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'कल्याण सिंह नहीं चाहते थे ढहाई जाए बाबरी मस्जिद, उन्‍होंने भीड़ को रोकने की पूरी कोशिश की'

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Updated: February 22, 2019, 6:21 PM IST
'कल्याण सिंह नहीं चाहते थे ढहाई जाए बाबरी मस्जिद, उन्‍होंने भीड़ को रोकने की पूरी कोशिश की'
(फाइल फोटो- अनिल स्वरूप)

बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान उत्तर प्रदेश इन्फॉर्मेशन और पब्लिक रिलेशन के निदेशक रह चुके पूर्व ब्यूरोक्रेट अनिल स्वरूप एक नई किताब लेकर आ रहे हैं.

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  • Last Updated: February 22, 2019, 6:21 PM IST
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इरम आगा

बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान उत्तर प्रदेश इन्फॉर्मेशन और पब्लिक रिलेशन के निदेशक रह चुके पूर्व ब्यूरोक्रेट अनिल स्वरूप एक नई किताब लेकर आ रहे हैं. उनकी किताब में उस वक्त की तमाम घटनाओं का जिक्र है, साथ ही तत्‍कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की प्रतिक्रियाओं का भी जिक्र है.

न्यूज18 के साथ उन्होंने अपनी किताब के बारे में खास बातचीत की. उनकी आने वाली किताब का नाम 'नॉट जस्ट अ सिविल सर्वेंट' है. इस किताब में उन सभी घटनाक्रमों का जिक्र है जिसके चलते नौकरशाही की दशा हतोत्साहित हो गई थी. इस दौरान अधिकारियों के धड़ल्ले से ट्रांसफर किए गए. यह वही दौर था जब कल्याण सिंह को आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा और इसका अंजाम यह हुआ कि उन्हें अपनी सत्ता की बलि चढ़ानी पड़ी.

सवाल- आपकी किताब में जिक्र किया है कि जब कारसेवकों ने बाबरी विध्वंस किया था तब कल्याण सिंह को हर तरफ से आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा. इस बारे में आप क्या कहेंगे?

मैं किसी भी तरह का महत्वपूर्ण निर्णय इस बात पर नहीं दे रहा. कल्याण सिंह ने उस वक्त ऐसे किसी भी हुजूम को रोकने की कोशिश की थी जो बाबरी मस्जिद का विध्वंस करने के लिए आगे बढ़ रही थी. उन्होंने भीड़ को रोकने की पुरजोर कोशिश की.

सवाल- लेकिन वे उस वक्त तत्कालीन मुख्यमंत्री थे.
मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के नेताओं से घिरा हुआ होता है. कल्याण सिंह उमड़ती भीड़ से नाराज थे और उन्होंने राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत से बात करते हुए कहा , 'मैंने आपसे कहा था कि भीड़ को इकट्ठा होने की इजाजत न दी जाए.' मैं यह बात इसलिए जानता हूं क्योंकि उस वक्त मैं उनके साथ खड़ा इकलौता आदमी था. वह अलग-अलग लोगों से बातचीत कर रहे थे और समाधान तलाश रहे थे.उन्होंने असवान बांध निर्माण के दौरान मस्जिदों की शिफ्टिंग का उदाहरण भी दिया औऱ उन्होंने कहा कि ऐसा यहां क्यों नहीं हो सकता. बहुत सारी मस्जिद थे जिन्हें कहीं और स्थानांतरित कर दिया गया था. कल्याण सिंह के इस विचार से कई लोग सहमत थे. उन्होंने आम सहमति बनाने की कोशिश की लेकिन विध्वंस के बारे में कभी नहीं सोचा.

सवाल- आप ऐसा क्यों सोचते हैं?
क्योंकि उन्हें पता था कि इसके क्या परिणाम हो सकते हैं. इस घटना के बाद उन्होंने अपनी सरकार खो दी थी. ऐसा कौन सा मुख्यमंत्री चाहेगा. यह सोचना मूर्खतापूर्ण है कि कल्याण सिंह बाबरी विध्वंस चाहते थे.

