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न चूल्हे में आग है न थाली में रोटी, सूखे से जूझ रहा बुंदेलखंड

उत्तर प्रदेश के एक हिस्से की जो पिछले कई सालों से एक दर्द झेल रहा है। दर्द की ये दास्तान है बुंदेलखंड की जहां सूखे की मार के चलते ना तो चूल्हे में आग है और ना ही थाली में रोटी।

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    बुंदेलखंड। उत्तर प्रदेश के एक हिस्से की जो पिछले कई सालों से एक दर्द झेल रहा है। दर्द की ये दास्तान है बुंदेलखंड की जहां सूखे की मार के चलते ना तो चूल्हे में आग है और ना ही थाली में रोटी। बुंदेलखंड के कई गांव ऐसे हैं जहां लोग बस एक ही शब्द से जूझते रहते हैं और वो है भूख। इन गांवों में लोगों की सुबह शुरू ही इस बात से होती है कि आज घर में चूल्हा जलेगा या नहीं।

    लंच का वक्त है, श्यामा को पता है कि चारों भूखे बच्चे जो खाने के इंतजार में हैं जल्द ही बेचैन हो जाएंगे। वो खुश है कि उसकी बहन चुन्नी बाई उसकी मदद कर रही है। उसको तीसरा बच्चा होने वाला है और वो जल्दी थक जाती है। आखिरी महीना चल रहा है और उसके लिए जलावन की लकड़ियां बीनने के लिए भटकना असंभव है। कढ़ाइली से लकड़ियां बीनना और उन्हें फतेहगंज जाकर बेचना कठिन काम है। उसे लकड़ी के एक गठ्ठर से 25 रुपए मिलते हैं जो उसके बहुत काम के हैं। उसका पति काम की तलाश में कोटा गया है।

    जैसे ही रोटियां तैयार होती हैं छोटे बच्चे चूल्हे के इर्द गिर्द जमा होने लगते हैं। चार से छह साले के बच्चे जैसे ही रोटी पाते हैं जहां नमक रखा है वहां चले जाते हैं, रोटी पर नमक छिड़कते हैं, उसे मोड़ते हैं और रोल बना कर खाना शुरू कर देते हैं। उसकी बेटी पार्वती बमुश्किल चार साल की है, वो रोटी पर नमक छिड़क कर अपने भाई को देती है। यहां इसे ही दो जून की रोटी कहा जाता है।

    हालांकि श्यामा को आप भाग्यशाली कह सकते हैं क्योंकि उसके पास थोड़ा गेहूं जमा है। लेकिन यूपी के इस गुदरामपुर गांव में जो बांदा जिले के नरैनी ब्लॉक में पड़ता है वहां के कुछ लोगों के पास ये भी नहीं है। यह तीसरा सीजन है जब इस इलाके के लोगों इन हालात से जूझ रहे हैं। 2014 में जरूरत से ज्यादा बरसात के बाद पिछले साल दो सीजन सूखे में गुजर गए। दाल तो इस इलाके के लोगों के लिए सपना हो गई है। जब खेत से ही अरहर गायब है तो थाली में कैसे दिखेगी। दुकान में 100 रुपए किलो बिक रही दाल कौन खरीदेगा।

    इस खूबसूरत गांव के पीछे गरीबी का गहरा दर्द छिपा है। गांव के ज्यादातर घरों में खाने के भंडार खत्म हो चुके हैं। पूरा बुंदेलखंड में इस दर्द की गूंज सुनी जा सकती है- खासतौर पर उन गांवों में जो जंगला के करीब हैं। दो जून का खाना बड़ी मुश्किल से मिलता है और अगर मिल गया तो फिर नमक से ही खाना पड़ता है।

    ये आदिवासी परिवार हैं जिनके पास जमीन तो नहीं है लेकिन बटाई पर खेती कर गुजारा करते हैं। यानि दूसरे के खेत को किराए पर लेकर खेती। ये बीज खरीदते हैं, खाद डालते हैं, मेहनत करते हैं और जो पैदा होता है उसे खेत के मालिक के साथ बांटते हैं। श्यामा और चुन्नी ने 5,000 रुपए साहूकार से लेकर रबी के सीजन में गेहूं, अरहर और ज्वार बोई है लेकिन अगर बरसात नहीं हुई तो कुछ भी पैदा नहीं होगा। लेकिन कर्ज पर सूद तो बरकरार रहेगा।

    भुखमरी से लड़ने के लिए यहां सरकारी सपोर्ट भी लगभग नदारद है। प्राइमरी स्कूल जहां बच्चों को मिड डे मील के जरिए एक वक्त का भोजन मिल सकता है वो स्कूल भी हमें बंद ही मिला। गांववालों का कहना है कि टीचर भी कभी ड्यूटी करने स्कूल नहीं आते और शिक्षामित्र जो स्कूल चलाना जिसके जिम्मे है वो पढ़ाता ही नहीं।

    कमाशिन ब्लॉक के शदासानी गांव की सुभद्रा देवी लगातार तीसरे दिन हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं। उनके और उनके पति के पास न खेतों में करने के लिए कोई काम है न नरेगा में। राशन कार्ड पर भी वो ज्यादा अनाज ले चुकी है और चक्की से भी उधार आटा लिया है। इसका दलिया बनेगा या फिर वही नमक रोटी। 7 से 10 रुपए किलो का आलू एक और चीज है जो उसकी पहुंच में है लेकिन आज तो वो भी नहीं।

    लेकिन इस अंधेरे में भी उम्मीद की किरण दिखती है। श्यामा ने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। श्यामा और उसकी नवजात बेटी दोनों ठीक हैं। पति ने बच्ची की देखभाल के लिए पांच हजार रुपए भेजे हैं। बच्ची को अभी कुछ नहीं पता लेकिन जब वो बड़ी होगी तो एक शब्द जो उससे सबसे अधिक सुनने को मिलेगा वो है अकाल।

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