क्या कांशीराम और मायावती की दलित राजनीति में अंतर है?

'कांशीराम ने मायावती को तैयार किया लेकिन मायावती ने कोई और बड़ा दलित नेता नहीं बनाया, जिसे हम कह सकें कि वो मायावती के बाद जगह लेगा!'

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: March 15, 2019, 11:12 AM IST
क्या कांशीराम और मायावती की दलित राजनीति में अंतर है?
बसपा के संस्थापक कांशीराम (file photo)
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: March 15, 2019, 11:12 AM IST
भारत में दलित राजनीति को नए मुकाम पर ले जाने वाले सबसे बड़े नेता कांशीराम रहे हैं. आज उनकी जयंती है. उन्होंने दलित राजनीति की अगुवाई की और साथ-साथ मायावती को भी तैयार किया. दलितों के उत्कर्ष के लिए सामाजिक संगठनों के साथ ही बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का गठन किया. सपा के साथ गठबंधन करके बसपा प्रमुख मायावती एक बार फिर चर्चा में हैं. आइए जानते हैं कि मायावती और कांशीराम की राजनीति में क्या अंतर है?

कांशीराम की जीवनी कांशीराम 'द लीडर ऑफ द दलित्स' लिखने वाले बद्रीनारायण के मुताबिक "कांशीराम संगठन पर जोर देते थे, डीएस-4, बामसेफ जैसे संगठनों के सहारे जमीनी स्तर पर काम किया. लेकिन उनकी मौत के बाद बामसेफ बिखर गया. महाराष्ट्र सहित कई राज्यों के दलित इससे कट गए. मायावती ने यूपी तक अपनी राजनीति सीमित कर ली. कांशीराम ने मायावती को तैयार किया लेकिन मायावती ने कोई और बड़ा दलित नेता नहीं बनाया. जिसे हम कह सकें कि वो मायावती के बाद जगह लेगा." (ये भी पढ़ें: ‘मेरा सपना है कि बीएसपी प्रमुख मायावती प्रधानमंत्री बनें’)

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नारायण के मुताबिक "सत्ता में भागीदारी के लिए उन्होंने 1984 में दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यक समाज के वैचारिक नेताओं को जोड़कर बसपा खड़ा की. कांशीराम का विजन छोटा नहीं था. वह राष्ट्रीय स्तर की बात करते थे जबकि मायावती सिर्फ यूपी में सिमट गई हैं. हालांकि मायावती अब जो सपा से गठबंधन करके चुनाव लड़ने जा रही हैं ये कांशीराम की नीति है. कांशीराम के समय भी सपा-बसपा का गठबंधन हुआ था. मायावती ने बहुजन बनाए बिना सर्वजन का रुख किया. जबकि कांशीराम पहले बहुजन को मजबूत देखना चाहते थे."

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"हालांकि उनके पास संभावना बहुत है. पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बसपा के फॉलोअर हैं. वहां बसपा के बेस वोट का ध्रुवीकरण हो सकता है. बसपा जिन राज्यों में खुद अच्छा नहीं कर सकती वहां अपना वोटबैंक शिफ्ट करवाकर गठबंधन के दूसरे दलों के लिए अच्छा कर सकती है."

हालांकि, बीएसपी प्रवक्ता सुधींद्र भदौरिया का कहना है कि बहन मायावती मान्यवर कांशीराम के मिशन को आगे बढ़ा रही हैं. वो अपने काम की वजह से दबे-कुचले, दलितों और पिछड़े वर्ग के राजनीतिक उत्कर्ष का प्रतीक हैं. इसीलिए उनकी एक आवाज पर दलित गोलबंद हो जाते हैं.
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क्षत्रपों का अभाव वरना...
यूपी में तो दलित वोटों की बदौलत बसपा चार बार सत्ता में रही है. लेकिन दलित बहुल अन्य प्रदेशों में उसकी दाल नहीं गली. सबसे ज्यादा 33 फीसदी दलित आबादी वाले राज्य पंजाब में जब 1992 में उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था तो उसे 9 सीटों के साथ 16.32 फीसदी वोट मिले थे. पार्टी के संस्थापक कांशीराम पंजाब के ही रहने वाले थे.

दिल्ली जैसे राज्य जहां 16.75 फीसदी दलित हैं, वहां बसपा ने 2008 में 14.05 फीसदी तक वोट हासिल किया था, जबकि उसके वरिष्ठ नेताओं ने यहां उत्तर प्रदेश जैसी मेहनत नहीं की थी. बाद में दलित वोट कभी कांग्रेस तो कभी आम आदमी पार्टी के पास शिफ्ट होता रहा. मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, बिहार, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और कर्नाटक में उसे वोट तो मिले हैं लेकिन वो दलितों को गोलबंद नहीं कर पाई.

यूपी से बाहर बसपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 1 से लेकर 11 विधायकों तक का ही रहा है. हालांकि मायावती मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे प्रदेशों में समीकरण बिगाड़ने की हैसियत रखती हैं. मायावती पर 'बहनजी: द राइज एंड फॉल ऑफ मायावती' नामक किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस के मुताबिक "बसपा के राजनीतिक उदय के समय उसमें कई राज्यों के दलितों ने अपना नेता खोजा था, लेकिन मायावती ने न तो ध्यान दिया और न ही कांग्रेस और बीजेपी की तरह क्षेत्रीय नेता पैदा किए. जिसके सहारे उनकी राजनीति आगे बढ़ सकती थी.”

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“पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बसपा के आगे बढ़ने का बहुत स्कोप था लेकिन क्षत्रपों के अभाव में वह धीरे-धीरे जनाधार खोती गई. यही वजह है कि चंद्रशेखर और जिग्नेश मेवाणी जैसे नेताओं का उभार हो रहा है"

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