OPINION: BJP वो सब कर रही है जो अभी विपक्ष को करना चाहिए

सदस्यता अभियान से लेकर जनआंदोलन तक विपक्ष कुछ करे इससे पहले ही नरेंद्र मोदी और अमित शाह बढ़त बनाते जा रहे हैं.

News18Hindi
Updated: July 8, 2019, 6:17 PM IST
OPINION: BJP वो सब कर रही है जो अभी विपक्ष को करना चाहिए
कांग्रेस नेता राहुल गांधी से हाथ मिलाते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी. (फाइल फोटो)
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Updated: July 8, 2019, 6:17 PM IST
स्मिता मिश्रा

केंद्र में इस कार्यकाल का पहला बजट पेश होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगले ही दिन काशी से भाजपा के ताजा सदस्यता अभियान की शुरुआत भी कर दी है. अभियान के मुखिया शिवराज सिंह चौहान हैं, जो पहले ही बैठक करके इस चरण की बारीकियों का ब्यौरा दे चुके हैं. मोदी की तरह पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता देश के कोने-कोने में कार्यक्रमों के माध्यम से अभियान में जुट गए हैं. उधर दूसरी तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से अपने इस्तीफे को सार्वजनिक करते हुए पार्टी को नया अध्यक्ष चुन लेने की ताकीद कर चुके हैं. उनके इस ऐलान के बाद कांग्रेस में नेतृत्व का मामला साफ होने के बजाय और ज्यादा उलझ गया है.
पूरे देश में भाजपा की कुल सदस्य संख्या ग्यारह करोड़ हैं. पार्टी का दावा है कि सदस्यों के लिहाज से वह दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल है. यह पार्टी कुछ ही हफ्तों पहले 300 का आंकड़ा पार करके लगातार दूसरी बार केंद्र में जीत हासिल करने वाली पहली गैर कांग्रेसी पार्टी बन गई है. पार्टी 15 राज्यों में अकेले या सहयोगी दलों के साथ मिलकर सरकार में है. ऐसे में कहा जा सकता है कि इस पड़ाव पर भाजपा को किसी सघन सदस्यता अभियान की बहुत दरकार नहीं. लेकिन अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी के विस्तार और वर्चस्व की भूख बरकरार है.

कांग्रेस सहित समूचा विपक्ष जूझ रहा ‘संकट’ से

अगर देश के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें तो सबसे बड़ा विपक्षी दल कांग्रेस 17 राज्यों में अपना खाता नहीं खोल पाया. वास्तव में अभी एक सघन, आक्रामक और लंबे सदस्यता अभियान की जरूरत कांग्रेस को थी. कमोबेश यही हालात समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और वामदलों की भी है लेकिन इन पार्टियों में भी किसी नई योजना की कोई सुगबुगाहट सुनने को नहीं मिली है. जहां कांग्रेस अब तक के सबसे विकराल राजनीतिक संकट से जूझ रही है, वहीं सपा, बसपा, राजद जैसे दूसरे क्षेत्रीय दल भी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं.

सपा और राजद का युवा नेतृत्व छोड़ रहा ‘मौके’
कांग्रेस की ही तरह इनमें से भी किसी पार्टी की ओर से व्यापक जनसंपर्क स्थापित करने या संगठन को नई चुनौतियों के लिए तैयार करने का कोई संकेत अब तक नहीं मिला है. इनमें दो बड़े दल, सपा और राजद के युवा प्रमुखों को लेकर तो कई सवाल भी तैर रहे हैं. यही समय था जब पार्टी की गर्त में जा चुकी छवि को दोबारा बहाल करने के लिए अखिलेश यादव कमर कसकर संसद में सरकार को घेर सकते थे. वहीं तेजस्वी यादव के लिए बिहार में चमकी बुखार से मासूमों की मृत्यु के मामले पर जबरदस्त विरोध करने का भी यही उपयुक्त समय था. ऐसा करके वह जनता की नजर में उठ सकते थे और जीत-हार से परे बिहार के भविष्य को लेकर अपनी प्रतिबद्धता भी दिखा सकते थे.
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माया और ममता की ही सुनाई दे रही आवाज
चुनाव नतीजों के बाद अगर कुछ आव़ाज सुनाई दी तो बसपा प्रमुख मायावती की. हालांकि उनका ध्यान भी सरकार की नीतियों से ज्यादा अखिलेश को कटघरे में खड़ा करने पर रहा है. इन दोनों दलों ने आगामी उपचुनाव अलग लड़ने की बात कहकर विपक्षी एकता की रही-सही संभावना तो पहले ही खत्म कर दी है.
ऐसे में अगर विपक्ष की भूमिका में कोई दल वाकई सक्रिय है तो वह है तृणमूल कांग्रेस के नेता और उनकी मुखिया ममता बनर्जी. वैसे बनर्जी की चिंता इस समय केंद्र में अपना सिक्का जमाना नहीं बल्कि मोदी से लोहा लेने की है और साथ ये संदेश देकर प्रदेश में अपनी तेजी से खिसकती जमीन को बचाने की है.

