J&K: पंचायत चुनाव से पहले वोटर्स को आतंकियों की धमकी, कहा- साथ लेकर आएं कफन

साल 2011 में करीब चार दशक के बाद जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव हुए थे. साल 2010 में हिंसक विरोध में 130 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी, इसके बावजूद 80 फीसदी से ज़्यादा लोगों ने वोटिंग की.

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Updated: September 12, 2018, 1:15 PM IST
J&K: पंचायत चुनाव से पहले वोटर्स को आतंकियों की धमकी, कहा- साथ लेकर आएं कफन
सांकेतिक तस्वीर
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Updated: September 12, 2018, 1:15 PM IST
(आकाश हसन)

साल 2011 में कुल्लम जिले के हौरा गांव में मोहम्मद इकबाल और एक सरकारी कर्मचारी ने पहली बार जम्मू-कश्मीर के पंचायत चुनावों में भाग लिया था. जमात-ए-इस्लामी के समर्थक इकबाल का कहना है कि उन्होंने चुनाव में अपने दोस्त के लिए वोट डाला था. वहीं 50 साल के इक़बाल का कहना है, ''मैंने हमेशा वोटिंग का बहिष्कार किया है. चुनाव से दूर रहकर हम अपना विरोध जताते हैं. पंचायत चुनावों में मैंने इसलिए वोट डाला था क्योंकि मेरा दोस्त और पड़ोसी चुनाव लड़ रहा था.''

साल 2011 में करीब चार दशक के बाद जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव हुए थे. साल 2010 में हिंसक विरोध में 130 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी, इसके बावजूद 80 फीसदी से ज़्यादा लोगों ने वोटिंग की. चुनाव के बाद 4130 सरपंच और 29719 पंच चुने गए. एक सरपंच वार्ड या गांव के समूह का प्रमुख होता है जबकि एक पंच एक गांव या वार्ड का निर्वाचित सदस्य होता है.

अगले साल फरवरी में हुउरा गांव के सरपंच गुलाम मोहम्मद डार को उनके घर के बाहर संदिग्ध आतंकवादियों ने गोली मार दी थी. 2011 के चुनावों के बाद वो कश्मीर घाटी के पहले निर्वाचित पंचायत सदस्यों में से एक थे.

इसके बाद आने वाले महीनों में ऐसी कई और हत्याएं हुईं. सोलह सरपंच और पंच मारे गए, जबकि हमले में दो दर्जन से ज़्यादा लोग घायल हो गए. पुलिस ने कहा कि इन हमलों के पीछे आतंकवादियों का हाथ है. लेकिन आतंकवादियों ने इन हमलों की ज़िम्मेदारी नहीं ली.

2016 की गर्मियों में कश्मीर में अभूतपूर्व हिंसा देखी गई. 8 जुलाई को हिजबुल मुजाहिद्दीन का कमांडर बुरहान वानी दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में सुरक्षाबलों द्वारा मारा गया.

इसके बाद कश्मीर में सौ से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों घायल हो गए. मई 2017 में अनंतनाग लोकसभा सीट के उपचुनाव को रद्द कर दिया गया था. चुनाव आयोग ने कहा था कि चुनाव आयोजित करने के लिए वहां हालात ठीक नहीं है. इससे पहले अप्रैल 2017 में श्रीनगर निर्वाचन क्षेत्र के लिए उपचुनाव के दौरान विरोध करने वाले आठ लोगों की हत्या कर दी गई. इस चुनाव में सिर्फ छह फीसदी लोग वोट देने आए.

पिछले साल दिसंबर में पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार ने घोषणा की थी कि पंचायत चुनाव 15 फरवरी, 2018 से आयोजित किया जाएगा. हालांकि वहां के हालात को देखते हुए एक बार फिर से चुनाव को स्थगित कर दिया गया.

हाल ही में राज्य में पंचायत और नगरपालिका चुनाव की एक बार फिर से घोषणा की गई. चार चरणों में होने वाले नगरपालिका चुनाव 1 अक्टूबर से 5 अक्टूबर तक होने है. जबकि पंचायत चुनाव 8 नवंबर से 4 दिसंबर के बीच होंगे.

हालांकि अब कश्मीर के दो प्रमुख राजनीतिक दल- नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने चुनाव का बहिष्कार किया है. नेशनल कॉन्फ्रेंस ने पिछले हफ्ते घोषणा की कि जब तक केंद्र अनुच्छेद 35A पर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करता है वो आने वाले चुनावों का बहिष्कार करेगा. इसके बाद पीडीपी ने भी चुनाव का बहिष्कार कर दिया. उनका कहना है कि पहले सरकार को लोगों का विश्वास जीतना होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2019 यानी पंचायत चुनाव तक अनुच्छेद 35A पर सुनवाई टाल दी है.
क्या है ज़मीनी हक़ीकत ?

हाल ही में हिजबुल मुजाहिद्दीन का कमांडर रियाज नायकू ने उम्मीदवारों को जान से मारने की धमकी दी है. उन्होंने धमकी दी है कि चुनाव में भाग लेने वालों पर एसिड अटैक किए जाएंगे. उसने एक ओडियो मैसेज के जरिए कहा, ''नामांकन भरते समय आप अपने साथ कफन लेकर आएं.''

हर तरफ चुनाव को लेकर खौफ का माहौल है. मोहम्मद इकबाल कहते हैं कि इस बार कोई भी अपने क्षेत्र में चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं करेगा. उन्होंने कहा, "आखिरी चुनाव एक सामाजिक कार्यक्रम की तरह था. वहां भारी संख्या में लोग आए.लेकिन इस बार हालात अलग हैं.''

वहां के एक पूर्व सरपंच एज़ाज अहमद का कहना है, "कश्मीर में लोग नेताओं से नाराज हैं. इसके अलावा यहां आतंकवादी खतरा है. कोई भी मरना नहीं चाहेगा". एजाज अहमद मीर पीडीपी के विधायक भी हैं.

एक और पूर्व पंच शबीर अहमद का कहना है, "चुनावों के बारे में बात करना भी सुरक्षित नहीं है. मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा. कोई भी मरना नहीं चाहेगा."

सिर्फ दक्षिण कश्मीर ही नहीं पूरी घाटी में एक जैसे हालात हैं.

(लेखक कश्मीर में स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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