाना जाता है. उन्होंने भी सत्ता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की.

जब कांग्रेस ने खेला राजपूत कार्ड

वहीं, कांग्रेस ने किसानों को लुभाने के लिए वीपी सिंह को प्रेजेंट किया. 1980 में उन्‍हें उत्‍तर प्रदेश का मुख्‍यमंत्री बनाया गया. हालांकि जनता पार्टी के शासन के तीन साल बाद उस समय प्रतापगढ़ के दिनेश सिंह और अमेठी के धूनी सिंह जैसे प्रमुख नेताओं ने इंदिरा गांधी को चुनाव जीतने में मदद की. उत्‍तर प्रदेश में ऐसा पहली बार था जब सत्‍ता की कमान किसी राजपूत के हाथ में सौंपी गई.

भारतीय राजव्यवस्था में मजबूत स्थिति होने के कारण कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में जातीय और सामाजिक समीकरणों के बीच खूब प्रयोग किए. कुछ प्रयोग तो राजनीतिक आवश्यकताओं के कारण हुए. दूसरे समीकरण शीर्ष नेतृत्व की पसंद/नापंसद की वजह से भी पनपे.

2014 के बाद बीजेपी ने किए कई प्रयोग
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वर्ष 2014 तक राजनीतिक परिदृश्‍य काफी बदल चुका था. बीजेपी का प्रभुत्‍व काफी बढ़ गया था, जिसके कारण पार्टी को कई राज्‍यों के विधानसभा चुनावों में जीत मिली. कई राज्‍यों में बीजेपी की सरकार आ गई थी. 2014 में हरियाणा और महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. वहीं झारखंड में बीजेपी की सीटों में काफी इजाफा हुआ और रघुवर दास के नेतृत्‍व में सरकार बनाई.

कई राज्‍यों में राजनीतिक वर्चस्‍व बढ़ने के साथ ही बीजेपी ने भी कई प्रयोग किए. पार्टी ने महाराष्‍ट्र में एक ब्राह्मण देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाया. वहीं हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर को मुख्‍यमंत्री के रूप में प्रेजेंट किया गया. वहीं झारखंड में एक आदिवासी रघुवर दास को सरकार की कमान सौंपी गई.

इन तीनों राज्‍यों में बीजेपी ने ऐसे व्‍यक्तियों के हाथ में नेतृत्‍व सौंपा, जो संख्‍यात्‍मक रूप से प्रभावी जाति या सामाजिक समूह से संबंधित नहीं थे. बाद में वर्ष 2017 में उत्‍तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद बीजेपी में यूपी के नेतृत्‍व को लेकर थोड़ा असमंजस दिखा. फिर उच्‍च जाति के नेता योगी आदित्‍यनाथ को प्रदेश का मुख्‍यमंत्री बनाया गया.

राजस्थान में ओबीसी गहलौत हैं मुख्यमंत्री
राजनीति में मिसाल के तौर पर राजस्‍थान जैसे उदाहरण भी मिलते हैं. जहां अशोक गहलोत संख्‍यात्‍मक रूप से छोटे ओबीसी समुदाय से आते हैं. राज्‍य में जाटों और राजपूतों का प्रभाव है. लेकिन वे सत्‍ता की राजनीति में बराबर प्रतिस्‍पर्धा में रहते हैं.

सामाजिक गठबंधन में इस तरह के प्रयोगों की सफलता या विफलता इस बात पर निर्भर करती है कि नेतृत्व कितना संतुलित और फुर्तीला है. साथ ही अपने प्रभाव को संतुलित बनाए रखने में वह कितना सक्षम है. अगर ऐसा नहीं तो क्षेत्रीय मुद्दे विपरीत स्थिति पैदा करते हैं.

राष्‍ट्रीय मुद्दों के सामने क्षेत्रीय मुद्दे धराशायी
अगर चुनाव में राष्‍ट्रीय मुद्दे छाए रहते हैं तो क्षेत्रीय मुद्दे कम प्रभावी होते हैं. इसका सीधा उदाहरण लोकसभा चुनाव 2014 है. उस समय नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा गया था और मोदी बयार होने के कारण क्षेत्रीय मुद्दे प्रभावशाली नहीं हो सके. इस चुनाव में अधिकांश राज्‍यों में बीजेपी का प्रदर्शन अच्‍छा रहा था.

हालांकि, विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय मुद्दे ज्‍यादा प्रभावशाली होते हैं. शायद इसलिए हरियाणा के विधानसभा चुनाव में जाट समुदाय का बीजेपी के प्रति गुस्‍सा साफ तौर पर दिखा. इसका खामियाजा यह भुगतना पड़ा कि बीजेपी पूर्ण बहुमत से सत्‍ता में वापसी नहीं कर सकी. जाट समुदाय ने भी सत्‍ता में अपनी हिस्‍सेदारी बना ली. बीजेपी को जेजेपी का समर्थन लिया और डिप्‍टी सीएम पद से समझौता करना पड़ा. जाटों के विरोध का फायदा जाट नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा को भी हुआ. राज्‍य में उनकी सीटें बढ़ गई और वह सम्‍मानजनक रूप से विपक्ष की भूमिका में आ गए.

मराठों ने महाराष्‍ट्र में बीजेपी को कमजोर किया
वहीं, महाराष्‍ट्र में बीजेपी को सत्‍ता से हटाने के लिए मराठों ने अल्पसंख्यकों और महारों के साथ 'ट्रिपल M' का फॉर्मूला अपनाया. राज्‍य में मुख्‍यमंत्री तो शिवसेना का बना, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि सत्‍ता की चाबी शरद पवार के साथ में है.

झारखंड में भी बीजेपी ने राज्‍य को पांच साल तक गैर आदिवासी मुख्‍यमंत्री देने का प्रयोग किया. राज्‍य में झारखंड स्‍टूडेंट यूनियन (AJSU) के साथ बीजेपी का गठबंधन टूट गया है. झारखंड मुक्ति मोर्चा आदिवासी क्षेत्र में अपना प्रभुत्व हासिल करने की कोशिश कर रहा है. यह आश्चर्यजनक नहीं है कि भाजपा सरकार गठन के लिए पोस्ट पोल की स्थिति में क्षेत्रीय उम्मीदों के लिए अधिक अनुकूल होने के लिए तैयार है.

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First published: December 3, 2019, 5:13 PM IST
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