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असम में NDA से अलग हुआ बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट, क्या बीजेपी को होगा नुकसान! जानें समीकरण

 बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के अध्यक्ष हग्रामा मोहिलरी. (तस्वीर-HagramaOnline facebook)

बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के अध्यक्ष हग्रामा मोहिलरी. (तस्वीर-HagramaOnline facebook)

बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (Bodoland People's Front-BPF) ने भले ही शनिवार को अलग होने का फैसला किया हो लेकिन बीजेपी अलगाव की बात पहले ही कर चुकी है. क्या वाकई बीजेपी को इससे कोई घाटा होगा, यह बात तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे लेकिन यह जानना दिलचस्प है कि दोस्ती में रार क्यों आई.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 28, 2021, 5:42 AM IST
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नई दिल्ली. असम में भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी रही बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (Bodoland People's Front-BPF)  ने शनिवार को गठबंधन तोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया. पार्टी के अध्यक्ष हग्रामा मोहिलरी (Hagrama Mohilary) ने कहा- 'हम बीजेपी के साथ दोस्ती और गठबंधन नहीं निभा सकते हैं. शांति, एकता और विकास के साथ राज्य में स्थायी सरकार देने के लिए बीपीएफ ने कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन के साथ जाने का फैसला किया है.' असम की 126 सीटों वाली विधानसभा में बीपीएफ के पास 12 सीटें हैं. ऐन चुनाव के पहले कांग्रेस से हाथ मिलाने को बीजेपी के नुकसान के तौर पर भी देखा जा रहा है. लेकिन क्या वाकई बीजेपी को इससे कोई घाटा होगा, यह बात तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे. लेकिन कुछ बातें ध्यान देने लायक हैं.

दरअसल बीपीएफ और बीजेपी के बीच संबंधों में कड़वाहट बीते साल के अंत में बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल के चुनाव के बाद ही आ गई थी. यह बात खुद उत्तर-पूर्व में बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले असम के वित्त मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने कही थी. हेमंत बिस्व सरमा ने करीब दो हफ्ते पहले ही कह दिया था कि चुनाव में बीपीएफ एनडीए का हिस्सा नहीं होगी. उन्होंने कहा था कि बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल के चुनाव के बाद से ही दोनों पार्टियों के संबंध में खटास आ गई है. यानी बीजेपी पहले ही यह घोषणा कर चुकी थी कि वो बीपीएफ के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ेगी. नफा-नुकसान की गणना पहले ही की जा चुकी है.

बोडोलैंड काउंसिल के चुनाव से बीजेपी ने बीपीएफ को किया बाहर
दरअसल बोडोलैंड मुख्य रूप से चार जिलों के इलाके को कहते हैं. ये जिले हैं कोकराझाड़, बाक्सा, उदलगुड़ी और चिरांग. इन्हीं को मिलाकर बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल बनी है. 2020 के आखिरी में हुए काउंसिल के चुनाव में बीजेपी ने BTC पर 17 वर्षों से काबिज बीपीएफ का वर्चस्व तोड़ दिया था. हालांकि 40 सीटों वाली काउंसिल में सबसे ज्यादा सीटें BPF को ही आई लेकिन सत्ता उसके हाथ से छिन गई. BPF को 17 सीटें मिलीं तो वहीं UPPL को 12, बीजेपी को 9. गण शक्ति पार्टी को 1 सीट मिली. बीजेपी, UPPL और गणशक्ति पार्टी मिलकर बीटीसी की सत्ता पर काबिज हो गए हैं.
एक साल से चल रही थी प्लानिंग!


मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक काउंसिल से BPF को बाहर करने की तैयारी एक साल से चल रही थी. बीजेपी ने रफ्तार के साथ बोडो संधि को क्लीयर किया. बीजेपी ने इसे ऐतिहासिक बताया और कहा कि इससे दशकों से चला आ रहा सशस्त्र संघर्ष समाप्त होगा. ये शांति समझौता प्रमोद बोरो की अगुवाई वाले ऑल इंडिया बोडो स्टूडेंट्स यूनियन और नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के धड़ों के साथ किया गया था. ये जनवरी 2020 की बात है. इस संधि पर हस्ताक्षर के बाद से ही प्रमोद बोरो राज्य में चर्चा में आ गए थे. फिर बीजेपी की तरफ से भी प्रोजेक्ट किया गया कि ये संधि सिर्फ बोरो की वजह से हो पाई है.

प्रमोद बोरो का मिलेगा फायदा
धीरे-धीरे प्रमोद बोरो का प्रभाव बढ़ता गया और फिर उनकी पार्टी UPPL ने चुनाव में 12 सीटों पर बाजी मारी. BPF भले ही सबसे बड़ी पार्टी हो लेकिन अब वह इस क्षेत्र की सत्ता से दूर हो गई है. वहीं बोडोलैंड के इलाके में बीजेपी के पास सहयोगी के तौर पर प्रमोद बोरो जैसा लोकप्रिय चेहरा भी है. इलाके में प्रमोद बोरो के प्रभाव और बीजेपी की स्मार्ट रणनीति का असर चुनाव में दिखाई दे सकता है. काउंसिल चुनाव के नतीजों के बाद से ही माना जा रहा था बीजेपी को विधानसभा चुनाव में भी फायदा मिलेगा.

कांग्रेस के साथ जाकर कितना नुकसान पहुंचाएगी बीपीएफ
अब बीपीएफ ने राज्य में कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन के साथ हाथ मिला लिया है. कांग्रेस राज्य में नागरिकता संशोधन कानून को जोर-शोर से मुद्दा बना रही है. देखना होगा कि कांग्रेस के सहयोग के साथ बीपीएफ बीजेपी को कोई नुकसान पहुंचा पाएंगी या एक बार फिर असम में कमल की सरकार बनेगी.
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