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  • BOOK BY IPS KARNAL SINGH ON BATLA HOUSE ENCOUNTER BATLA HOUSE AN ENCOUNTER THAT SHOOK THE NATION

Batla House encounter में पुलिस ने क्यों नहीं पहनी थी बुलेट प्रूफ जैकेट्स? किताब में IPS ने किया यह दावा

बाटला हाउस एनकाउंटर के दौरान दिल्ली पुलिस. AFP/ Firstpost.com

साल 2008 में हुआ Batla House encounter का जिक्र आज भी कांग्रेस और उन सभी लोगों के लिए सवालों का घेरा बनकर आता है जिन्होंने इस पर वक्त-बे-वक्त सवाल उठाए थे. अब इस एनकाउंट पर IPS अधिकारी करनाल सिंह ने Batla House: An Encounter That Shook The Nation किताब लिखी है.

  • News18Hindi
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    नई दिल्ली. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली हुए बाटला हाउस एनकाउंटर (Batla House encounter) में आतंक निरोधी ऑपरेशन के दौरान पुलिस कर्मियों ने बुलेट प्रूफ जकेट्स क्यों नहीं पहने थे? साल 2008 में हुए इस एनकाउंटर ने बहुत बड़ा राजनीतिक बखेड़ा खड़ा किया जिसकी आंच आज भी जहां तहां कांग्रेस और हाईकमान को परेशान करती रहती है. अब इस पर दिल्ली पुलिस के सेवानिवृत्त अधिकारी और इस ऑपरेशन को लीड करने वाले करनाल सिंह (Karnal Singh) ने किताब लिखी है. अपनी किताब Batla House: An Encounter That Shook The Nation में सिंह ने कई सवालों के जवाब देने की कोशिश की है. साल 1984 बैच के IPS अधिकारी रहे सिंह बाटला हाउस एनकाउंटर के समय स्पेशल सेल के जॉइंट कमिश्नर थे. अपनी किताब में एल-18 बाटला हाउस के फ्लैट नंबर 108 में क्या हुआ था और क्यों शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा और उनकी टीम ने बुलेट प्रूफ जैकेट्स नहीं पहन रखे थे?

    अपनी किताब में सिंह ने दावा किया है कि उनकी टीम मुठभेड़ से एक दिन पहले यह जानकारी इकट्ठा करने में कामयाब रही कि एक नंबर जिसका इस्तेमाल आतंकवादी मोहम्मद आतिफ अमीन ने किया था उसका इस्तेमाल जयपुर में विस्फोट (13 मई, 2008) और अहमदाबाद (26 जुलाई, 2008) और 13 सितंबर, 2008 को दिल्ली के करोल बाग, कनॉट प्लेस और ग्रेटर कैलाश में हुए सिलसिलेवार विस्फोट में शामिल था.

    रेड मारने के फैसले पर एकमत नहीं थी टीम
    शाम तक यह कंफर्म होने के बाद कि आतिफ अमीन पर शक किया जाना लाजिमी है, करनाल सिंह ने टीम को उसे जिन्दा पकड़ने का आदेश दिया. 18 सितंबर की शाम को, एक छोटी सी टीम को बटला हाउस इलाके के बारे में जानने के लिए भेजा गया.

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    सिंह ने लिखा है कि - 'आतिफ जहां ठहरा था यानी बाटला हाउस के एल -18 पर रेड मारने के फैसले में टीम एकमत नहीं थी.जरूरी सवाल यह था आखिर कब? यह रमज़ान का महीना था और इसलिए, शाम या रात में तलाशी लेना उचित नहीं था. मोहन ने सलाह दी कि हमें दिन के समय बाटला हाउस पर सर्च करना चाहिए क्योंकि इसी समय वे घर पर आराम करेंगे.'

    बनाई गईं दो टीमें
    19 सितंबर के लिए दो टीमें बनाई गईं. इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा 18 सदस्यीय टीम लीड कर रहे थे जबकि डीसीपी संजीव यादव (उस समय एसीपी) ने दूसरी टीम का नेतृत्व किया. सिंह ने लिखा है कि डेंगू के कारण उस दिन शर्मा के बेटे को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन इंस्पेक्टर ने अपनी ड्यूटी पहले लगा दी थी. वह लिखते हैं कि टीम के अधिकांश अधिकारी, जिनमें इंस्पेक्टर राहुल, धर्मेंद्र और अन्य शामिल थे, 19 सितंबर को देर रात या दूसरे राज्यों से अलग-अलग इनपुट पर काम करने के बाद देर रात लौटे थे. उन सभी पर पारिवारिक जिम्मेदारियाँ थीं लेकिन जब ड्यूटी की बात आई तो सब इस ऑपरेशन के लिए तैयार हो गए.'

    लिखा है कि - 'रेड शुरू होने से पहले, 19 सितंबर को लगभग 11 बजे, सिंह को शर्मा का फोन आया और कहा - 'सर, एल -18 के अंदर लोग हैं.हम अंदर जा रहे हैं. लगभग 10 मिनट के बाद, मेरा फोन बज उठा. फोन पर संजीव यादव था. उन्होंने कहा- 'सर, मोहन और हेड कांस्टेबल बलवंत को गोली लगी है और उन्हें अस्पताल ले जाया जा रहा है. आतंकवादी भी घायल हुए हैं लेकिन वे घर के अंदर हैं.'

     सिंह और फिर स्पेशल सेल के डीसीपी आलोक कुमार भी पहुंचे बाटला
    इसी समय खुद सिंह और फिर स्पेशल सेल के डीसीपी आलोक कुमार भी यादव को आतंकवादियों को पकड़ने का निर्देश देते हुए बटला हाउस पहुंचे. सिंह ने इसे अपने करियर के सबसे तनावपूर्ण क्षणों में से एक बताते हुए कहा कि मैं दिल्ली पुलिस के प्रति लोगों के विचार समझ पा रहा था क्योंकि हमारे खिलाफ नारे लगाने वाली भीड़ वहां इकट्ठा हो गई थी.

    फ्लैट पर पहुंचने पर, सिंह ने अपनी टीम को सब कुछ सिलसिलेवार समझाने को कहा. सिंह ने लिखा है कि 'राहुल ने बताया कि मोहन आगे की टीम का नेतृत्व कर रहा थे. मोहन द्वारा धर्मेंद्र को छोड़कर सभी टीम के सदस्यों को सामान्य कपड़ों में ही रहने के लिए कहा. ऐसा इसलिए किया गया ताकि अगर लोग फ्लैट में नहीं भी मिलें तो भी बिना किसी को खबर हुए सभी वहां से वापस लौट सकें. सिंह ने कहा- 'यही वजह थी कि टीम से किसी ने भी बुलेट-प्रूफ जैकेट नहीं पहन रखा था.'

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    आतंकवादियों ने पहली टीम पर अंधाधुंध गोलीबारी की जिसके कारण शर्मा को सामने से दो गोलियां लगी थीं. हेड कांस्टेबल बलवंत को भी गोली लगी थी लेकिन वह बच गए. किताब में लिखा है कि शर्मा की टीम ने गाड़ियों को खलीलुल्लाह मस्जिद के पास पार्क किया था, जिसमें बुलेट-प्रूफ जैकेट समेत AK-47 राइफल थे. शर्मा की टीम केवल छोटे हथियारों के साथ फ्लैट पर गई थी.