17वीं लोकसभा के लिए प्रोटेम स्पीकर चुने गए 6 बार से BJP सांसद वीरेंद्र कुमार

डॉक्टर वीरेंद्र कुमार, प्रोटेम स्पीकर (फाइल फोटो)

प्रोटेम स्पीकर, चुनाव के बाद पहले सत्र में स्थायी अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के चुने जाने तक संसद का कामकाज स्पीकर के तौर पर चलाता है.

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    17वीं लोकसभा के लिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद डॉ. वीरेंद्र कुमार को प्रोटेम स्पीकर चुना गया है. इससे पहले लोकसभा के प्रोटेम स्पीकर के लिए बरेली से सांसद संतोष गंगवार और सुल्तानपुर से सांसद मेनका गांधी के नाम सामने आए थे. हालांकि बीजेपी नेतृत्व ने दोनों नाम खारिज कर दिए थे.

    बचपन से ही आरएसएस से जुड़े वीरेंद्र कुमार मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ से छह बार से लोकसभा सदस्य और भाजपा का दलित चेहरा हैं. वीरेंद्र कुमार अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं और अक्सर शहर में कहीं भी आने जाने के लिए लिफ्ट लेते देखे जाते हैं.

    उनके करीबी सहयोगी ने बताया था, 'जब वीरेंद्र दिल्ली आते हैं, तो वह किसी भी आम आदमी की तरह स्टेशन पर उतरते हैं और अपने घर तक पहुंचने के लिए ऑटो-रिक्शा लेते हैं.'

    कौन हैं वीरेंद्र कुमार
    27 फरवरी, 1954 को जन्मे वीरेंद्र कुमार 1996 में सागर से 11वीं लोकसभा में पहली बार सांसद बने. तब से उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा और 2004 तक सागर से जीते. परिसीमन के बाद उन्होंने 2009 और 2014 में टीकमगढ़ लोकसभा सीट से चुनाव जीता.

    छह चुनाव सिर्फ तीन साल के अंतराल में हुए थे 1996, 1998 और 1999. प्रतिष्ठित डॉ. हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से  अर्थशास्त्र में एमए और चाइल्ड लेबर में पीएचडी वीरेंद्र कुमार ने अपना करियर आरएसएस कार्यकर्ता के रूप में शुरू किया था. उन्होंने 1975 में लोकनायक  जय प्रकाश नारायण द्वारा शुरू किए गए आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था.

    क्यों नियुक्त किया जाता है प्रोटेम स्पीकर?
    प्रोटेम स्पीकर, चुनाव के बाद पहले सत्र में स्थायी अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के चुने जाने तक संसद का कामकाज स्पीकर के तौर पर चलाता है यानी संसद का संचालन करता है. सीधे कहें तो यह कामचलाऊ और अस्थायी स्पीकर होता है. बेहद कम वक्त के लिए इन्हें चुना जाता है.

    अभी तक ज्यादातर मामलों में परंपरा रही है कि सदन के वरिष्ठतम सदस्यों में से किसी को यह जिम्मेदारी दी जाती है. प्रोटेम स्पीकर तभी तक अपने पद पर रहते हैं जब तक स्थायी अध्यक्ष का चयन न हो जाए.

    हालांकि केवल चुनावों के बाद ही प्रोटेम स्पीकर की जरूरत नहीं होती बल्कि उस हर परिस्थिति में प्रोटेम स्पीकर की जरूरत पड़ती है जब संसद में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद एक साथ खाली हो. यह उनकी मृत्यु की स्थिति के अलावा दोनों के एक साथ इस्तीफा देने की परिस्थितियों में हो सकता है.

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