जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के ऊपरी क्षेत्र को बसेरा बना रहे तितली और कीट

कीट-पतंगों के अस्तित्‍व पर खतरा.
कीट-पतंगों के अस्तित्‍व पर खतरा.

हिमालयी क्षेत्र (Himalayan Area) में बढ़ते औसत तापमान ने पहाड़ों पर रहने वाली तितलियों और कीट-पतंगों की कई दर्जन प्रजातियों को और ऊंचाई पर जाने को मजबूर कर दिया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 12, 2020, 7:31 AM IST
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नई दिल्‍ली. जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और इससे बढ़ रहा पृथ्‍वी का औसत तापमान शुरुआत से ही खतरे का सबब बना हुआ है. हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते औसत तापमान ने पहाड़ों पर रहने वाली तितलियों और कीट-पतंगों की कई दर्जन प्रजातियों को और ऊंचाई पर जाने को मजबूर कर दिया है. यह बात सरकार की ओर से कराए गए एक अध्‍ययन में सामने आई है.

इस अध्‍ययन पर अफसरों का कहना है कि इसके नतीजों को आने वाले दशक में जानवरों की प्रजातियों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को समझने के लिए आधारभूत संकेतक के रूप में इस्‍तेमाल किया जाएगा. बता दें कि हिमालयी क्षेत्र 35 फीसदी से अधिक तितलियों और कीट-पतंगों या लेपिडोप्टेरा का घर है. पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा वित्तपोषित और जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI) द्वारा वित्तपोषित सर्वेक्षण में कीटों की कम से कम 49 प्रजातियों और तितली की 17 प्रजातियों की पहचान की गई. इसमें पता चला है कि ये सभी नई रिकॉर्ड ऊंचाई पर जा बसे हैं. उनके मौजूदा और पहले दर्ज किए गए औसत स्थान ऊंचाई के बीच 1,000 मीटर से अधिक का अंतर है.

अफसरों के अनुसार अध्‍ययन में पता चला है कि विशेष रूप से सात प्रजातियां पिछले स्‍थान की तुलना में अब 2,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर रहने लगी हैं. इनमें क्रमश: 2,800 मीटर, 2,684 मीटर और 2,280 मीटर की ऊंचाई के साथ कीट प्रजाति के ट्रेकिआ एरीप्लीना (नोक्टुइडे), एक्टियास विंडब्रचलिनी (सैटुरनिडा), और डिप्थीरोसोम फासिआटा (नॉक्टुइडे) शामिल हैं.



इंडियन एक्‍सप्रेस के अनुसार अफसरों ने बताया, 'ऐतिहासिक मानचित्र और टेललेस बुशब्लू तितलियों को पहले 2,500 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता था. ऐसा ऐतिहासिक डेटा में दर्ज किया गया है. अपने सर्वेक्षण के दौरान हमने उन्हें उत्तराखंड के अस्कोट वन्यजीव अभयारण्य में 3,577 मीटर की ऊंचाई पर पाया है. लद्दाख में भारतीय रेड एडमिरल तितली ऐतिहासिक रूप से 3,900 मीटर पर पाई जाती थी. अब यह 4,853 मीटर पर मिलती है.
अध्ययन में पाया गया कि शहतूत रेशमकीट और टाइगर कीट सहित आठ कीट प्रजातियां, जो ऐतिहासिक रूप से 2,000 मीटर पर पाए जाते थे. वे अब आमतौर पर 3,500 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई पर पाए जाते हैं. तितलियां संवेदनशील प्रजातियां हैं जो जलवायु में परिवर्तन के लिए अतिसंवेदनशील हैं. इसलिए, वे जलवायु परिस्थितियों में दीर्घकालिक परिवर्तन के अच्छे संकेतक हैं.

चार साल के अध्ययन में जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, उत्तर बंगाल और अरुणाचल प्रदेश में कीट की 1,274 और तितली की 484 प्रजातियों पर नज़र रखी गई. इसने तितली और कीट की 80 नई प्रजातियों की पहचान की.
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