कर्नाटक में सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान विपक्षी नेता. (फाइल फोटो)


अध्यक्ष चुनने में बीजेपी और कांग्रेस में दिख रहा साफ अंतर
अगर नेतृत्व के ही सवाल को लें तो भाजपा में अमित शाह के गृहमंत्री बनते ही पार्टी के संसदीय बोर्ड ने कुछ देर की बैठक में ही वरिष्ठ नेता और महामंत्री जेपी नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी दे दी. सदस्यता अभियान के बाद भाजपा विधिवत रूप से संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया शुरू करेगी ताकि अमित शाह का उत्तराधिकारी चुना जा सके. उधर, कांग्रेस में राहुल गांधी के ऐलान के बाद भी कोई उनका इस्तीफा मानने को तैयार नहीं. दर्जनों नेता उन्हें इस्तीफा वापस लेने का आग्रह दोहरा चुके हैं. नया अध्यक्ष बना तो, वह भी चुनना आसान नहीं होगा, इसके आसार साफ नज़र आ रहे हैं.

स्वच्छता की तरह शुरू हुआ एक और अभियान
इसी बीच एक और दिलचस्प बात हुई. नरेंद्र मोदी ने कुछ महीनों के अंतराल के बाद दोबारा शुरू हुए मन की बात कार्यक्रम में पानी बचाने और जल संचयन के अभियान को देश भर में अपनाने का आह्वान किया है. उनका मानना है कि कुछ सरकारी या गैर सरकारी संगठनों की पहल के बजाय इसे स्वच्छता अभियान की तरह ही एक देशव्यापी मुहिम में बदल दिया जाए. इसके सकारात्मक संकेत मिलने शुरू भी हो गए हैं. अगर यह आंशिक रूप से भी सफल हुआ तो यह देश भर में जनभागीदारी की जबरदस्त मिसाल बन जाएगी. ऐसे कार्यक्रम राजनीतिक उठा-पटक से परे, राजनीतिक दलों को जनता से जुड़ने का मौका देते हैं, जिससे उनकी नींव मजबूत हो सके.

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अलग-अलग रैलियों में प्रचार के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी. (फाइल फोटो)


ऊपर दिए गए तमाम मुद्दे, चाहे वह नई सदस्यता का मामला हो या नेतृत्व तय करने का या जनता से जुड़े सरोकारों में भागीदार होने का, इन सबमें इस वक्त पहल करने का जरूरत थी तो वह विपक्षी दलों को, जो अपने पुराने ब्रांड की राजनीति में पिट गए हैं. मगर विडंबना यह है कि ये सारी पहल उस दल के नेता कर रहे हैं जो अभी-अभी एक जबरदस्त जनादेश लेकर लौटे हैं.

भाजपा नेतृत्व की ‘अतिसक्रियता’ या विपक्ष का ‘दिवालियापन’
यह भाजपा नेतृत्व की कभी आराम न करने वाली अतिसक्रियता है या विपक्षी दलों का दिवालियापन? जवाब जो भी हो, विपक्ष के नेता अगर इसे केवल सरकार का हनीमून समझ बैठे हैं तो उनकी नींद खुलते-खुलते हो सकता है, बहुत देर हो जाए.

(लेखक प्रसार भारती की सलाहकार हैं यह उनके निजी विचार हैं)
First published: July 8, 2019, 6:08 PM IST
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