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OPINION: अविश्वास प्रस्ताव से दूर रहकर क्या शिवसेना ने पार कर दी BJP की 'लक्ष्मण रेखा'?

OPINION: अविश्वास प्रस्ताव से दूर रहकर क्या शिवसेना ने पार कर दी BJP की 'लक्ष्मण रेखा'?


लोकसभा चुनाव 2019 का वक्त जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, बीजेपी और शिवसेना के बीच खींचतान बढ़ती जा रही है.

लोकसभा चुनाव 2019 का वक्त जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, बीजेपी और शिवसेना के बीच खींचतान बढ़ती जा रही है.

महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ लंबे समय से चल रहे खींचतान के बाद क्या अभी भी बीजेपी गठबंधन को बरकरार रखने की सोच रही है? अगर इस सवाल का जवाब 'हां' में है, तो फिर दूसरा सवाल उठता है कि आखिर ऐसी क्या वजह है, जिससे महाराष्ट्र में बीजेपी को शिवसेना का 'हाथ' थामकर रहना पड़ रहा है?

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    वेंकटेश केसरी
    लोकसभा चुनाव 2019 का वक्त जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, बीजेपी और शिवसेना के बीच खींचतान बढ़ती जा रही है. संसद में शुक्रवार को मोदी सरकार के खिलाफ लाए गए विपक्ष के 'अविश्वास प्रस्ताव' में वोटिंग से दूर रहकर शिवसेना ने एक बार फिर जाहिर कर दिया कि वो बीजेपी से 'रूठी' हुई है. यही नहीं, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने 'अविश्‍वास प्रस्‍ताव' के गिरने के बाद कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी की जमकर तारीफ भी की. शिवसेना के मुख्यपत्र 'सामना' में पहले पन्‍ने की हेडलाइन में लिखा- 'भाई, तू तो छा गया...' साथ ही राहुल के भाषण में 'देश के चौकीदार कहने वाले उद्योगपतियों के भागीदार बन गए हैं...' जुमले को भी हाईलाइट किया गया.

    ऐसे में सवाल ये है कि शिवसेना बीजेपी के खिलाफ अपनी 'नाराज़गी' ऐसे क्यों जगजाहिर कर रही है? सीनियर जर्नलिस्ट वेंकटेश केसरी पूरे मामले पर अपना नज़रिया रख रहे हैं:-

    महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ लंबे समय से चल रहे खींचतान के बाद क्या अभी भी बीजेपी गठबंधन को बरकरार रखने की सोच रही है? अगर इस सवाल का जवाब 'हां' में है, तो फिर दूसरा सवाल उठता है कि आखिर ऐसी क्या वजह है, जिससे महाराष्ट्र में बीजेपी को शिवसेना का 'हाथ' थामकर रहना पड़ रहा है? खासकर ऐसे वक्त में जब शुक्रवार को संसद में लाए गए 'अविश्वास प्रस्ताव' में शिवसेना के 18 सांसद वोटिंग से दूर रहे. क्या शिवसेना ने 'अविश्वास प्रस्ताव' में 'गद्दारी' के बाद राहुल गांधी की तारीफ कर बीजेपी की बनाई 'लक्ष्मण रेखा' पार कर दी है?

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    ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब बीजेपी हाईकमान को देना चाहिए. दरअसल, चार साल के मोदी सरकार में पहले चीजें इतनी खराब नहीं थी. बीजेपी-शिवसेना के बीच रिश्ते पिछले कुछ दिनों से ज्यादा खराब हुए हैं. अब शायद बीजेपी को अहसास होने लगा है कि 2019 में आम चुनाव से पहले महाराष्ट्र गठबंधन टूटने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है.


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    महाराष्ट्र की राजनीति में साथ रहते हुए भी शिवसेना एक तरफ खड़ी है और बीजेपी दूसरी तरफ. शिवसेना को लगता है कि वह केंद्र और राज्य के राजनीतिक फ्रंट में तभी उभरकर सामने आ सकती है, जब बीजेपी का नेतृत्व थोड़ा कमजोर हो. बीजेपी के खिलाफ शिवसेना कुछ भी चोरी-छिपे नहीं कर रही. सबकुछ पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे के फैसले के मुताबिक हो रहा है.

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    कांग्रेस और टीडीपी द्वारा मोदी सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर शिवसेना ने कहा था कि वह वोटिंग में हिस्सा नहीं लेगी. इसे एक तरह से केंद्र की एनडीए सरकार के लिए झटका माना जा रहा है. हालांकि, पहले लग रहा था कि शिवसेना संसद में केंद्र सरकार के साथ खड़ी होगी. वह वोटिंग में हिस्सा लेगी. क्योंकि गुरुवार को शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने समर्थन देने के लिए फोन किया था. लेकिन, ऐसा बताया जा रहा है कि उद्धव ठाकरे ने फोन नहीं उठाया.

