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लोकसभा चुनाव 2019: क्या कर्नाटक में JDS से हाथ मिलाकर कांग्रेस ने खोद ली अपनी कब्र?

राहुल गांधी के साथ एचडी कुमारस्वामी (PTI)

राहुल गांधी के साथ एचडी कुमारस्वामी (PTI)

8 सीटों पर जेडीएस किसे चुनावी मैदान में खड़ा करे, ये अब तक तय नहीं कर पाई है. ऐसे में गौड़ा की पार्टी ने कांग्रेस से मदद मांगी है, ताकि कांग्रेस से 'उम्मीदवार उधार' ले सके. जेडीएस ये भी चाहती है कि कांग्रेस का प्रत्याशी जेडीएस के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़े.

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क्या कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर (JDS) सुप्रीमो और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा की राजनीतिक पकड़ धीमी होती जा रही है? दरअसल, राज्य में मौजूदा सियासी खींचतान को देखते हुए ऐसा ही लग रहा है. कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन में हाल ही में लोकसभा सीटों को लेकर बंटवारा हुआ था. राज्य में कुल 28 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें से 20 पर कांग्रेस और 8 सीटों पर जेडीएस चुनाव लड़ रही है. लेकिन, दिक्कत ये है कि जेडीएस को अपने 8 सीटों के लिए उम्मीदवार नहीं मिल रहे हैं.

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कर्नाटक में कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार चलाने वाली जेडीएस ने शुरुआत में 28 लोकसभा सीटों में से 12 सीटों की मांग की थी. विधानसभा में 38 सीटों वाली जेडीएस की इस मांग पर कांग्रेस के कई नेताओं को हैरानी हुई. खासतौर पर जब गौड़ा वंश की पार्टी जेडीएस पुराने मैसूर क्षेत्र में सिर्फ 6 जिलों में सिमट कर रह गई है. इसके बाद जेडीएस ने सीटों का मोलभाव करते हुए 10 सीटों पर भी समझौता करने की बात कही थी. हालांकि, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी आखिर में काफी सोच-विचार के बाद जेडीएस को 8 सीटें देने पर राजी हो गए.

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जेडीएस ने लोकसभा सीटें तो हासिल कर ली, लेकिन अब उसके सामने उम्मीदवारों को लेकर संकट है. इन 8 सीटों पर जेडीएस किसे चुनावी मैदान में खड़ा करे, ये अब तक तय नहीं कर पाई है. 8 में 5 सीटों पर पार्टी के पास न तो कोई उम्मीदवार है और न ही लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए कोई संगठनात्मक ढांचा. उधर, नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख भी नज़दीक है. ऐसे में गौड़ा की पार्टी ने कांग्रेस से मदद मांगी है, ताकि कांग्रेस से 'उम्मीदवार उधार' ले सके. जेडीएस ये भी चाहती है कि कांग्रेस का प्रत्याशी उसके चुनाव चिह्न पर इलेक्शन लड़े.

राज्य में जेडीएस और कांग्रेस के बाद बीजेपी तीन नंबर की पार्टी है. कांग्रेस नहीं चाहती कि जेडीएस की इस दिक्कत का फायदा सीधे बीजेपी को मिले. अगर जेडीएस को अपने कोटे की सीटों के लिए उम्मीदवार नहीं मिले, तो ये सीटें बीजेपी के खाते में तोहफे के रूप में जा सकती है. लिहाजा न चाहते हुए भी कांग्रेस ने जेडीएस के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है.


2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 17, कांग्रेस को 9 और जेडीएस को दो सीटों पर जीत मिली थी. बंगलुरु नॉर्थ, उडुपी-चिकमंगलुर और उत्तर कन्नड़ सीटों पर अभी बीजेपी की पकड़ बन गई है. इसलिए जेडीएस ने तय किया है कि वह इन सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों को अपने (जेडीएस) चुनाव चिह्न पर चुनावी मैदान में उतारेगी.

