स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की क्यों आवश्यकता है?

पिछले एक दशक में भारतीय स्वास्थ्य सेवा पर सार्वजनिक खर्च देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.28 फीसदी भी नहीं रहा है.

Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: June 22, 2019, 10:12 PM IST
स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की क्यों आवश्यकता है?
भारत स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में लगातार पिछड़ता जा रहा है
Ravishankar Singh
Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: June 22, 2019, 10:12 PM IST
भारत में स्वास्थ्य सेवा का क्या हाल है वह किसी से छुपा नहीं है. पिछले एक दशक में भारतीय स्वास्थ्य सेवा पर सार्वजनिक खर्च देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.28 फीसदी भी नहीं रहा है. भारत के ग्रामीण क्षेत्र से लेकर शहरी क्षेत्रों में तरह-तरह के रोगों का संक्रमण बढ़ रहा है.  इंडियास्पेंडऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन द्वारा हाल के शोध से पता चला है कि भारत में महामारी, पोषण और जनसांख्यिकीय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. तरह-तरह की बीमारी और संक्रमण के कारण भारत में स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता है.

बीजेपी की चुनावी घोषणापत्र में भी जिक्र है 

लगातार दूसरी बार केंद्र की सत्ता में आई बीजेपी ने भी अपने चुनावी घोषणापत्र में स्वास्थ्य को लेकर एक नए अध्याय की शुरुआत की और स्वास्थ्य सेवा को सार्वजनिक जीवन का एक अनिवार्य घटक घोषित किया. बावजूद इसके पिछले एक दशक में कोई भी पार्टी जीडीपी के 2.5 फीसदी खर्च करने के करीब भी नहीं आई है. यह देखते हुए कि भारत में स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च का दो-तिहाई हिस्सा राज्य और स्थानीय सरकारों का होना चाहिए,

पिछले एक दशक में स्वास्थ्य सेवा का हाल और बुरा हुआ है


नीति आयोग ने 2018 में केंद्र और राज्यों के बीच सहकारी और सकारात्मक प्रतिस्पर्धी माहोल पैदा करने के लिए एक स्वास्थ्य सूचकांक विकसित किया था. इस विषय के तहत पता लगाया गया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में रिक्त स्वास्थ्य सेवा प्रदाता पदों का अनुपात एक महत्वपूर्ण विषय है. नीति अयोग की रिपोर्ट के अनुसार, स्वास्थ्य कर्मचारियों की रिक्तियों को स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता तक पहुंच से जोड़ना चाहिए.

स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई पद खाली हैं

बता दें कि भारत के विभिन्न राज्यों में स्टाफ, नर्स और डॉक्टरों की हजारों पद रिक्त हैं. पीएचसी और सीएचसी में स्टाफ नर्सों की सबसे अधिक 75 फीसदी पद झारखंड में रिक्त हैं. उसके बाद सिक्किम 62 फीसदी, बिहार में 50 फीसदी, राजस्थान में 47 फीसदी और हरियाणा में 43 फीसदी पद रिक्त हैं. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (एनसीटी दिल्ली) में 41 फीसदी पद रिक्त हैं. राजधानी होने के बावजूद दिल्ली देश का छठा सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला केंद्रशासित प्रदेश है.
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इस समय इंसेफेलाइटिस से त्रस्त बिहार की हालत तो और दयनीय है. बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ के मुताबिक बिहार में सरकारी और प्राइवेट डॉक्टरों की कुल संख्या लगभग 30 हजार के आसपास है. इसमे लगभग 6 हजार के आसपास सरकारी और शेष प्राइवेट डॉक्टर हैं. बिहार में डॉक्टरों की कमी कितनी है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) में बिहार में डॉक्टरों की संख्या का जो रजिस्ट्रेशन है उसकी संख्या मात्र 50 हजार है, जबकि राज्य में जरूरत के हिसाब से 1 लाख 30 हजार डॉक्टर होने चाहिए.

बिहार का तो और स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बुरा हाल है


बिहार में ब्लॉक स्तर पर अस्पतालों की संख्या 534 है. रेफरल अस्पतालों की संख्या 211 और अनुमंडल अस्पतालों की संख्या 80 है. जिला अस्पतालों की संख्या 30 है. विशेष अस्पतालों की संख्या 20-25 है. एडिशनल पीएचसी अस्पतालों की संख्या 1500 है. सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल भी मात्र 9 हैं.

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के विश्लेषण से पता चला है कि देश के कई राज्यों में हेल्थकेयर स्टाफ की प्राथमिक स्तर पर घोर कमी है. फंड की अपर्याप्तता के अलावा केंद्र द्वारा राज्य सरकारों को जारी किए गए धन के समय में पर उपलब्ध नहीं होने से सेवा असमानता का योगदान दिया है.

कुलमिलाकर यदि भारत को भी सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा का उचित स्तर प्राप्त करना है तो सभी मुख्यधारा दलों को राज्य स्तर पर स्वास्थ्य पर एक सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम पर सहमत होना पड़ेगा. राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना यूपीए सरकार द्वारा 2008 में शुरू की गई थी. एनडीए सरकार ने भी साल 2018 में प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना शुरू की थी, जिसमें केंद्र और राज्य के सहयोग के बिना अमल में लाना संभव नहीं है.

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First published: June 22, 2019, 10:12 PM IST
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