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दो लोग, दो नजरिये- मुंबई दंगों का पीड़ित और बाबरी मस्जिद गिराने वाला वीएचपी कार्यकर्ता

प्रतीकात्मक फोटो

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स्वतंत्र भारत की राजनीति को पूरी तरह से बदलकर रख देने वाली घटना के दो अलहदा चेहरे

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    देबायन रॉय और सुहास मुंशी

    स्वतंत्र भारत की राजनीति के बारे में एक अलहदा समझ विकसित करने में बाबरी मस्जिद के विध्‍वंस का खास योगदान है. इस घटना ने देश की राजनीति की परिभाषा और मुहावरा बदल दिया.

    बाबरी मस्जिद का विध्‍वंस भारतीय राजनीति के अहम पड़ावों में से एक है.

    यहां तक कि घटना के 25 साल बीतने के बाद भी समाज के विभिन्न वर्गों के बीच इस लेकर अलग तरह की प्रतिक्रियाएं मिलती रही हैं. कोई इसे शौर्य दिवस के रूप में मनाता हैं तो किसी के लिए यह काला दिन है.

    इतनी बड़ी घटना को आंकने के लिए, 6 दिसंबर, 1992 से पहले और उसके बाद क्या हुआ, जैसे तरीके नहीं अपनाए जा सकते हैं. यही कारण है कि हमने इस दिन के महत्व को समझने के लिए दो अलग-अलग नजरियों को जानने का फैसला किया.

    ये वे दो व्यक्ति हैं, जिनकी जिंदगियों पर इस घटना का अलग-अलग तरीके से बड़ा असर हुआ.

    वीएचपी के शरद शर्मा उस भीड़ का हिस्सा थे जिन्होंने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया था. वह उस अराजकता को याद करते हैं, जब वे 13 साल के हुआ करते थे, और सबकुछ उन्होंने अपनी आंखों के सामने देखा.

    शर्मा की आंखों के सामने उनके साथियों ने सदियों पुरानी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया था. अयोध्या और फैजाबाद से हजारों किलोमीटर दूर बैठी भीड़ ने अलग-अलग शहरों में दंगों के रूप में अपनी प्रतिक्रिया दी थी. सबसे ज्यादा प्रभावित शहरों में से एक थी मुंबई, यहां दंगों में हजारों लोग मारे गए.

    मुंबई निवासी बुरहान पार्कर ने  न्यूज़ 18 से बातचीत के दौरान बताया कि किस तरह से उसने अपने ही परिवार के दो लड़कों की लाशें देखीं, जो कि हाथठेले में डालकर घर लाई गईं.

    ताहिर वागले की कहानी इस त्रासदी का वो  काला हिस्‍सा है जिसमें  आज तक उम्‍मीदोंं की  रोशनी नहींं पहुंंची है.

    यह कहानी ऐसे पिता की है जिसका बेटा सांप्रदायिक हिंसा की बलि चढ़ गया, उसे परिवारवालों के सामने ही पीटकर मार डाला गया. वो भी किसी उन्मादी भीड़ ने नहीं, बल्कि स्थानीय पुलिस ने ये सब किया. इंसाफ के लिए पिछले 25 सालों से लड़ रहे उसके पिता अब पूरी तरह से टूट चुके हैं.

    अनगिनत जिंदगियों पर असर डालने वाली इस घटना के बारे में तमाम तथ्य पूरी तरह से कभी नहीं जुटाए जा सकते लेकिन ये दो अलग-अलग नजरिए शायद इस दिल दहलाने वाली घटना की कहानी कहने में थोड़ी मदद करें जो 25 साल पहले घटी.

    ताहिर वागले -  आज भी है इंसाफ का इंतजार 

    "मेरा केस नंबर 527 है. यह सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा है. मैं अपनी ओर से किसी को अधिकृत करने के लिए तैयार हूं, कृपया मेरे मामले को वापस ले लें. मैं न्याय के लिए दौड़ते-दौड़ते एकदम थक गया हूं. अब 25 साल बीत चुके हैं, "ताहिर वागले कहते हैं.

