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कभी भिखारी की तरह जिंदगी गुजारने वाला लड़का, कोरोना महामारी के दौरान बना बेसहारों का रक्षक

News18Hindi
Updated: May 24, 2020, 5:28 AM IST
कभी भिखारी की तरह जिंदगी गुजारने वाला लड़का, कोरोना महामारी के दौरान बना बेसहारों का रक्षक
मुरुगन एस कभी कोच्चि की सड़कों पर रहते थे (फोटो साभार: theruvoram.org)

2007 में उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता बनने के लक्ष्य को अपने एनजीओ 'थेरुवरम' (NGO Theruvoram) के जरिये पूरा करने का ठाना. मलयालम में थेरुवरम का अर्थ होता है 'सड़क'.

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कोच्चि. एक बच्चे के तौर पर मुरुगन एस कोच्चि (Kochi) की सड़कों पर रहते थे और अजनबियों से खाना मांगकर खाते थे. उनके पिता शराबी थे और उनकी मां एक मजदूर (Daily Wager), जो मुश्किल से उनके लिये छत या दो समय के खाने का उनके लिए प्रबंध कर पाती थीं. इसलिए उन्होंने अपनी किशोरावस्था के शुरुआती साल कूड़े की टोकरियों से बचा हुआ खाना बीनकर खाने और खाने के लिए ऊलजुलूल काम करने में गुजारे.

फिर एक दिन, पुलिस (Police) ने उसे पकड़ लिया और उसे एक अनाथालय में भेज दिया, जहां उसकी देखभाल कई सालों तक ननों ने की. वहां वह मदर टेरेसा (Mother Teresa) और श्री नारायण गुरु जैसे प्रसिद्ध समाज सुधारकों के कार्यों से परिचित हुआ. फोन पर बात करते हुये 34 साल के शख्स ने कहा, “उनके आदर्शों और शिक्षाओं ने किसी तरह मेरे दिमाग में जड़ जमा ली. लेकिन मुझे नहीं पता था कि इन पर काम कैसे किया जाए.”

आगे चलकर शुरू किया अपना NGO 'थेरुवरम'
अगले सात सालों के लिए, उन्होंने चाइल्डलाइन के साथ एक वॉलन्टियर के रूप में काम किया और ऑटो-रिक्शा खरीदने के लिए पैसे जुटाए. साथ ही उन्होंने अनाथ बच्चों के साथ-साथ बुजुर्ग व्यक्तियों, विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को लेकर लोगों को ट्रैक किया और उन्हें सड़कों से उठाकर आश्रय दिया. 2007 में उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता बनने के लक्ष्य को अपने एनजीओ 'थेरुवरम' (NGO Theruvoram) के जरिये पूरा करने की ठानी. मलयालम में थेरुवरम का अर्थ होता है 'सड़क'.



90% बेघर लोग दूसरे राज्यों से केरल आये हैं


कोविड-19 के समय में, जब बहुसंख्यक भारतीय सामाजिक दूरी (Social Distancing) के पालन के लिए अपने घरों में कैद हैं, मुरुगन और उनकी आठ लोगों की टीम 'थेरुवोरम' में केरल की सड़कों पर रह रहे बेघर और निराश्रित लोगों को उठा कर ला रही है और उन्हें सुरक्षित ठिकाना दे रही है. उन्होंने बताया, ऐसे लोगों में से अधिकांश आश्चर्यजनक रूप से, अन्य राज्यों से हैं जो काम के लिए केरल आए थे. उन्होंने कहा, “लगभग 90 फीसदी लोग दूसरे राज्यों से हैं. वे अक्सर 20 और 40 की उम्र के बीच होते हैं. उनमें से कई शराब और ड्रग्स के आदी हो जाते हैं जो अपना जीवन को बर्बाद कर देते हैं. जल्द ही, वे अपना रास्ता खो देते हैं और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियां उन्हें हो जाती हैं.”

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First published: May 24, 2020, 5:25 AM IST
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