बड़े सहयोगी छोड़ रहे हैं साथ, फिर भी इन वजहों से BJP को नहीं है टेंशन

किसी भी चिंता में नहीं दिख रही बीजेपी.
किसी भी चिंता में नहीं दिख रही बीजेपी.

2014 में जहां बीजेपी (BJP) ने आम चुनाव में 336 सीटें जीती थीं, तो वहीं 2019 में 15 दलों के साथ छोड़ देने के बाद भी उसे 352 सीटें मिली थीं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 5, 2020, 8:31 AM IST
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नई दिल्‍ली. नेशनल डेमोक्रेटिक एलाएंस यानी NDA से पिछले कुछ दिनों में कई बड़े सहयोगी साथ छोड़कर जा चुके हैं. पंजाब में शिरोमणि अकाली दल (Shiromani Akali dal) ने बीजेपी का साथ किसानों के मुद्दों पर छोड़ दिया. उससे पहले महाराष्‍ट्र में शिवसेना (Shiv Sena) भी बीजेपी का साथ छोड़कर एनडीए से अलग हो चुकी थी. अब बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले दिवंगत नेता रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी भी एनडीए से अलग हो गई. ऐसे में बीजेपी को तीन बड़े सहयोगियों से झटका मिला है. लेकिन इसे बावजूद बीजेपी किसी भी प्रकार की टेंशन में नहीं दिखती. उल्‍टा बीजेपी के अंदर आत्‍मविश्‍वास दिखाई दे रहा है. इसके पीछे भी कुछ अहम कारण है.

अगर बात की जाए चुनावी समीकरणों की तो बीजेपी इस मामले में बेहद मजबूत पार्टी है. 2014 और 2019 के बीच करीब 15 दलों ने बीजेपी का साथ छोड़ा था. इसेक बावजूद बीजेपी ने 2019 के चुनाव में पहले से अच्‍छा प्रदर्शन किया था. 2014 में जहां बीजेपी ने आम चुनाव में 336 सीटें जीती थीं, तो वहीं 2019 में 15 दलों के साथ छोड़ देने के बाद भी उसे 352 सीटें मिली थीं. यह पहले के मुकाबले बेहद अच्‍छा प्रदर्शन था.

2014 से 2019 के बीच जिन 15 दलों ने बीजेपी का साथ छोड़ा उनके हिस्‍से में 22 सीटें थीं. अब 2019 के बाद शिवसेना एनडीए से अलग हुई तो एनडीए के खाते की लोकसभा सीटें थोड़ी कम हुई हैं. शिवसेना ने 18 सीटें जीती थीं. अब अगले लोकसभा चुनाव में करीब तीन साल का समय बचा है. बड़े सहयोगियों के साथ छोड़ देने के बाद भी एनडीए की स्थिति बेहतर है.

एक मीडिया रिपोर्ट में राजनीतिक विश्‍लेषकों ने कहा है कि बीजेपी के पास सामाजिक तौर पर गठबंधन बनाने की क्षमता है. 2014 क बाद से ही बीजेपी को गैर सवर्ण जातियों का भारी समर्थन मिला है. इसके साथ ही दलित वर्ग और जनजातियों के वोट भी बीजेपी की ओर गिरे हैं. बीजेपी को ओबीसी समाज का भी बड़ा समर्थन मिला है. ऐसे में यही कारण हैं कि बीजेपी का आत्‍मविश्‍वास कायम है.
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