    शुक्रवार सुबह तक 'अविश्वास प्रस्ताव' पर चर्चा से पहले संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार बार-बार यही संकेत देते रहे कि शिवसेना-बीजेपी में कोई टकराव नहीं है. बीजेपी से अलग शिवसेना दूसरे लाइन पर नहीं जा रही. अनंत कुमार ने इसके भी संकेत दिए कि बीजेपी 'मातोश्री' (उद्धव ठाकरे का घर) के 'टच' में है. आखिर में जो हुआ, वो सबके सामने था. शिवसेना मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष के 'अविश्वास प्रस्ताव' में 'गैरहाजिर' रहने के फैसले पर अड़ी रही. शिवसेना की इस 'गद्दारी' से बीजेपी को अब सोचने की जरूरत है कि महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ भगवा पार्टी का 'मिलाप' आगे जारी रहेगा या नहीं. इस स्थिति ने आने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर बीजेपी के कैल्कुलेशन को भी कुछ हद तक प्रभावित किया है.

    शिवसेना ने 'अविश्वास प्रस्ताव' से दूर रहकर मोदी सरकार के खिलाफ जो नाराज़गी जाहिर की है, वो महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस सरकार के लिए भी खतरे की घंटी है. अब अगर खुद प्रधानमंत्री ने मामले में दखल नहीं दिया, तो आने वाले दिनों में बीजेपी-शिवसेना के बीच का 'गैप' इतना बड़ा हो जाएगा, जिसे भरना बेहद मुश्किल है या शायद इसे भरा ही न जा सके.

    शिवसेना सुप्रीम उद्धव ठाकरे बीजेपी के लिए बड़ी मुश्किल बनते जा रहे हैं. ठाकरे धीरे-धीरे चल रहे हैं, मगर निश्चित तौर पर बीजेपी से दूर जा रहे हैं. महाराष्ट्र में 'हिंदुत्व' के कारण को बीजेपी के साथ शिवसेना के 30 साल से रिश्ते हैं, अब इस रिश्ते में गर्माहट खत्म होती जा रही है. शिवसेना को लगने लगा है कि बीजेपी के पीछे उसने इतने साल बर्बाद किए.


    शिवसेना ने हाल में लिए गए कुछ फैसलों में ये इशारा दिया है कि वह बीजेपी से अलग हो सकती है. पहले उसने लोकसभा चुनाव और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में अकेले उतरने का फैसला लिया. फिर पालघर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में शिवसेना ने बीजेपी के खिलाफ अपना कैंडिडेट उतारा. अब शिवसेना ने मोदी सरकार के खिलाफ लाए गए 'अविश्वास प्रस्ताव' में वोटिंग से दूरी बना ली. दिलचस्प बात है कि इतना होते हुए भी पीएम मोदी और अमित शाह ने अपना धैर्य बनाए रखा.

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक शिवसेना को लेकर कोई एक्शन नहीं लिया है. कोई ऐसी प्रतिक्रिया नहीं दी है, जिससे साफ होता हो कि बीजेपी नेतृत्व शिवसेना से नाराज चल रही है. इससे इस बात को बल मिल रहा है कि शायद बीजेपी अभी भी शिवसेना के साथ 'पैचअप' करना चाहती है और इसके लिए कोशिश कर रही है.


    शिवसेना की 'बदमिजाजी' से बीजेपी स्टेट यूनिट का एक हिस्सा भी नाखुश है, लेकिन ये हिस्सा शिवसेना को कुछ बोल नहीं रहा. क्योंकि, उन्हें बीजेपी नेतृत्व से संयम बरतने के साफ निर्देश मिले हैं.

    इन दिनों शिवसेना ने नया पैंतरा अपनाया है. ये पैंतरा है कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की तारीफ करने का. ऐसा करके वो बीजेपी को उकसाने का काम भी कर रही है. संसद में राहुल गांधी के भाषण पर शिवसेना के मुख्यपत्र 'सामना' में एडिटोरियल छापा गया. इसमें राहुल गांधी की तारीफों के पुल बांधे गए. वहीं, मोदी सरकार को लेकर तंज भी कसे गए. 'सामना' में उद्धव ठाकरे का डिटेल इंटरव्यू भी छपा. इसमें उन्होंने बताया कि बीजेपी से 'रूठी' शिवसेना का आगे का प्लान क्या है?


    कुल मिलाकर पीएम नरेंद्र मोदी के लिए तेलुगू देशम पार्टी, पीडीपी और जनता दल यूनाइडेट को हैंडल करना शिवसेना की तुलना में ज्यादा आसान हो गया है. अगर हालात ऐसे ही रहे, तो आने वाले दिनों में बीजेपी की मुश्किलें निश्चित रूप से बढ़ने वाली है.

    (लेखक सीनियर जर्नलिस्ट हैं. विचार निजी हैं.)

    Tags: Congress, NDA, Rahul gandhi, Shiv sena

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