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Lok Sabha Election 2019: असम में बीजेपी की संभावनाओं पर असर डालेगा नागरिकता संशोधन विधेयक?

(Photo Credit: PTI)
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लोकसभा चुनाव 2019 के दूसरे चरण में गुरुवार को राज्य की पांच सीटों के लिए वोटिंग हो रही है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 18, 2019, 12:39 PM IST
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(निकिता वशिष्ठ)

लोकसभा चुनाव 2019 के दूसरे चरण में असम की पांच संसदीय सीटों के लिए गुरुवार को वोटिंग हो रही है. बीजेपी  के पांच, कांग्रेस के पांच, तृणमूल कांग्रेस के चार, एआईएफबी से दो और एआईयूडीएफ से एक प्रत्याशी मैदान में है. बाकी प्रत्याशी दूसरी छोटी पार्टियों से हैं.

असम के करीमगंज, सिलचर, मंगलदोई, नगांव और स्वशासी जिलाा निर्वाचन क्षेत्रों से कुल 50 उम्मीदवार मैदान में हैं. इनमें 3 महिलाएं, 19 निर्दलीय और अन्य सात उम्मीदवाराें की किस्मत दांव लगी हैं. कुल 69,10,592 वोटरों में 35,54,460 पुरुष, 33,55,952 महिलाएं और 180 थर्ड जेंडर हैं.



2014 लोकसभा चुनावों के आंकड़े
2014 लोकसभा चुनाव में असम से बीजेपी ने 7 सीटें जीतकर पहला स्थान हासिल किया था. बीजेपी को 36.51 फीसदी वोट हासिल हुए थे. औसतन 6.89 फीसदी मतों के अंतर से पार्टी जीती थी.

कांग्रेस को तीन सीटों पर जीत मिली थी और उसका वोट शेयर 29.61 फीसदी था. तीन सीटें जीतकर 14.83 फीसदी वोट शेयर के साथ एआईयूडीएफ तीसरे स्थान पर रही थी. 2014 में सभी पांच निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान फीसदी 75 से ऊपर रहा था.

इससे पहले 2009 में कांग्रेस ने सात सीटों पर जीत दर्ज़ कर 18.68 फीसदी मतों के अंतर से पहला स्थान हासिल किया था. चार सीट जीतकर बीजेपी दूसरे स्थान पर रही थी.

2011 जनगणना के मुताबिक असम के करीमगंज में करीब 60 फीसदी मुस्लिम आबादी है. करीमगंज अनुसूचित जाति के सदस्यों के लिए भी आरक्षित सीट है. यहां एआईयूडीएफ के राधेश्याम बिस्वास का मुकाबला बीजेपी के कृपानाथ मल्लाह और कांग्रेस के स्वरूप दास से है. 2014 लोकसभा चुनावों में बिस्वास ने इस बंगाली बहुुल सीट से जीत दर्ज़ की थी.

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हिंदू बहुल सिलचर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र

सिलचर लोकसभा क्षेत्र में 60 फीसदी हिंदू और 37 फीसदी मुस्लिम आबादी है. सिलचर से मौजूदा सांसद और कांग्रेस नेता सुष्मिता देब दोबारा चुनाव लड़ेंगी. इस बार उनका मुकाबला बीजेपी के राजदीप रॉय बंगाली से है.

20 साल से नगांव लोकसभा संसदीय क्षेत्र बीजेपी के कब्ज़े में है. इस बार बीजेपी के रूपक शर्मा का मुकाबला कांग्रेस के प्रद्युत बोरदोलोई से है. मंगलदोई एक और निर्वाचन क्षेत्र है, जहां बीजेपी 2004 से जीतती आ रही है. इस बार उसकी सहयोगी एजीपी से दिलीप साइकिया यहां मैदान में हैं. साइकिया का मुकाबला कांग्रेस प्रत्याशी भुवनेश्वर कलिता से है. तीन बार के सांसद और कांग्रेस नेता बीरेन सिंह एक बार फिर स्वशासी जिला सीट पर जीत बरकरार रखने की कोशिश करेंगे. 2014 में भी उन्होंने यहां से जीत दर्ज़ की थी. इस बार उनका मुकाबला बीजेपी के हरेनसिंह बे से है.

बीजेपी और कांग्रेस के अलावा असम गण परिषद भी मैदान में है. हालांकि, इस हफ्ते पार्टी को बड़ा झटका लगा है. 15 अप्रैल को जागीरोड से पूर्व विधायक बाबुल दास ने एजीपी-बीजेपी गठबंधन के विरोध में पार्टी छोड़ कांग्रेस का दामन थाम लिया. बाबुल दास ने नागरिकता संशोधन विधेयक का पुरजोर विरोध किया है.

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नागरिकता संशोधन विधेयक

विधेयक के प्रावधानों के मुताबिक अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए  हिंदू, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी अवैध अप्रवासी नागरिक भारतीय नागरिकता के योग्य होंगे. बीजेपी इस विधेयक का इस्तेमाल कर एक बार फिर सत्ता में वापसी के लिए यहां के नागरिकों से वोट मांगेगी. वहीं, विपक्षी कांग्रेस और एआईयूडीएफ का आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया ने अल्पसंख्यकों में डर का माहौल पैदा किया है.

बीजेपी की सहयोगी एजीपी ने नागरिकता संशोधन विधेयक का शुरू से ही विरोध किया. उसकी मांग है की सभी गैरकानूनी अप्रवासी चाहे वो किसी भी धर्म से क्यों ना हों, उन्हें राज्य से निकाला जाए. 2016 के असम विधानसभा चुनावों से पहले बीजेपी ने अपने चुनाव प्रचार में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के निर्वासन को मुद्दा बनाया था. इसके लिए उसे विपक्ष की काफी आलोचना का सामना करना पड़ा था.

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नागरिता संशोधन विधेयक और एनआरसी की शर्तों में विरोधाभास

असम में नागरिता संशोधन विधेयक की शर्तों और एनआरसी की शर्तों में विरोधाभास है. 1985 की असम संधि के प्रावधानों के मुताबिक जो भी ये साबित कर पाएगा कि वो या उसके परिवारवाले 24 मार्च, 1971 से पहले भारत आए वही देश के नागरिक कहलाएंगे. ये तारीख बांग्लादेश युद्ध की घटना को चिह्नित करती है. संधि के मुताबिक जो इस दायरे में नहीं आने वाले हर धर्म के अप्रवासी काे निर्वासित किया जाएगा.

8 जनवरी को नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होते ही उत्तर-पूर्व के राज्यों में विरोध शुरू हो गया और एजीपी के अलावा सभी क्षेत्रीय पार्टियों ने इस मामले में बीजेपी से दूरी बना ली. फरवरी में जब यह बिल राज्यसभा में पेश हुआ तो गिर गया.

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