हाथरस केस: यूपी का जातीय समीकरण साधने में कामयाब होगी कांग्रेस?

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी ने शनिवार को हाथरस के पीड़ित परिवार से मुलाकात की. (फाइल फोटो)
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी ने शनिवार को हाथरस के पीड़ित परिवार से मुलाकात की. (फाइल फोटो)

कांग्रेस उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh Congress) में अपना खोया जनाधार वापस पाने और पार्टी को मजबूत करने का प्रयास कर रही है. हाथरस (Hathras Case) के रूप में उन्हें एक नया हथियार मिला है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 4, 2020, 2:39 PM IST
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नई दिल्ली. 30 सितंबर की सुबह जब पूरे देश की नजरें बाबरी मस्जिद विध्वंस (Babri Masjid Verdict) मामले में आने वाले निर्णय पर थीं, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान एक अन्य बड़ी खबर ने अपनी ओर खींचा... यह था यूपी के हाथरस (Hathras Case) में 19 वर्षीय दलित लड़की का कथित गैंगरेप और प्रताड़ना का मामला, जिसमें उसकी मौत हो गई.

इस मामले में लखनऊ से लेकर हाथरस तक प्रदर्शन हो रहे हैं और उत्तर प्रदेश प्रशासन और पुलिस का रवैया काफी संवेदनहीन दिखा. हाथरस के इस मामले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को फोन तक किया. इसके बाद सीएम योगी ने मामले में तेज़ी से फैसला लिया और पहले जांच के लिए एसआईटी बनाई, इसके बाद पीड़ित परिवार से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये बातचीत की और अब मामले की जांच सीबीआई के सुपुर्द करने का ऐलान किया है.

सरकार की तरफ से परिवार को घर के अलावा एक सदस्य को सरकारी नौकरी और पहले से घोषित 10 लाख रुपये की सहायता राशि को बढ़ाकर 25 लाख करने का ऐलान किया गया. इसके बाद परिवार का सीएम पर भरोसा जगा होगा, लेकिन दलित समुदाय और अन्य लोगों का पारा चढ़ा हुआ है. गुस्से का सबसे बड़ा कारण है प्रशासन द्वारा कथित रूप से शव का जबरन अंतिम संस्कार किया जाना. परिवार को अंतिम दर्शन तक के लिए मना कर दिया गया. इन सबके बीच बड़ा सवाल यही है कि क्यों प्रधानमन्त्री को बीच में आकर हस्तक्षेप करना पड़ा. क्या हाथरस कांड राज्य में खराब कानून व्यवस्था और महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध का सबूत है या इसका एक बड़ा राजनीतिक आयाम है?



क्या अपने दलित वोट बैंक में संभावित सेंध को लेकर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व थोड़ा चिंतित है? योगी सरकार के हाथ से ब्राह्मण वोट खिसकने की खबरों के बाद क्या हाथरस कांड से दलित वोट भी बड़ी संख्या में खिसक जाएगा? इसका उत्तर भारत के सबसे ज्यादा जनसंख्या और राजनीतिक दृष्टि से अहम राज्य की जातिय व्यवस्था की वास्तविकता से पता चलेगा.
पश्चिमी यूपी में वाल्मीकि की ताकत
403 विधानसभा सीटों और 80 लोकसभा क्षेत्रों वाले उत्तर प्रदेश में एक बड़ी दलित आबादी रहती है. राज्य जाति-आधारित पहचान की राजनीति का गढ़ भी रहा है. दलित पुनरुत्थान से लेकर पिछड़ी जाति की राजनीति तक, सभी ने यूपी में एक मजबूत अभिव्यक्ति पाई है.

विशेषज्ञ बताते हैं कि यूपी की कुल आबादी का 22 फीसदी हिस्सा दलितों का है. इसमें वह कई उपजातियों में बंटे हुए हैं. जाटव, पासी, सोनकर, धोबी, कोइरी और वाल्मीकि इनमें प्रमुख जातियां हैं. पश्चिमी यूपी में वाल्मीकियों की संख्या ज्यादा है.

गाजियाबाद से लेकर सहारनपुर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत, अलीगढ, हाथरस, अमरोहा, मुरादाबाद आदि जिलों सहित कुल 25 सीटों पर वाल्मीकि समाज चुनावी नतीज़े तय कर सकता है. राजनीतिक रूप से देखा जाए तो जाटव बसपा के मजबूत स्तम्भ माने जाते हैं, तो वाल्मीकि पिछले एक दशक के दौरान खिसककर भाजपा के पास चले गए. 2014 के लोकसभा चुनाव, 2017 के विधानसभा चुनाव और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में वाल्मीकि समाज के लोगों ने बड़ी संख्या में भाजपा को वोट दिए. हालांकि हाथरस केस के बाद बीजेपी के साथ इनके वर्षों पुराने रिश्तों में तनाव की आशंका है. बता दें कि पीड़ित परिवार वाल्मीकि समुदाय से है.

क्या भाजपा के नुकसान से कांग्रेस को लाभ?
कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपना खोया जनाधार वापस पाने और पार्टी को मजबूत करने का प्रयास कर रही है. हाथरस के रूप में उन्हें एक नया हथियार मिला है. दिल्ली से लेकर हाथरस तक प्रदर्शनों से पार्टी में नई संगठनात्मक ताकत दिखाई दी है. कांग्रेस के एससी/एसटी विंग के नेताओं को लगातार बलात्कार पीड़िता के परिवार के साथ देखा जा रहा था.

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प्रियंका गांधी का सवाल- सीबीआई जांच का हल्ला करके SIT की जांच क्यों जारी है

यूपी कांग्रेस के AICC एससी/एसटी विंग के प्रदीप नरवाल कई बार पीड़ित परिवार के साथ दिखे. कांग्रेस के नेता भले ही इससे इनकार करें लेकिन उनकी इस कवायद को दलितों तक अपनी पहुंच और पकड़ मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. ख़ासकर वाल्मीकि समाज की बात करें तो यह अस्सी के दशक तक कांग्रेस के साथ था, बाद में बसपा से होते हुए भाजपा में चले गए. पार्टी नेताओं का मानना है कि दलित और ब्राह्मण वोटों के अलावा अल्पसंख्यकों के उनके पाले में आने से एक मजबूत वोट आधार बन सकता है.

मायावती की पार्टी लापता
हाथरस मामले को लेकर कई दिनों से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और कांग्रेस ने इस मामले में बढ़त ले ली, लेकिन दलितों के उत्थान के लिए बनी बसपा पार्टी जमीन से गायब दिख रही है. दिल्ली से उत्तर प्रदेश तक कांग्रेस और भीम आर्मी के लोग सड़कों पर देखे जा सकते हैं, लेकिन बसपा प्रदर्शनों से पूरी तरह गायब है. पार्टी की मुखिया मायावती का विरोध सिर्फ कुछ ट्वीट तक ही सीमित रहा है. मीडिया के सामने 1 अक्टूबर को मायावती ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सीएम योगी कानून व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम रहे हैं. उन्हें या तो इस्तीफ़ा देना चाहिए, या भाजपा को उन्हें हटा देना चाहिए. मायवती की देरी से आई प्रतिक्रिया के पीछे दो चिंताएं थी. पहली यह कि दलित वोट बैंक में कांग्रेस का झुकाव और दूसरा यूपी सरकार के प्रति बसपा के नरम रवैये की अवधारणा का मुकाबला करना. मायावती अपने मकसद में कितना सफल होती हैं, यह स्पष्ट नहीं है.
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