    जनवरी 10, 1993 को स्थानीय पुलिस ने 17 साल के उसके बेटे शाहनवाज वागले को गोलियों से भून दिया था. यह घटना बाबरी मस्जिद विध्वंस से जुड़ी हुई है.

    मुंबई से 1,570 किलोमीटर दूर बसे अयोध्या में बाबरी मस्जिद के गिरने से सपनों के शहर में भूचाल आ गया. विरोध और दंगों के साथ-साथ 1993 में हुआ बम विस्फोट इसी का परिणाम है. राज्य की कानूनी व्यवस्था की कमजोरी के कारण हिंसा हर रूप में दिखाई दे रही थी, चाहे वो विरोध हो या फिर दंगे.

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    "मैं इस दरम्यान में अदालतों, सरकारी दफ्तरों और पुलिस स्टेशनों के चक्कर लगाता रहा हूं. पिछले साल मेरे साथ घटी एक दुर्घटना ने मुझे शरीर से भी लाचार कर दिया है."

    उन्‍हें अभी भी वो दिन एकदम ठीक से याद है जब उसके बेटे को सीढियों से घसीटते हुए पुलिस ने गोलियों से भून दिया और लहुलुहान शरीर को गाड़ी मे फेंक दिया था. अगले दिन वो मर गया.

    "पुलिस ने हमारे इलाके में कर्फ्यू घोषित किया था और 10 जनवरी को 10 बजे पुलिस एक ऑपरेशन के तहत हमारे घर आई थी. मैं रत्नागिरी में था, तब मेरी पत्नी ने जल्दी से मुख्य दरवाजा बंद कर दिया था लेकिन पुलिस ने दरवाजा तोड़ दिया. उन्होंने किसी पर भी रहम नहीं किया और सबको पीटने लगे. जल्दी ही उन्होंने मेरे बेटे शाहनवाज़ को पकड़ लिया, "वागले ने बताया.

    शाहनवाज तब कॉलेज में विज्ञान पढ़ रहे थे और नौसेना में जाना चाहते थे. वागले की पत्नी अख्तर ने बताया "पुलिस ने मेरे बेटे से कहा कि हम तुम्हें बताएंगे कि विज्ञान पढ़ना क्या होता है."

    वह नीचे खींच लिया गया था और कनपटी पर बंदूक सटाकर गोली मार दी गई. शाहनवाज की बहन ने अपने भाई की मौत अपनी आंखों के सामने देखी. वे रोती हुई कहती हैं, "उन्होंने मेरे भाई को गोली मार दी. उसे घसीटा गया और तबह तक पीटा गया, जब तक खून न बहने लगे और फिर गोली मार दी गई.”

    "यहां तक कि जे जे अस्पताल ले जाने के लिए रास्ता भी लंबा चुना गया, जिससे काफी खून बह गया. मुझे बाद में बताया गया कि वो लगातार मेरे और अपनी मां के बारे में पूछ रहा था. जब मैं रत्नागिरि से लौटा तो मुझे बताया गया कि शहनावाज़ को गोली मार दी गई और उसकी लाश जेजे अस्पताल में रखी गई थी", वागले बताते हैं.

    श्रीकृष्ण समिति के पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज, जस्टिस बीएस श्रीकृष्ण की अध्यक्षता वाली समिति ने शाहनवाज़ की हत्या को कोल्ड ब्लडेड मर्डर करार दिया था.

    "हमें निशाना बनाया गया क्योंकि हम मुसलमान थे. और यह मामला हिंदू और मुस्लिमों के बीच संघर्ष का नहीं, बल्कि पुलिस और मुसलमानों के बीच बन गया था . हमारी लाशों पर पुलिस अपनी पीठ थपथपाते हुए जय महाराष्ट्र का नारा बुलंद कर रही थी, "वागले याद करते हैं.