राज्य के एक सीनियर कांग्रेस नेता नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताते हैं, 'जेडीएस एक लालची और अति-महात्वाकांक्षी पार्टी है. लोकसभा की 8 सीटें लेकर वो अपने आलोचकों को ये बताना चाहती है कि कर्नाटक की राजनीति में सर्वेसर्वा है. अब देखिए 8 सीटें तो मिल गई, मगर वो फिर भी संकट में है. उनके पास इन सीटों पर उतारने के लिए कैंडिडेट्स ही नहीं है. कोई ऑप्शन नहीं होने पर अब जेडीएस उम्मीदवारों के लिए कांग्रेस से मदद मांग रही है.'

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कांग्रेस नेता बीएल शंकर बंगलुरु नॉर्थ सीट पर जेडीएस के उम्मीदवार के तौर पर चुनावी मैदान में उतर सकते हैं. हालांकि, कांग्रेस के स्थानीय नेता इससे सहमत नहीं हैं. शंकर कभी गौड़ा के पसंदीदा रह चुके हैं. उन्होंने जेडीएस के इस प्रस्ताव की पुष्टि की है. वहीं, उडुपी-चिकमंगलुर सीट पर जेडीएस कांग्रेस से पूर्व मंत्री प्रमोद माधवराज को अपने चुनाव चिह्न पर उतारना चाहती है. माधवराज उडुपी सीट पर 2018 का विधानसभा चुनाव काफी कम मार्जिन से हार गए थे.

इसके अलावा उत्तर कन्नड़ सीट पर जेडीएस कांग्रेस उम्मीदवार प्रशांत देशपांडे या निवेदित अल्वा को अपने चुनाव चिह्न पर उतारने की सोच रही है. प्रशांत देशपांडे राजस्व मंत्री आरवी देशपांडे के बेटे हैं. जबकि निवेदित अल्वा सीनियर कांग्रेस नेता मार्ग्रेट अल्वा के बेटे हैं.


वैसे तो बीजापुर और विजयपुरा सीट अनुसूचित जाति के कैंडिडेट्स के लिए रिजर्व रखी गई है, लेकिन जेडीएस को यहां भी अच्छे उम्मीदवार नहीं मिल रहे. इसलिए वो कांग्रेस के भरोसे है. बात करें शिमोगा सीट की, तो जेडीएस यहां पूर्व विधायक मधु बंगरप्पा को ज्वॉइंट कैंडिडेट के तौर पर उतारने की कोशिश में जुटी है. मधु बंगरप्पा हाल में ही लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा के बेटे बीवाई राघवेंद्र से 52,000 वोटों से हार गए थे.

जेडीएस चुनाव चिह्न को लेकर भी जूझ रही है. ओल्ड मैसुरू के बाहर के वोटर्स जेडीएस के मौजूदा चुनाव चिह्न से परिचित नहीं हैं. ऐसे में कांग्रेस को ये भी डर है कि इस वजह से गठबंधन के कैंडिडेट्स को वोट जुटाने में दिक्कत आ सकती है.


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कुछ स्थानीय नेता भी ऐसा मानते हैं कि चुनाव चिह्न रोड़ बन सकता है. कांग्रेस के एक सीनियर नेता कहते हैं, 'पार्टी ने राज्य में बीजेपी को रोकने के लिए ही मजबूरन जेडीएस से गठबंधन किया था. इसके लिए कांग्रेस को बहुत ज्यादा नुकसान भी झेलना पड़ा. ज्यादा सीटें जीतने के बाद भी सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी. आगे भी सरकार चलाने में दिक्कत हो सकती है. लोकसभा की इन तीन सीटों पर तो समझौता हो गया. लेकिन, बाकी 5 सीटों पर बीजेपी की पकड़ मजबूत हो रही है. नामांकन दाखिल होने के पहले ही हम गेम हार गए हैं.'

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