सवाल- आपने यह भी लिखा है कि उत्तर प्रदेश बाबरी विध्वंस के बाद बदल गया था जिसके बाद यह प्रदेश पटरी पर कभी नहीं लौटा.
हां. इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश में बदलाव आया था. हर तरह से इंस्टीट्यूशन ढहाए गए थे. सरकार बदलने के बाद अधिकारियों का ट्रांसफर नए व्यापार की तरह उभर आया था. मनमाने ढंग से ट्रांसफर किए जा रहे थे. 6 या 8 महीने पोस्टिंग के बाद डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारियों का ट्रांसफर हो रहा था. हालांकि 90 के दशक में इसके बाद परिस्थितियां बदल गईं थीं. लेकिन इसकी वजह से लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान पहुंचा था.

सवाल- नौकरशाहों की लैटरल एंंट्री पर लोगों के अलग अलग मत थे. कुछ इसके समर्थन में थे वहीं कुछ इसकी आलोचना कर रहे थे.
मैं लैटरल एंट्री के खिलाफ नहीं हूं लेकिन इन सबकी प्रक्रिया जरूर जांच के दायरे में रहनी चाहिए. हमें यह पता होना चाहिए कि हम किस तरह से इसे ले रहे हैं. हम केवल लोगों को उठा सकते हैं. इसे हमेशा यूपीएसी एग्जाम के दायरे के भीतर होना चाहिए. यह किसी से प्रभावित नहीं होना चाहिए मेरिट को छोड़कर. अगर इसमें पारदर्शिता बरती गई होती तो शायद सीबीआई विवाद पैदा नहीं हुआ होता.

सवाल- आप सीबीआई प्रकरण को किस तरह से देखते हैं. आपको क्या लगता है कि ऐसा क्यों हुआ?
सीबीआई के दो शीर्ष अधिकारियों के बीच जो हुआ वह पूरी नौकरशाही के लिए शर्मनाक है. ऐसा नहीं होना चाहिए था. एक सिविल सर्वेंट के लिए इस तरह का व्यवहार अच्छा नहीं है. इसकी वजह से यूपीएससी, इलेक्शन कमीशन जैसी संस्थाओं की साख शक के दायरे में आती है. अगर आप इस तरह से शीर्ष पदों पर नियुक्ति करते हैं तो ऐसी दिक्कतों का आना अचरज की बात नहीं है.

मुझे विश्वास है कि अगर ईमानदारी को आधार बनाकर अधिकारियों का चयन किया जाता है तो ऐसी स्थितियां सामने नहीं आएंगी. एक अधिकारी जिसे आपने तैयार किया है वह अचानक आपके लिए बेकार कैसे हो सकता है?

अगर वह बुरा है, तो वह बुरा है . एक अधिकारी अचानक बुरा नहीं बन जाता है. लोग अचानक बदमाश नहीं बन सकते. इसका मतलब है कि इस प्रक्रिया में कुछ गड़बड़ है.

सवाल- तत्कालीन नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG), विनोद राय ने 2004 और 2010 के बीच कोयला ब्लॉकों के आवंटन पर ऑडिट रिपोर्ट जारी किया. इसके बाद ही परिस्थितियां बदल गईं. क्या आप इस रिपोर्ट से असहमत हैं.

राय की रिपोर्ट तथाकथित तथ्यों पर आधारित है. राय ने जो निष्कर्ष निकाला उससे मैं असहमत हूं. मैंने अपनी किताब में साफ तौर पर कहा है कि कोल ब्लॉक आवंटन में गलत किया गया है. इसका तरीका गलत था. मैंने अपनी किताब में इस बात का जिक्र किया है कि कोयला ब्लॉक आवंटन में गलतियाँ की गई थीं और जिस तरह से यह आवंटन हुआ था वह गलत था.

नुकसान खनन की औसत लागत पर निर्धारित किया गया था जिसे सीएजी रिपोर्ट में राय द्वारा 590 रुपये के रूप में बताया गया था जबकि खनन की लागत 400 रुपये और 4,000 रुपये के बीच अलग-अलग होती है.

ऑडिटर को हर खदान में नियमों के हिसाब से अडिटिंग परर ध्यान देना चाहिए. इससे उसे उत्पादन की लागत के बारे में जानकारी मिलती है. दूसरे, वह इन खानों की तुलना कोल इंडिया की खानों के साथ कर रहे थे, जो बेहतरीन खदानें हैं, जहां उत्पादन की लागत किसी भी मामले में कम थी.

इसके बाद के तथ्य से यह प्रदर्शित किया गया कि नीलामी के तीसरे दौर के बाद, कोयला खदानों के लिए कोई खरीदार नहीं मिले. यदि मार्जिन 295 रुपये प्रति टन था, तो उसे लेने के लिए लोग जाहिर तौर पर लालायित रहते.

