ANALYSIS: उपसभापति चुनाव में हार के बाद कांग्रेस से दूरी बना सकती हैं बाकी पार्टियां

कांग्रेस के लिए सबसे खराब चीज़ ये है कि बीजेपी के साथ कड़वाहट के बावजूद पीडीपी ने कांग्रेस का साथ नहीं दिया. चुनाव से वो दूर रहे.

News18Hindi
Updated: August 10, 2018, 12:42 PM IST
ANALYSIS: उपसभापति चुनाव में हार के बाद कांग्रेस से दूरी बना सकती हैं बाकी पार्टियां
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी (फ़ाइल फोटो)
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Updated: August 10, 2018, 12:42 PM IST
(पल्लवी घोष)

राज्यसभा में उपसभापति पद के लिए हुए चुनाव का नतीजा आते ही एक अनुभवी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने अपना सिर हिलाते हुए कहा, "हम से न हो पाएगा." ये कांग्रेसी नेता 2019 के लिए पार्टी की रणनीति टीम का हिस्सा हैं.

एक लाइन में कहें तो उन्होंने चुनाव में कांग्रेस की हालत को बयां कर दिया. हकीकत ये थी कि इस चुनाव में कांग्रेस सीधे शामिल नहीं होना चाहती थी. कांग्रेस ने पहले ये साफ कर दिया था कि वो राज्यसभा में उपसभापति पद के लिए चुनाव में अपना कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं करना चाहती थी. बल्कि वो विपक्षी दलों के उम्मीदवार को समर्थन देने के मूड में थी.

लेकिन बाद में कांग्रेस ने अपना खुद का उम्मीदवार खड़ा कर दिया. नतीजा उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा. ऐसा लग रहा था कि उनके सहयोगी दल और विपक्षी पार्टियों ने ही उन्हें धोखा दे दिया.

दूसरी तरफ बीजेपी ने दिखाया कि जिस विधा में पहले कांग्रेस मास्टर थी उस खेल में अब उन्हें महारत हासिल है. बीजेपी ने एक तीर से दो निशाने साध लिए. उन्होंने सहयोगी दलों को ये बता दिया कि सारे चुनाव सिर्फ बीजेपी के लिए नहीं है. इसके अलावा बीजेपी ने जेडीयू के उम्मीदवार को खड़ा कर दिया. वो ऐसे राज्य से आते हैं जो आगामी चुनाव के लिए काफी अहम है.

नतीजा ये रहा कि बीजेपी अपने सहयोगियों अकाली और शिवसेना को अपने साथ बनाए रखने में कामयाब रही. जिस दिन ये चुनाव हो रहे थे उस दिन शिवसेना के नेता आदित्य ठाकरे महाराष्ट्र के मंत्रियों नितिन गडकरी, प्रकाश जावड़ेकर और सुनील प्रभु से मिलने के लिए संसद में आए.

आदित्य ठाकरे की मौजूदगी ने ये जता दिया कि शिवसेना हमेशा की तरह बीजेपी के साथ है. शुरू में अकाली दल के नेता बीजेपी से नाराज़ थे. लेकिन बाद में उनकी ये नाराज़गी खत्म हो गई. नरेश गुजराल ने न्यूज 18 को बताया, "हमारे मतभेद थे लेकिन हमने अब उन्हें नजरअंदाज कर दिया है. हम एनडीए के साथ हैं."

खास बात ये है कि चुनावी साल में बीजेपी को बीजेडी के तौर पर एक नया सहयोगी मिल गया है. पीएम ने व्यक्तिगत तौर पर नवीन पटनायक से अपनी पार्टी के लिए नहीं बल्कि अपने सहयोगी दल के लिए समर्थन मांगा. और ये सौदा पक्का हो गया.

लेकिन कांग्रेस के लिए सबसे खराब चीज़ ये है कि बीजेपी के साथ कड़वाहट के बावजूद पीडीपी ने कांग्रेस का साथ नहीं दिया. चुनाव से वो दूर रहे. कांग्रेस के एक टॉप नेता ने कहा, "हमारे इससे खराब और कुछ नहीं हो सकता."

कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार इसलिए रखा क्योंकि वो इसे खेल में कूदना चाहती थी. एनसीपी कांग्रेस से ज्यादा चालाक निकली. वंदना चव्हाण के नाम पर उन्होंने खुल कर हामी नहीं भरी. पवार ये सुनिश्चित करना चाहते थे कि पहले उनके उम्मीदवार को मिलने वाले वोट का पता लग जाए. एनसीपी के एक बड़े नेता ने कहा, "हम एक छोटी पार्टी हो सकते हैं लेकिन हमारा भी आत्म सम्मान है. राज्यसभा में हार से महाराष्ट्र में चुनाव पर असर पड़ सकता था."

इसलिए जब विपक्ष ने गुलाम नबी आजाद के घर पर उम्मीदवार के नाम को अंतिम रूप देने के लिए बैठक की और चव्हाण का नाम फाइनल हुआ तो पवार पीछे हट गए. पवार ने अपने उम्मीदवार का नाम इसलिए वापस ले लिया क्योंकि उन्हें बताया गया कि बीजेडी, भाजपा को वोट देगी.

पवार हारना नहीं चाहते थे और उन्होंने फैसला किया कि चव्हाण चुनाव नहीं लड़ेंगीं. यहां तक कि तृणमूल ने कहा कि वे चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं थे, और इसलिए बीके हरिप्रसाद के नाम के अलावा कांग्रेस को कोई और विकल्प नहीं मिला.

बीके हरिप्रसाद कांग्रेस के लिए कभी ओडिशा के प्रभारी थे. पार्टी ने एक बार फिर ये संदेश दिया वो नए साझेदार नहीं चाहते हैं, बल्कि वो नए विरोधी चाहते हैं. बीजेपी के लिए कोई चुनाव छोटा नहीं होता है. जबकि कांग्रेस किसी चुनाव को गंभीरता से नहीं लेती है.

नीतीश कुमार ने जब आप से समर्थन मांगा तो उसने उन्हें मना कर दिया. आप के नेता कांग्रेस के उम्मीदवार को वोट देने के लिए तैयार थे. लेकिन वो चाहते थे कि राहुल गांधी खुद केजरीवाल से बात करे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं और आप ने खुद को वोटिंग से बाहर कर लिया.

पार्टी के एक नेता ने कहा, ''प्रधानमंत्री को देखिए उन्होंने समर्थन के लिए खुद नवीन पटनायक को फोन किया. उन्होंने ये दिखाया कि कोई भी चुनाव उनके लिए छोटा नहीं है. राहुल को भी खुद फोन करना चाहिए था. 2019 के चुनावों के लिए ये एक गेम चेंजर साबित हो सकता था." उन्होंने कहा कि राहुल ने कांग्रेस की राज्य इकाई को सुना.

साल 2004 में सोनिया गांधी ने उन सभी पार्टियों से भी संपर्क किया जिनसे उनके संबंध अच्छे नहीं थे जैसे कि डीएमके. क्योंकि वक्त का तकाजा था कि सभी दल अटल बिहारी वाजपेयी से मुकाबला करने के लिए एक साथ आए.

आज कांग्रेस ने ऐसा करने से इनकार कर दिया है. इसका नुकसान उन्हें लगातार उठाना पड़ेगा. तृणमूल कांग्रेस के एक बड़े नेता ने कहा, "हमें उनकी जरुरत नहीं है. हमें लगता है कि कांग्रेस की अगुवाई में कई लोग हमारे साथ नहीं आना चाहते हैं."

टीडीपी, वाईएसआर, पीडीपी और आप भी अब कांग्रेस दूरी बना रहे हैं. एक बयान में वाईएसआर ने कहा, "हमें कहा गया था कि कांग्रेस के अलावा कोई और उम्मीदवार होगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ऐसे में हमने कांग्रेस का समर्थन न करने का फैसला किया."

कांग्रेस के लिए ये परिणाम अपमानजनक है. उन्हें इससे सीखने की जरुरत है. सच्चाई ये है कि कोई भी राजनीतिक दल हारना नहीं चाहती. लेकिन सवाल उठता है कि कांग्रेस ने कितने क्षेत्रीय दलों को अपने साथ जोड़ा है.

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