    शरद शर्मा
    शरद शर्मा 13 वर्ष के थे, जब बजरंग दल के सबसे कमउम्र सदस्य के रूप में उन्होंने अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 की हिंसा को करीब से देखा. "चारों ओर अराजकता मची हुई थी. लोगों को एम्बुलेंस में लाया जा रहा था. सभी घायल थे और हर कोई रो रहा था, "शर्मा कहते हैं.

    वे अब 38 साल के हैं, अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता हैं. अयोध्या में एक कमउम्र बच्चे के तौर पर उन्होंने जो देखा था, उसने कई तरीके से उनकी जिंदगी पर असर डाला है. वो खुद मानते हैं कि उस दिसंबर ने उनकी जिंदगी बदलकर रख दी. उन्होंने तय किया कि वे खुद को अयोध्या औऱ राम मंदिर के मकसद में झोंक देंगे.

    "हमें उस दिन पुलिस ने गिरफ्तार किया था क्योंकि हम बाबरी मस्जिद तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे, हालांकि बाद में उन्होंने कुछ दूरी पर हमें छोड़ दिया. जब हम दोबारा वहां पहंचे तो हमने लाशें देखीं. हमने अगले कई दिन दवाएं, खानाा और दूसरी मदद लोगों तक पहुंचाने में बिताए, शर्मा बताते हैं.

    शर्मा के साथियों द्वारा किए गए बाबरी मस्जिद विध्वंस ने पूरे देश में दंगों को जन्म दिया. वो इस बारे में कैसा महसूस करते हैं? कम से कम वे इस बात पर पछतावा तो नहीं ही महसूस करते हैं. "हां, इसने कुछ ज्यादा ही उग्र रूप ले लिया. सारा देश विरोध में सड़कों पर उतार आया. जमीन हमारी है, हमारे पास एक मंदिर था और फिर भी हम इसके लिए गिड़गिड़ा रहे हैं."

    हजारों सदस्यों, जैसे शर्मा, विभिन्न सांप्रदायिक और चरमपंथी संगठनों से देश के विभिन्न हिस्सों से आए और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया. यह काम वीएचपी के नेतृत्व में हुआ, शर्मा अब जिसके प्रवक्ता हैं. दिलचस्प बात यह है कि वीएचपी ने 9 नवंबर 1989 को अयोध्या में प्रस्तावित राम मंदिर के आधारशिला रखने के लिए दलित लड़के-कामेश्वर चौपाल को चुना. साफ है कि यह राजनीति से प्रेरित था.
    "भगवान राम ने कई सामाजिक दूरियां पाटीं और कई समुदायों को गले लगाया. वे किसी में कोई भेद नहीं करते थे. राम मंदिर की नींव रखने के लिए दलित का चयन स्पष्ट रूप से पूरे देश में एक संकेत भेजता है. जो सदियों से उपेक्षा झेलने के बावजूद धर्म के लिए समर्पित हैं, वे सबसे बड़े भक्त हैं, इसलिए उनमें से एक को नींव रखने के लिए क्यों न आमंत्रित किया जाए? "शर्मा सवाल करते हैं.

    "अंग्रेजों से आजादी पाने का सपना देखने के लिए हमें 100 साल से भी ज्यादा लगे. हमने कोई वक्त नहीं खोया है. कम से कम सब यह जानते हैं कि रामलला अयोध्या से कहीं नहीं जा रहे हैं. हालात अब पहले से बेहतर हैं, "शर्मा कहते हैं.

    और आज के युवाओं के बारे में क्या? क्या वे राम मंदिर के लिए चिंतित हैं? "आज के युवा राम मंदिर के बारे हमसे भी अधिक चिंतित हैं. देखिए कि कैसे वे गाय के बारे में संवेदनशील हो चुके हैं. जब वह गायों को खतरे में देखते हैं तो कितने परेशान हो जाते हैं, "शर्मा कहते हैं.

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