लेकिन फिर सवाल यह होगा कि नीलामी के पहले दौर में उनकी कतार क्यों लगी?
तब स्थिति ऐसी थी कि कोयले की कमी थी और लोगों को यकीन नहीं था कि वे इसे हासिल कर सकेंगे. वे किसी भी कीमत पर कोयला चाहते थे. साफ है कि घोटाला था. मूल्यों का निर्धारण न होना और कोल के डिलिवरी कॉस्ट के तथ्यों की वजह से यह गलत था.

सवाल- क्या इस केस में गलतियां बरती गई थीं ?
बहुत सारे गलत काम किए गए थे. कुछ लोगों को आउट ऑफ टर्न दिया गया था और इसे सही भी ठहराया गया था. लेकिन यह कहा गया कि सभी के नाम बंद करने के लिए स्टॉक और बैरल सही नहीं था.

दूसरी बात, हर कोई जानता है, और यह अभी भी मेरी याद में है कि डिप्टी सीएजी मीडिया के सामने उस रिपोर्ट को फ्लैश कर रहे थे और कह रहे थे कि घोटाला हुआ है. यह कैग का काम नहीं था.

सीएजी के रूप में, आप केवल रिपोर्ट जमा करते हैं और जब कोई आपसे कोई प्रश्न पूछता है, तो आप उसका उत्तर देते हैं. बस. अगर घोटाला हुआ भी है तो इसे सबको बताना सीएजी का काम नहीं है. यह एक रिपोर्ट है, बस इसे सबमिट किया जाना चाहिए था. मेरी राय में  विनोद राय ने कंपनियों के लिए मार्जिन का निर्धारण गलत किया था.

लेकिन क्या सिविल सेवकों द्वारा पहले ऐसी बातें नहीं की गई थीं?
हुआ था लेकिन किसी और की कीमत पर नहीं. आइए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के मामले पर नजर डालते हैं. वह मीडिया के पास भी गए और समस्याओं के बारे में बात की, लेकिन किसी की कीमत पर नहीं. राय ने न केवल व्यक्तियों को, बल्कि शासन को भी प्रभावित किया.

मैं कोयला सचिव था, और फाइलों पर लिखने वाला कोई नहीं था. शासन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा क्योंकि सभी ने सोचा कि अगर मैं कुछ भी लिखूंगा तो कोई मुझसे सवाल करेगा. मैं परियोजनाओं को फास्टट्रैक करने के लिए एक समूह का प्रमुख था क्योंकि लोग फाइलों पर कमिट नहीं कर रहे थे. फैसला नहीं हो रहा था. शासन का सामना करना पड़ा.

उन लोगों के बारे में आपका क्या कहना है जो दावा करते हैं कि मौजूदा शासन में संस्थानों की अखंडता खतरे में है?

यह कहना उचित नहीं है कि मौजूदा शासन में संस्थान कमतर हैं. अतीत में भी संस्थानों को कमजोर किया गया है. इससे पहले भी सीबीआई को नियंत्रण में लिया गया था. ऐसा इसलिए है क्योंकि लगभग हर राजनीतिक दल चाहता है कि संस्थान उनके लिए काम करें. चाहे वह CBI हो या CAG - क्योंकि यह उनके उद्देश्यों की पूर्ति करता है.

हमें उन्हें नियुक्ति की प्रक्रिया से गुजारना होगा जहां किसी भी व्यक्ति के प्रति निष्ठा नहीं होती. स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है. यदि यह निष्ठा का सम्मान करता है, तो आपके पास वह रिपोर्ट होगी जो आप चाहते हैं. हर सरकार संस्थानों में हेरफेर करना चाहती है. कुछ सरकारें इस मामले में सफल हुईं कुछ असफल. हर सरकार चाहती है कि संस्थान उसके लिए काम करें.

स्कूल शिक्षा के सचिव के रूप में आपके कार्यकाल के आखिरी दिन कैसे रहे?
मुझे पता चला कि शिक्षक धुरी है. कई मुद्दे थे लेकिन आलोचनात्मक शुरुआत सेवा-पूर्व प्रशिक्षण से हुई थी. माफिया हर जगह हैं. हमने उनके खिलाफ कार्रवाई की और चार साल का डिग्री कोर्स करने का फैसला किया, जिसकी मदद से फर्जी कॉलेज खत्म हो जाएं.
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First published: February 22, 2019, 3:46 PM IST
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