क्यों खुद को अलग मानते हैं बोहरा मुस्लिम!

खुद को प्रोग्रेसिव मानने वाले बोहरा मुस्लिम संप्रदाय में कई कुप्रथाएं हैं

फर्स्टपोस्ट.कॉम
Updated: December 12, 2017, 2:06 PM IST
क्यों खुद को अलग मानते हैं बोहरा मुस्लिम!
प्रतीकात्मक
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Updated: December 12, 2017, 2:06 PM IST
मुस्लिमों को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा जाता है. मगर शिया और सुन्नियों के अलावा इस्लाम को मानने वाले लोग 72 फिरकों में बंटे हुए हैं. इन्हीं में से एक हैं बोहरा मुस्लिम. बोहरा शिया और सुन्नी दोनों होते हैं. सुन्नी बोहरा हनफी इस्लामिक कानून को मानते हैं. वहीं दाउदी बोहरा मान्यताओं में शियाओं के करीब होते हैं. गुजरात और महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा पाए जाने वाले दाउदी बोहरा 21 इमामों को मानते हैं.

आमतौर पर पढ़े-लिखे माने जाने वाले बोहरा समुदाय की भारत में लाखों की आबादी है. ये खुद को कई मामलों में बाकी मुस्लिमों से अलग मानते हैं. 2002 के बाद मुस्लिम समुदाय की बीजेपी और खासकर नरेंद्र मोदी से दूरी काफी बढ़ गई थी, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों में बोहरा समुदाय ने नरेंद्र मोदी को खुला समर्थन दिया था.

कम्युनिटी और व्यापार
बोहरा समुदाय की दो सबसे प्रमुख पहचान है. एक तो अधिकतर बोहरा व्यापारी हैं. इसके अलावा उनके अंदर समुदाय की भावना बहुत ज्यादा होती है. बोहरा समुदाय का प्रमुख सैयदना कहलाते हैं. बोहराओं में सैयदना का प्रभाव बहुत ज्यादा होता है. बोहराओं के मोदी के समर्थन में आने के पीछे दो बड़ी वजह थीं. एक व्यापारियों की सुविधा के हिसाब से बनीं नीतियां. दूसरा नरेंद्र मोदी का बार-बार सैयदना से मिलना. हालांकि ये भी बड़ा तथ्य है कि 2002 के दंगों में कई बोहराओं के घर और दुकानें भी निशाना बनी थीं.

2014 में बोहरा धर्मगुरू की शवयात्रा में मुंबई में जमा समुदाय

गुजरात का दाहोद, राजकोट और जामनगर बोहराओं का इलाका माना जाता है. इसके साथ ही मुंबई का भेंडी बाजार स्थानीय भाषा में बोहरा मोहल्ला कहा जाता है. याद दिला दें कि मुंबई का मशहूर चोर बाज़ार दरअसल इसी भेंडी बाजार का हिस्सा है, जिसके लिए कहा जाता है कि अंग्रेज इस जगह को बिहाइंड द बाज़ार कहते थे. मतलब जो बाजार में न मिले वो यहां मिलता था. बोहरा व्यापारियों की भरमार वाला बिहाइंड द बाज़ार वक्त के साथ भेंडी बाज़ार हो गया.

कई कुप्रथाओं से भी जुड़ा है बोहरा समुदाय
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मुस्लिम महिलाओं को लेकर तीन तलाक का जिक्र बार-बार होता है. बोहरा मुस्लिमों में महिलाओं के खतने की एक ऐसी प्रथा है, जिस पर खुद ये समाज दो तबकों में बंटा हुआ है. खुद बोहरा महिलाओं का एक बड़ा तबका इसे अमानवीय कहता है. इस साल अगस्त में बोहरा समुदाय की मासूमा रनाल्वी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत लिखकर इस प्रथा को रोकने की बात की थी.

फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन को इस समुदाय में 'खफ्ज़' भी कहा जाता है. इसमें लड़कियों के सात साल का होने पर उनकी क्लिटोरिस को काट दिया जाता है. मान्यता है कि इससे लड़कियों की यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रहता है. ये प्रथा महिलाओं के लिए काफी कष्टदायक है.

बोहरा समुदाय में कई महिलाएं इस प्रथा के विरोध में हैं, तो कई जगह इसे रवायत के तौर पर भी फॉलो किया जाता है. ऐसी दशा में सिर्फ नाममात्र का कट लगा दिया जाता है.

2011 की जनगणना के अनुसार गुजरात में कुल 9.64 प्रतिशत मुस्लिम वोट है. इनमें से लगभग एक प्रतिशत दाउदी बोहरा हैं. ज्यादातर बोहरा शासन करने वाली पार्टी के समर्थन में ही रहते हैं. इसलिए ये लंबे समय से बीजेपी के सपोर्टर हैं. वोट का ये प्रतिशत जीत-हार में निर्णायक अंतर पैदा नहीं करता है, मगर जब प्रतीकों की सियासत होती है तब इस तरह के समुदाय काफी मददगार होते हैं.

(फ़र्स्टपोस्ट के लिए अनिमेष मुखर्जी का आलेख)
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