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जीवाश्म ईंधन बन रहा लाखों भारतीयों की मौत की वजह, यूपी-बिहार में हालात बदतर- स्टडी

प्रदूषण कम करने के लिए एंटी स्मॉग गन का इस्तेमाल किया जा रहा है. तस्वीर नई दिल्ली स्थित बस डिपो की है. (Reuters)
प्रदूषण कम करने के लिए एंटी स्मॉग गन का इस्तेमाल किया जा रहा है. तस्वीर नई दिल्ली स्थित बस डिपो की है. (Reuters)

बीते कुछ सालों में चीन (China) की स्थिति में सुधार हुआ है. शोधकर्ताओं ने पाया है कि चीन में एयर क्वालिटी (Air Quality) सुधारने के प्रयासों की वजह से मौतों का आंकड़ा गिरा है. देश में मौतों की संख्या 2012 में 21.5 फीसदी से गिरकर 2018 में 18 प्रतिशत पर आ गई है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 10, 2021, 12:08 PM IST
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नई दिल्ली. भारत में वायु प्रदूषण (Air Pollution) का कहर बढ़ता जा रहा है. हाल ही में प्रकाशित हुई एक स्टडी के मुताबिक जीवाश्म ईंधन (Fossils Fuel) की वजह से हवा में फैला प्रदूषण भारत में हर साल 30 फीसदी से ज्यादा लोगों की जान ले लेता है. इस तरह के पॉल्यूशन से सबसे ज्यादा मौतें उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में हुई हैं. वहीं, दुनिया के लिहाज से देखें तो भारत (India) और चीन में जीवाश्म ईंधन के प्रदूषण से होने वाली मौतों की दर सबसे ज्यादा है.

यह चौंकाने वाली जानकारी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (Harvard University) की एक स्टडी में मिली है. स्टडी के अनुसार, उत्तर प्रदेश में जीवाश्म ईंधन के प्रदूषण की वजह से 4.7 लाख से ज्यादा लोगों की जान गई है. वहीं, बिहार में यह आंकड़ा 2.8 लाख से ज्यादा है. रिपोर्ट्स बताती हैं कि दुनियाभर में जीवाश्म ईंधन के जलाने से फैला प्रदूषण हर पांच में से एक मौत के लिए जिम्मेदार है. साल 2018 में इस प्रदूषण के चलते 80 लाख से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई थी.

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दुनिया में क्या हैं हाल
द प्रिंट में प्रकाशित एक आर्टिकल के अनुसार, रिपोर्ट्स में पता चला है कि पूर्वोत्तर अमेरिका, यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया में जीवाश्म ईंधन से फैले प्रदूषण का प्रभाव ज्यादा है. वहीं, बीते कुछ सालों में चीन की स्थिति में सुधार हुआ है. शोधकर्ताओं ने पाया है कि चीन में एयर क्वालिटी सुधारने के प्रयासों की वजह से मौतों का आंकड़ा गिरा है. देश में मौतों की संख्या 2012 में 21.5 फीसदी से गिरकर 2018 में 18 प्रतिशत पर आ गई है.

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने यह स्टडी यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम, यूनिवर्सिटी ऑफ लीसेस्टर और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के साथ मिलकर की थी. यह अध्ययन मंगलवार को जर्नल एनवायरमेंटल रिसर्च में प्रकाशित हुआ था. शोधकर्ताओं ने बताया कि पहले की स्टडी एयरबोर्न पार्टिकुलेट मैटर या पीएम 2.5 का औसत सालाना वैश्विक कंस्ट्रेशन का पता लगाने के लिए सैटेलाइट और सर्फेस ऑब्जर्वेशन पर आधारित थीं.

हालांकि, यह अवलोकन फॉजिल्स फ्यूल (जीवाश्म ईंधन) से धूल, जंगल की धुंआ या दूसरे स्त्रोतों में अंतर नहीं करते हैं. इस परेशानी को दूर करने के लिए टीम ने एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री का ग्लोबल 3डी मॉडल का इस्तेमाल किया है.
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